nazmKuch Alfaaz

कभी ये भी ख़्वाहिश परेशान करती है मुझ को कि मैं अपने भीतर के मैं को निकालूँ मगर मेरे मैं की तो सूरत बहुत ही बुरी है ख़बासत का अम्बार जिस में निहाँ है सराफ़ा से जिस की कराहत अयाँ है जबीं पर ख़तरनाक सोचों के जंगल उगे हैं भयानक इरादों के वहशी छुपे हैं निगाहों में जिस की हवसनाकियों के मनाज़िर भरे हैं मनाज़िर भी ऐसे कि जिन में ज़िना ऐसे लोगों के हमराह करने को सोचा गया है बदन जिन के जिंसी बुलूग़त को पहुँचे नहीं हैं या वो जो बुलूग़त की सारी कशिश खो चुके हैं या वो जिन से कोई मुक़द्दस सा रिश्ता जुड़ा है मिरे मैं की सूरत बुरी है कि दंदाँ दरिंदों की सूरत किसी सह में सिमटे कुँवारे बदन में गड़े हैं कि मातम-कदे में भी आँखें किसी जिस्म की बुर्जियों पर टिकी हैं कि बीवी बग़ल में मगर ज़ेहन में और ही कोई तन-मन खिला है कि पगली भिकारन के तन और अंधे भिकारी के कश्कोल पर भी नज़र है बुरी है बहुत ही बुरी है कि दिल में अइज़्ज़ा की अम्वात की ख़्वाहिशें भी दबी हैं कई बे-गुनह गर्दनें उँगलियों में फँसी हैं कि लफ़्ज़-ए-अयादत में बीमार की मौत की भी दुआ है बुरी है बुरी है कि अहबाब की जीत पर दिल दुखी है कि औलाद की बरतरी से चुभन है कि भाई के रौशन जहाँ से जबीं पर शिकन है बुरी है बुरी है कि जो पालता है उसी की नफ़ी है कि जो पूजता है उसी से दग़ा है अजब ऊबड़-खाबड़ सी मैं की ज़मीं है कि उस में कहीं भी तवाज़ुन नहीं है किसी भी तरह का तनासुब नहीं है जहाँ चाहिए हौसला बुज़दिली है जहाँ रास्ती की ज़रूरत कजी है जहाँ चाहिए अमन ग़ारत-गरी है जहाँ चाहिए क़ुर्ब वाँ फ़ासला है जहाँ सुल्ह-ए-कुल चाहिए गर्मियाँ सर्दियाँ हैं अगर मेरे मैं की ये सूरत मिरे ख़ोल की बाहर सत्ह पर आ गई तो ज़माना मुझे क्या कहेगा यही सोच कर अपनी इस आरज़ू के बदन में तबर भौंक देता हूँ अक्सर मगर ये तमन्ना कि मैं अपने भीतर के मैं को निकालूँ मिरे दिल में रह रह के क्यूँँ जागती है सबब उस का ये तो नहीं है कि मैं अपने अंदर की शफ़्फ़ाफ़ मकरूह सूरत दिखा कर ज़माने की आँखों में ख़ुद को बड़ा देखना चाहता हूँ या ये कि मुसलसल शराफ़त के नाटक से तंग आ चुका हूँ या फिर ये कि अब बाहरी शक्ल-ओ-सूरत में मेरी कशिश कोई बाक़ी नहीं है

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ

Faiz Ahmad Faiz

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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बिन-लादेन तोरा-बोरा में होता तो ऐसी महशरी मार जिस से पहाड़ सुर्मा बन गए ज़मीन राख हो गई आसमान सियाह पड़ गया कब का ख़त्म हो चुका होता मगर कुर्रा-ए-अर्ज़ पर जगह जगह हैबतनाक आतिशीं फुन्कारें कर्बनाक दिल-दोज़ चीख़ें इस हक़ीक़त की ग़म्माज़ हैं कि बिन-लादेन मिरा नहीं ज़िंदा है ये फुन्कारें और चीख़ें इस बात की भी दलील हैं कि लादेन तोरा-बोरा के अलावा दूसरे ख़ित्तों में भी मौजूद है सवाल ये है कि लादेन ख़त्म क्यूँँ नहीं हुआ क्या वो वाक़ई इतना ज़बरदस्त है कि सारे जहान की मजमूई ताक़त भी उस के आगे हेच है क्या उस ने आब-ए-हयात पी ली है कि कभी मर नहीं सकता क्या वो क़फ़स बिन गया है कि अपनी ख़ाकिस्तर से फिर पैदा हो जाता है क्या वो शुद सिकंदरी है कि याजूज-माजूज की ज़बानें उसे पूरी तरह चाट नहीं पातीं क्या वो रावन है कि उस का एक सर अफ़्ग़ानिस्तान में तो बाक़ी नौ दूसरे जहाँ में और क्या उस ने कोई वरदान पा लिया है कि सर कट कर फिर धड़ से आ लगता है क्या वो भीषम-पितामह है कि अपनी अच्छा के बग़ैर मर नहीं सकता क्या उस ने अपना क्लोन बना लिया है कि उस का ख़ात्मा ना-मुम्किन हो गया है सवाल ये भी है कि मीज़ाईलों का निशाना चूक क्यूँँ जाता है क्या उन के पुर्ज़े ढीले हैं कि वो अपना तवाज़ुन खो बैठती हैं बे-सम्ती का शिकार हो जाती हैं क्या वो अंधी हैं कि बिन-लादेन को देख नहीं पातीं क्या उन की बीनाई कमज़ोर है कि वो लादेन और ग़ैर-लादेन में तमीज़ नहीं कर पातीं बिन लादेन कोई सच तो नहीं कि शकुनी की चाल उस के आगे नाकाम हो जाए वो लाक्षा गिरह से बच कर निकल जाए अज्ञात-बास से वापस आ जाए उस का चीर-हरन न हो सके तीरों की शय्या पर ज़िंदा रह जाए कहीं ऐसा तो नहीं कि मिज़ाईलें उसे मारना ही नहीं चाहतीं अगर ऐसा है तो ये महशरी मार किस के लिए ये मुसलसल यलग़ार क्यूँँ हैरान-ओ-परेशान अर्जुन कुरूक्षेत्र में चीख़ता फिर रहा है मगर आज की महा-भारत में इन सवालों का जवाब देने वाला कोई कृष्न नहीं कोई कृष्न नहीं

Ghazanfar

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भूक से भरी आँखें आसमान की जानिब तक रही हैं धरती से इक हसीन रॉकेट को जिस के सुर्ख़ परचम पर बालियाँ हैं गंदुम की भूक से भरी आँखें जानती नहीं लेकिन बालियाँ तो गेहूँ की ख़ुशनुमा बहाने हैं चमचमाते ख़ोशों में ज़हर-नाक दाने हैं सुर्ख़ सुर्ख़ दानों में एटमी बलाएँ हैं जाँ-गुसिल दवाएँ हैं

Ghazanfar

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कल तलक जो धरती पर सर-बुलंद परचम था आफ़्ताब की सूरत रंग जिस के चेहरे का दूर तक चमकता था आज उस से लिपटी हैं टिड्डियाँ हवाओं की सुर्ख़ियों के शोलों को ले रही हैं नर्ग़े में बदलियाँ फ़ज़ाओं की 'मार्क्स'-जी के पुतले पर बैठा काला कव्वा एक बीट करने वाला है पास ही में नारा एक इंक़लाब ज़िंदाबाद गूँजता है रह रह कर

Ghazanfar

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अमन का डमरू डम डम डम चैन की ढोलक ढम ढम ढम आओ बजाएँ तुम और हम झू में नाचें छम छम छम जब तक अपने दम में दम देस ये चमके चम चम चम गोली गोला और न बम आँसू आह न दर्द-ओ-अलम दहशत ख़ौफ़ न कोई ग़म ख़ुशियाँ बरसें झम झम झम झूम के गाएँ रम पम पम देस ये चमके चम चम चम गौतम की ता'बीर हैं हम ख़्वाजा की तफ़्सीर हैं हम नानक की तस्वीर हैं हम गाँधी जी की जागीर हैं हम हम से अम्न-ओ-अमाँ का दम देस ये चमके चम चम चम सुख दुख सब में साथी हम बाँटें ख़ुशियाँ बाँटें ग़म कभी न कोई आँख हो नम हम इक इक के हैं हम-दम हम से ख़ुशियों की झम झम देस ये चमके चम चम चम ऐसा कोई काम करें जग में इस को आम करें मेहनत सुब्ह-ओ-शाम करें दुनिया भर में नाम करें अपना ऊँचा हो परचम देस ये चमके चम चम चम मौला तेरा रहम-ओ-करम इस धरती पर हो हर दम रहे हमेशा मिट्टी नम फूल खिलाए हर मौसम साँसें महकें चहके दम देस ये चमके चम चम चम हर चेहरे पर फूल खिले हर माथे पर चाँद उगे आँख में इक इक दीप जले इक इक लब पर गीत सजे ढल जाए हर शाम-ए-ग़म देस ये चमके चम चम चम नफ़रत की दीवार गिरे रस्ते से बंदूक़ हटे कीना रंजिश बैर मिटे दहशत का हर शोर थमें रुक जाए ये धम धम धम देस ये चमके चम चम चम

Ghazanfar

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चैन है ख़्वाब है कहानी है माइशा मेरी ज़िंदगानी है हर तरफ़ इस से शादमानी है हर नज़ारे का रंग धानी है रंग में रूप में नज़ाकत में सब में परियों की वो तो रानी है उस की आँखों से नूर छनता है उस के होंटों पे गुल-फ़िशानी है ऐसी नाज़ुक कि पंखुड़ी भी नहीं फूल कोई वो दास्तानी है मुस्तक़िल बाम-ओ-दर महकते हैं वो मिरे घर की रात-रानी है उस की मासूम मुस्कुराहट में कुछ फ़रिश्तों की भी निशानी है नग़्मगी जिस्म-ओ-जाँ में घुल जाए ऐसी होंटों पे ख़ुश-बयानी है ऐसा गुल-कारियों में जादू है आग भी जिस के दम से पानी है हेच मख़मल है जिल्द के आगे रंग भी रश्क-ए-अर्ग़वानी है उस के तलवों के लम्स में भी अजब नशा-ए-कैफ़-ए-जावेदानी है उस से हर आँख में बसारत है उस से हर दिल में शादमानी है उस के होने से मेरे आँगन में तपिश-ए-धूप भी सुहानी है बे-ज़रर बे-ज़बान है लेकिन हर तरफ़ उस की हुक्मरानी है बाप क़ुर्बान माँ फ़िदा उस पर और नानी तो बस दीवानी है दादा दादी के दिल की धड़कन है सनी मामूँ की जान-ए-जानी है शाहिदा हों कि बेबी बाजी हूँ हर कोई उस परी की नानी है फ़ख़्र इनआ'म की चहेती है सल्लू शादाब की भी रानी है दिल महक का चहक रहा उस से लब पे सफ़िया के लन-तरानी है बिन बुलाए हमें बुलाती है वो तो गुड़िया अजब सियानी है ऐ 'ग़ज़ंफ़र' बता कि महफ़िल में क्या कोई माइशा का सानी है

Ghazanfar

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