nazmKuch Alfaaz

आज के नाम और आज के ग़म के नाम आज का ग़म कि है ज़िंदगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ा ज़र्द पत्तों का बन ज़र्द पत्तों का बन जो मिरा देस है दर्द की अंजुमन जो मिरा देस है क्लरकों की अफ़्सुर्दा जानों के नाम किर्म-ख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नाम पोस्ट-मैनों के नाम ताँगे वालों का नाम रेल-बानों के नाम कार-ख़ानों के भूके जियालों के नाम बादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा, नाएब-उल-अल्लाह फ़िल-अर्ज़ दहक़ाँ के नाम जिस के ढोरों को ज़ालिम हँका ले गए जिस की बेटी को डाकू उठा ले गए हाथ भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली है दूसरी मालिए के बहाने से सरकार ने काट ली है जिस की पग ज़ोर वालों के पाँव-तले धज्जियाँ हो गई है उन दुखी माँओं के नाम रात में जिन के बच्चे बिलकते हैं और नींद की मार खाए हुए बाज़ुओं में सँभलते नहीं दुख बताते नहीं मिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं उन हसीनाओं के नाम जिन की आँखों के गुल चिलमनों और दरीचों की बेलों पे बे-कार खिल खिल के मुरझा गए हैं उन बियाहताओं के नाम जिन के बदन बे मोहब्बत रिया-कार सेजों पे सज सज के उक्ता गए हैं बेवाओं के नाम कटड़ियों और गलियों मोहल्लों के नाम जिन की नापाक ख़ाशाक से चाँद रातों को आ आ के करता है अक्सर वज़ू जिन के सायों में करती है आह-ओ-बुका आँचलों की हिना चूड़ियों की खनक काकुलों की महक आरज़ू-मंद सीनों की अपने पसीने में जुल्ने की बू पढ़ने वालों के नाम वो जो असहाब-ए-तब्ल-ओ-अलम के दरों पर किताब और क़लम का तक़ाज़ा लिए हाथ फैलाए वो मासूम जो भोले-पन में वहाँ अपने नन्हे चराग़ों में लौ की लगन ले के पहुँचे जहाँ बट रहे थे घटा-टोप बे-अंत रातों के साए उन असीरों के नाम जिन के सीनों में फ़र्दा के शब-ताब गौहर जेल-ख़ानों की शोरीदा रातों की सरसर में जल जल के अंजुम-नुमा होगए हैं आने वाले दिनों के सफ़ीरों के नाम वो जो ख़ुश्बू-ए-गुल की तरह अपने पैग़ाम पर ख़ुद फ़िदा होगए हैं

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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मुझ पे तेरी तमन्ना का इल्ज़ाम साबित न होता तो सब ठीक था ज़माना तेरी रौशनी के तसलसुल की क़स में उठाता है और में तेरे साथ रह कर भी तारीखियों के तनज़ूर में मारा गया मुझ पे नज़र-ए-करम कर मुखातिब हो मुझ सेे मुझे ये बता मैं तेरा कौन हूँ? इस तअल्लुक़ की क्यारी में उगते हुए फूल को नाम दे मुझ को तेरी मोहब्बत पे शक तो नहीं पर मेरे नाम से तेरे सीने में रखी हुई ईंट धड़के तो मानो कब तलक मैं तेरी ख़ामोशी से यूँंही अपने मर्ज़ी के मतलब निकालूँगा मुझ को आवाज़ दे चाहे वो मेरे हक़ में बुरी हो तेरी आवाज़ सुनने की ख़्वाहिश में कानों के परदे खींचे जा रहे हैं बोलदे कुछ भी जो तेरा जी चाहे.. बोल ना! तेरे होंठों पे मकड़ी के जालों के जमने का दुख तो बरहाल मुझ को हमेशा रहेगा तू ने चुपी ही सादनी थी तो इज़हार ही क्यूँ किया था? ये तो ऐसे है बचपन में जैसे कहीं खेलते खेलते कोई किसी को 'स्टेचू' कहे और फिर उम्र भर उस को मुड़ कर न देखे

Tehzeeb Hafi

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे असबाब-ए-ग़म-ए-इश्क़ बहम करते रहेंगे वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे हाँ तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी हाँ अहल-ए-सितम मश्क़-ए-सितम करते रहेंगे मंज़ूर ये तल्ख़ी ये सितम हम को गवारा दम है तो मुदावा-ए-अलम करते रहेंगे मय-ख़ाना सलामत है तो हम सुर्ख़ी-ए-मय से तज़ईन-ए-दर-ओ-बाम-ए-हरम करते रहेंगे बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क से पैदा रंग-ए-लब-ओ-रुख़्सार-ए-सनम करते रहेंगे इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे

Faiz Ahmad Faiz

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आज फिर दर्द-ओ-ग़म के धागे में हम पिरो कर तिरे ख़याल के फूल तर्क-ए-उल्फ़त के दश्त से चुन कर आशनाई के माह ओ साल के फूल तेरी दहलीज़ पर सजा आए फिर तिरी याद पर चढ़ा आए बाँध कर आरज़ू के पल्ले में हिज्र की राख और विसाल के फूल

Faiz Ahmad Faiz

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"याद" दश्त-ए-तन्हाई में ऐ जान-ए-जहाँ लर्ज़ां हैं तेरी आवाज़ के साए तिरे होंटों के सराब दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब उठ रही है कहीं क़ुर्बत से तिरी साँस की आँच अपनी ख़ुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम दूर उफ़ुक़ पार चमकती हुई क़तरा क़तरा गिर रही है तिरी दिलदार नज़र की शबनम इस क़दर प्यार से ऐ जान-ए-जहाँ रक्खा है दिल के रुख़्सार पे इस वक़्त तिरी याद ने हाथ यूँँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़ ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात

Faiz Ahmad Faiz

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इक ज़रा सोचने दो इस ख़याबाँ में जो इस लहजा बयाबाँ भी नहीं कौन सी शाख़ में फूल आए थे सब से पहले कौन बे-रंग हुई रंज-ओ-तअब से पहले और अब से पहले किस घड़ी कौन से मौसम में यहाँ ख़ून का क़हत पड़ा गुल की शह-रग पे कड़ा वक़्त पड़ा सोचने दो सोचने दो इक ज़रा सोचने दो ये भरा शहर जो अब वादी-ए-वीराँ भी नहीं इस में किस वक़्त कहाँ आग लगी थी पहले इस के सफ़-बस्ता दरीचों में से किस में अव्वल ज़ह हुई सुर्ख़ शुआओं की कमाँ किस जगह जोत जगी थी पहले सोचने दो हम से उस देस का तुम नाम ओ निशाँ पूछते हो जिस की तारीख़ न जुग़राफ़िया अब याद आए और याद आए तो महबू-ए-गुज़िश्ता याद आए रू-ब-रू आने से जी घबराए हाँ मगर जैसे कोई ऐसे महबूब या महबूबा का दिल रखने को आ निकलता है कभी रात बिताने के लिए हम अब उस उम्र को आ पहुँचे हैं जब हम भी यूँँही दिल से मिल आते हैं बस रस्म निभाने के लिए दिल की क्या पूछते हो सोचने दो

Faiz Ahmad Faiz

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बहार आई तो जैसे यक-बार लौट आए हैं फिर अदम से वो ख़्वाब सारे शबाब सारे जो तेरे होंटों पे मर-मिटे थे जो मिट के हर बार फिर जिए थे निखर गए हैं गुलाब सारे जो तेरी यादों से मुश्कबू हैं जो तेरे उश्शाक़ का लहू हैं उबल पड़े हैं अज़ाब सारे मलाल-ए-अहवाल-ए-दोस्ताँ भी ख़ुमार-ए-आग़ोश-ए-मह-वशां भी ग़ुबार-ए-ख़ातिर के बाब सारे तिरे हमारे सवाल सारे जवाब सारे बहार आई तो खुल गए हैं नए सिरे से हिसाब सारे

Faiz Ahmad Faiz

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