"जब पापा पापा कहते थे" जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे जब पापा हम ने कहवाई जाँ फट के गले में है आई तब हँसते गाते फिरते थे अब मारे मारे फिरते हैं न ही कुछ खोने का डर था तब न ही कुछ पाने की इच्छा थी तब मन में जहाँ भी आता था वहीं पे रोया करते थे हम रोने के लिए भी अब हम को जा बुक करवानी पड़ती है जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे स्कूल को हम तुम जाते थे तब ज़ेब में पैसे रहते थे अब हाथ सभी के ख़ाली हैं कैसी यार अब की पढ़ाई है वो पीठ पे बोझ किताबों का और जेब में कंचे रहते थे जब स्कूल से घर आते थे तो चाॅक चुरा कर लाते थे गिल्ली डंडा ले ले कर रोज़ हम गलियों गलियों फिरते थे जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे याद आता है वो दौर हमें दादी के आँचल में छुपते थे मम्मी को झूट बताते थे पापा को झूट बताते थे फिर होती ख़ूब पिटाई थी हम अक्कड़ बक्कड़ करते थे खुट्टल बुट्टल भी करते थे जिस सेे भी लड़ाई होती थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे नाना नानी मौसा मौसी मेहमान जो घर में आते थे उन की ज़ेब से पैसे चुराते थे उन के बैग से चीज़ चुराते थे वो बचपन याद आता है जब बारिश में भीगा करते थे काग़ज़ की नाव बना कर ख़ूब आँगन में हम ने चलाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे मम्मी की आँखों में रहते ओझल न कहीं फिर होते थे मम्मी पापा के हिस्से की हर चीज़ हमीं ने खाई थी पापा की गोदी में रहते हम रोज़ दुकानों पर जाते फिर चीज़ वही मिलती हम को उँगली जिस पर भी उठाई थी जब पापा पापा कहते थे हम कितने मज़े में रहते थे वो दिन याद आते हैं हम को जब सबके दिलों में रहते थे बचपन का फ़साना याद आया अब आँख मिरी भर आई है
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"तुम्हारा दिन मुबारक हो" न जाने कितने दिन गुज़रे न कोई कॉल न मैसेज न कोई राब्ता रखा तुम्हें मैं याद तो हूँ ना या मुझ को भूल बैठे हो कहाँ अपना हमेशा साथ रहने का इरादा था कि चाहे जो भी हो जाए कभी भी हम न बिछड़ेंगे तुम्हारा भी तो वा'दा था तुम्हें मालूम है कैसे तुम्हारे बिन रहा हूँ मैं मैं शब भर जागता और चाँद से बातें किया करता कहीं जब बात आती थी तुम्हारे हुस्न की तो मैं उलझ पड़ता था उस से भी तुम्हारे हुस्न के हक़ में दलीलें मेरी सुन सुन कर सितारे हँसने लगते थे तुम्हारी वापसी के ख़्वाब मुझ को दिन में आते थे अरे देखो ये मैं भी ना बड़ा पागल हूँ जान-ए-जाँ ये भी क्या वक़्त है कोई शिकायत का चलो छोड़ो हटाओ सब जनम-दिन है तुम्हारा आज कि शिकवे और शिकायत को तो सारी उम्र बाक़ी है तुम्हें ये दिन मुबारक हो तुम्हारा दिन मुबारक हो
Khan Janbaz
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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एक साल ओ मेरे दिल के टुकड़े मेरी बहना मेरी बेटी मेरे बच्चे आज एक साल हो गया तुम्हें बाशिंदा ए अदम-आबाद हुए मेरी छोटी-सी दुनिया को बर्बाद हुए जैसे ये ख़ुशबू धूप अब्र-ओ-बाद हुए तुम्हें आज़ाद हुए मुझे शब-ज़ाद हुए तुम सेे कोई विवाद हुए मुझे ना-मुराद हुए इस दिल को ना शाद हुए तुम्हें महज़ एक याद हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया मुक़द्दर को बिगड़े हुए मुझे तुम सेे बिछड़े हुए इस घर को उजड़े हुए इस दिल के टुकड़े हुए बैठा रहता हूँ मैं तेरी तस्वीर को पकड़े हुए बैठी है तेरी याद दिल में दिल को जकड़े हुए तेरे मेरे झगड़े हुए और मुझे तुझ पे अकड़े हुए अभागे बाप के मुखड़े से एक आँख को लिकड़े हुए अभागे भाई के कांधे से एक बाज़ू को उखड़े हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया ख़ुशियों को घर छोड़े हुए ख़ुदा को मुक़द्दर फोड़े हुए घर की तरफ़ सैलाब को मोड़े हुए मेरी नींद को छीने ख़्वाब को तोड़े हुए डाॅक्टर के पैरो में लौटे हुए हाथों को जोड़े हुए तुझ को ये दुनिया छोड़े हुए मुझे दुनिया से सब नाते तोड़े हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया घर में उदासी को छाए हुए इन होंटों पर हॅंसी को आए हुए पिताजी को क़िस्से सुनाए हुए बगिया में फूलों को आए हुए ऑंगन में सन्नाटा छाए हुए पीठ पर तेरा चाटा खाए हुए मुझ को गाना गाए हुए जी से कोई खाना खाए हुए दिल को पत्थर करे हुए याद में तेरी आँसू बहाए हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया मुझे कुछ लिखे हुए तुझे कहीं दिखे हुए मुझे चैन से सोए हुए तेरी याद में खोए हुए तेरी आवाज़ सुने हुए तेरे साथ तारों को गिने हुए तुझे मुझ सेे छीने हुए आज बारह महीने हुए ख़ुश रंग ख़्वाबों को किसी नज़र की आग में जले हुए हमारे आशियाँ के सूरज को ढले हुए जिन में मिस्मार हो गई झोपड़ी अपनी उन ऑंधियों को चले हुए इन आँखों और रुख़सारों को गिले हुए मुझे तुझ से मिले हुए मेरी बेटी आज एक साल हो गया भरने थे जो ज़ख़्म जिगर के वक़्त के साथ सिर्फ़ गहरे हुए हैं हम समुंदर में डूबी उस कश्ती की राह में आज भी किनारे पर ठहरे हुए हैं हर किसी ने शुरू में कहा था “ह में भी दर्द बस शुरू में रहा था” अभी यक़ीन नहीं होगा दिल भी ग़मगीन नहीं होगा एक वक़्त पर जा चुका है दिल मान जाता है एक वक़्त के बा'द हर दर्द दवा बन जाता है मगर न जाने क्यूँ ये दर्द तो बढ़ता जाता है मुझे सुकून नहीं मिल पाता है कैसी ज़ुल्मत बढ़ती जाती है मेरी हिम्मत टूटती जाती है जब लौट के तुम नहीं आती हो ये दीवाली क्यूँ आ जाती है मुझ को ये मालूम भी है लौट के नहीं कभी आते हैं अब तुम जिस जहाँ में रहती हो पर तुम कब जहाँ में रहती हो तुम तो आब ओ हवा में बहती हो ये तेरा भैया तेरे पापा तेरी मैया ये चंदा तारे जुगनू दीपक फूल ओ कलियाँ ये सूनी गलियाँ और हम सब तुझ को खोजते रहते हैं हम सब तुझ को सोचते रहते हैं सब सेे कहते रहते हैं यहीं है वो कहीं नहीं गई है वो मेरे दिल में रहती है वो मुझ सेे मिलती रहती है ख़्वाबों में वीरान दिल के उजड़े गुलशन में मेरे तन में मेरे मन में इस चमन में होली के रंगों में पिचकारी में गुब्बारों में दिवाली की फुलझड़ियो में चकरी में अनारों में रंगोली के रंगों में दिए में लड़ियों में खिड़की पर बैठी गिलहरी में चिड़ियों में नौ रातों की नौ देवियों में जिमती है पहले आरती करती थी अब कराती है मुझ को बेहद रुलाती है मुझे भैया कह के बुलाती है छत की कड़ी में दीवार की घड़ी में हर पल टक-टक करती है मेरे भीतर मेरे दिल के ऑंगन में खेल खेलती वो हर पल बक-बक करती है ठंडी रात के घोर सन्नाटे में वो मेरी ग़ज़लें गाती है आज खुल्द में क्या-क्या हुआ रात को आके बताती है मैं गले लगाने को उठता हूँ आँख खुलती है गुम हो जाती है ऐसा होते हुए मुझ को रोते हुए एक साल हो गया
Chhayank Tyagi
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"बहुत याद आते हो तुम" गर तन्हा सफ़र हो और लंबी डगर हो हो राहें भी मुश्क़िल बेगाना शहर हो जिधर भी मैं देखूँ नज़र में हो तुम्हीं गुलाबों के पाक़ी शजर में हो तुम्हीं है आँखों में मेरी अब आँसू की धारा मैं ख़ुद से हूँ जीता और अपनों से हारा अँधेरों से अब भी मैं डरता हूँ पापा मैं तुम को बहुत याद करता हूँ पापा दीवारों में अक्सर क्यूँ आते हो तुम क्यूँ ख़ल्वत में मुझ को रुलाते हो तुम बहुत याद आते हो तुम बहुत याद आते हो तुम
"Nadeem khan' Kaavish"
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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"मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है" तू सब सेे जुदा है तू सब सेे हसीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है ज़माने में तुझ सेा न कोई कहीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे देख कर ही निकलता है सूरज तुझे देख कर रोज़ ढलता है सूरज तू इक बा-वज़ू अप्सरा है मिरी जाँ ख़ुदा भी तो तुझ पे फ़िदा है मिरी जाँ तुझी से मोहब्बत करेगा यक़ीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे काम सब छोड़ कर देखते हैं बिना बात के फूल भी फेंकते हैं कि मुम्ताज़ भी तेरे जैसी नहीं है यहाँ एक तू ही महा-सुंदरी है बहुत ख़ूब-सूरत है ज़ोहरा-जबीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है
Prashant Kumar
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“बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है” बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है ये बताओ आग में क्या घी मिलाना ठीक है बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है क़र्ज़ में डूबी हुई है ज़िंदगी मेरी नहीं हाथ में रोटी नहीं है आँख में पानी नहीं हर तरफ़ बर्बादियों का सोग है बरपा हुआ रोज़ अकेले रो रहा हूँ राह में बैठा हुआ ऐसे में इस हम-नशीं का मुस्कुराना ठीक है बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है ज़िंदगी की हर निशानी रात मैं ने फोड़ दी कल ख़ुदा के हाथ की ज़ंजीर मैं ने तोड़ दी रो रहा था कल मगर वो अश्क भी मेरा न था ख़्वाब देखा था मगर वो ख़्वाब भी मेरा न था तुम बताओ ख़्वाब ऐसे में सजाना ठीक है बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है तेरे घर के लोग मेरी चौकसी में बैठते रात दिन चौराहे पे बस ताश ही हैं फेंटते इक तरफ़ आवारा कुत्ते इक तरफ़ है ज़ालिमा डर रहा हूँ बन न जाए आज मेरा सालिमा तुम बताओ रात को छत पर बुलाना ठीक है बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है बख़्श दे हम पहले से हैं दर्द के मारे हुए हम भी हैं तेरी तरह भगवान के तारे हुए मोल जो भी हो मोहब्बत का चुका देंगे सनम चीज़ क्या हैं हम तुझे ये भी दिखा देंगे सनम ऐसे सबके सामने उँगली उठाना ठीक है बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है
Prashant Kumar
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" गुलज़ार साहब के नाम" आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन बचपन में ही जुदा हुए थे वो अपने घर वालों से दिल में उन्होंने क्या बतलाऊँ दर्द हज़ारों पाले थे फिर भी उन के जीने के सब अंदाज़ निराले थे हाल सुनाया है बस मैं ने लफ़्ज़ों में गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन घर से निकले जीते रहे ऐसे ही तन्हाई में भूखे प्यासे चलते रहे धूप कड़ी पुरवाई में ख़ून-पसीना एक किया जीवन की गहराई में ऐसे हासिल थोड़ी हुआ नाम उन्हें गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन माँ का लाड़ मिला उन को न ही पिता का प्यार मिला समझा पराया अपनों ने ऐसा उन्हें घर द्वार मिला तुम क्या जानो जीवन में उन को क्या किरदार मिला हँस के निभाया हर रिश्ता जीवन के किरदार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन गीतों का गुलशन चमका क़लमों की हरियाली से झूम उठी थी शहनाई उन के सुरों की लाली से उन की क़लम के चर्चे तुम सुन लो हर दिलवाले से राज़ रहेगा दुनिया की क़लमों पे गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन सुख में दुख में साथ दिया अपनाया था राखी को जग में फिर मशहूर किया कितनों की आवाज़ों को ढूँढ़ रहा हूँ महफ़िल में आज उन के अफ़साने को हर फ़नकार पे कर्म हुआ राखी के गुलज़ार का सुन आज के दिन ही दीना में जन्म हुआ गुलज़ार का सुन याद में उन की पेश किया अफ़साना गुलज़ार का सुन
Prashant Kumar
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"दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है" अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है होंठों पे मिरे प्यार का पैग़ाम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है ये रोग जवानी में सभी को ही लगा है बिन इश्क़ मोहब्बत के भला किस का हुआ है ऐसा है यहाँ कौन जो बदनाम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है मतलब की मोहब्बत से परेशान रहा हूँ मैं क्यूँँकि यहाँ बनके इक इंसान रहा हूँ कैसा भी कहीं दिल को अब आराम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है लोगों ने मोहब्बत का यहाँ ढोंग रचाया वादे सभी झूटे किए इल्ज़ाम लगाया मुझ सा कोई आशिक़ कहीं बदनाम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है मैं जाऊँ जिधर लोग हँसी मेरी उड़ाते पागल भी बताते हैं मुझे फिर भी सताते मालिक तिरी दुनिया में मिरा काम नहीं है अब इश्क़ मोहब्बत से कोई काम नहीं है क्यूँँ दिल की किताबों में मिरा नाम नहीं है
Prashant Kumar
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"तू वही लड़की है मैं भी वही लड़का हूँ" क्या याद है गोरी बचपन में दिल तू ने रखा था अचकन में दिल तुझ सेे मैं ने माँगा था फिर ठेंगा तू ने दिखाया था तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ दिल धड़कन एक मिनट में सब आपस में जितनी बार मिले हम दोनों भी इक दूजे से इक दिन में उतनी बार मिले जब मुझ सेे ग़लती होती थी तू पागल कह के चिढ़ाती थी पीछे से दुबारा आती थी तू छेड़ के मुझ को जाती थी पर जब लगती थी चोट मुझे तू दूर से रोने लगती थी जल्दी से भाग के आती थी सीने से मुझ को लगाती थी कहती थी सॉरी कान पकड़ तू दारू दवा सब करती थी तू साथ में मेरे खेली है मैं साथ में तेरे खेला हूँ तू लड़की हाई-फाई है और मैं लड़का अलबेला हूँ तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ मैं रोज़ तिरे घर आता था तू रोज़ मिरे घर आती थी स्कूल को दोनों जाते थे तू मुझ को रोज़ बुलाती थी तू मुझ को घर पे पढ़ाती थी और हाथों से लिखवाती थी कितनी शैतानी करता था तू कान पकड़ के रखती थी मैं आँख से ओझल होता था फिर तू भी डरने लगती थी तू मुझ को ढूँढती थी सब में तू मुझ को देखती थी सब में तू जान बताती थी मुझ को हाथों से खिलाती थी मुझ को मैं शाम सवेरे जान-ए-मन तेरी गोदी में सोया हूँ तू सच में वो ही लड़की है मैं सच में वो ही लड़का हूँ तू मुझ सेे मोहब्बत करती है मैं तुझ सेे मोहब्बत करता हूँ
Prashant Kumar
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