ये बातें हैं जवानी की कहानी है जवानी है जवानी में कि क़ुव्वत बाज़ुओं में है वही है उम्र जो अक्सर सबब बनती है जुरअत का व शोहरत का ये बातें हैं जवानी की कहानी है जवानी की बना कर तेग़ जिस को शह-सवारों ने अखाड़े ज़ुल्म-ओ-ज़िल्लत के सभी लश्कर ज़मीं पर से समुंदर से ये बातें हैं जवानी की कहानी है मगर दौर-ए-जवानी ये बहार-ए-ज़िंदगी बन कर नहीं आया मेरे घर में रहा रूखा सहन मेरा ज़ेहन मेरा ये बातें हैं जवानी की कहानी है यहाँ कुछ उलझनें थी यूँँ ज़ेहन का रोग बन कर के जिन्हों ने मुझ को खाया है जलाया है मुझे हर दिन घड़ी गिन गिन ये बातें हैं जवानी की कहानी है किसी नज़दीक वाले ने फ़रेब ऐसा दिया कि बस यक़ीं मेरा सभी जग से उठा बिल्कुल उठा यक-दम रहा बस ग़म ये बातें हैं जवानी की कहानी है परिंदा हूँ नहीं हैं पर हैं तलवारें मियानों में नहीं जाता हूँ जंगों में किसी घर में किसी दिल में न महफ़िल में ये बातें हैं जवानी की कहानी है मैं बदबख़्तों का वारिस हूँ निअंडरथल से ले कर के ये होमो-सेपियन कितने जले यूँँही कहानी में जवानी में
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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ऐ नाज़िर-ए-बे-ख़बर अब तुम ना ही आओ तो अच्छा है अब यहाँ फिर शुरूअ' से शुरूअ' कौन करे लम्हा लम्हा शब-ए-ग़म का यूँँ अदू कौन करे होंट सूखे हैं इन्हें फिर से कमाँ कौन करे दीद को चश्मा-ओ-शमशीर ज़बाँ कौन करे शाम को फिर से चराग़ाँ करूँँ हिम्मत ही नहीं क़िस्से वो फिर से सुनाऊँ तुझे क़ुव्वत ही नहीं जो दरिया बह गया वो फिर न लौट कर आता हूँ अदाकार अदाकारी नहीं कर पाता तू मुझे अब के किसी और मोड़ पर मिलना नया हो ज़ख़्म बहे फिर कोई ख़ूँ का झरना ये ज़िंदगी है तमाशा क्या तुझे इल्म नहीं जो लम्हा टल गया सो टल गया ये फ़िल्म नहीं ऐ नाज़िर-ए-बे-ख़बर अब तुम ना ही आओ तो अच्छा है
Om Bhutkar Maghloob
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हो तसव्वुर इश्क़ का और हो स्याही रात की उम्र नाज़ुक मोम सी हो याद हो इस बात की शहर की ठंडी हवा चेहरे पे मैं लेता हुआ ख़ुश-नसीबी का वो इम्काँ जैसे हो पहला जुआ थक गए जो शोर से तो घर को जाए मय पिए टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए उम्र जैसे कट रही हो और घटती भी न हो इश्क़ की काली घटा हो और छटती भी न हो उस के ख़त की राह देखूँ वक़्त मैं ज़ाएअ'' करूँँ और उस के ख़्वाब में भी काश मैं आया करूँँ ख़ुशबू यक दम फूल की हो हो धुएँ के सिलसिले टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए हो सुहानी तख़लिया हो ग़म जो टलने वाला हो यार मेरा साथ मेरे आह भरने वाला हो जैसे सड़कें भी यहाँ बिस्तर के जैसी नर्म हों हो तो सर्दी सर्द लेकिन लम्स उस का गर्म हो मेरी अदना ज़िंदगी हो उस के अदना मरहले टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए ये भी तोड़े जा रहे हो आशियाँ बनने तो दो मैं तो बूढ़ा भी नहीं नॉस्टेलजिया बनने तो दो कल्परिक्ष और आब आब-ए-कौसर सोचते हो दौर की शर्म है गर चाह हो उस शहर में भी हूर की जन्नतों का है तसव्वुर बस यही मेरे लिए टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए मुझ को झरनों की हवस नई और कँवल न ही झील की मुझ को चिढ़ भी है नहीं इस फ़ैक्टरी उस मील की इक बचा है लाल सूरज उस को तो तुम रहने दो उस के मुखड़े का जो टुकड़ा चाँद वो तो रहने दो वर्ना फिर तो इस शहर में क्या मरे और क्या जिए टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए
Om Bhutkar Maghloob
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झील किनारे रहने वाली मोती जैसे चेहरे वाली तुम को मेरी ख़बर नहीं है एक हमारा शहर नहीं है गुंजाइश भी नहीं है कोई कभी मिलेंगे हम दो राही या'नी दूर के ढोल हुनूज़ इक दूजे से हैं महफ़ूज़ इश्क़ कि ख़ातिर बिल्कुल ठीक कभी न आएँगे नज़दीक उसे सुहूलत जान के मैं ने दिल वाली हो मान के मैं ने अपनी तरफ़ से बिना इजाज़त शुरूअ' भी कर दी तुम से मोहब्बत आओ देखो झील किनारा खड़ा हूँ मैं उम्मीद का मारा
Om Bhutkar Maghloob
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