ऐ नाज़िर-ए-बे-ख़बर अब तुम ना ही आओ तो अच्छा है अब यहाँ फिर शुरूअ' से शुरूअ' कौन करे लम्हा लम्हा शब-ए-ग़म का यूँँ अदू कौन करे होंट सूखे हैं इन्हें फिर से कमाँ कौन करे दीद को चश्मा-ओ-शमशीर ज़बाँ कौन करे शाम को फिर से चराग़ाँ करूँँ हिम्मत ही नहीं क़िस्से वो फिर से सुनाऊँ तुझे क़ुव्वत ही नहीं जो दरिया बह गया वो फिर न लौट कर आता हूँ अदाकार अदाकारी नहीं कर पाता तू मुझे अब के किसी और मोड़ पर मिलना नया हो ज़ख़्म बहे फिर कोई ख़ूँ का झरना ये ज़िंदगी है तमाशा क्या तुझे इल्म नहीं जो लम्हा टल गया सो टल गया ये फ़िल्म नहीं ऐ नाज़िर-ए-बे-ख़बर अब तुम ना ही आओ तो अच्छा है
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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हो तसव्वुर इश्क़ का और हो स्याही रात की उम्र नाज़ुक मोम सी हो याद हो इस बात की शहर की ठंडी हवा चेहरे पे मैं लेता हुआ ख़ुश-नसीबी का वो इम्काँ जैसे हो पहला जुआ थक गए जो शोर से तो घर को जाए मय पिए टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए उम्र जैसे कट रही हो और घटती भी न हो इश्क़ की काली घटा हो और छटती भी न हो उस के ख़त की राह देखूँ वक़्त मैं ज़ाएअ'' करूँँ और उस के ख़्वाब में भी काश मैं आया करूँँ ख़ुशबू यक दम फूल की हो हो धुएँ के सिलसिले टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए हो सुहानी तख़लिया हो ग़म जो टलने वाला हो यार मेरा साथ मेरे आह भरने वाला हो जैसे सड़कें भी यहाँ बिस्तर के जैसी नर्म हों हो तो सर्दी सर्द लेकिन लम्स उस का गर्म हो मेरी अदना ज़िंदगी हो उस के अदना मरहले टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए ये भी तोड़े जा रहे हो आशियाँ बनने तो दो मैं तो बूढ़ा भी नहीं नॉस्टेलजिया बनने तो दो कल्परिक्ष और आब आब-ए-कौसर सोचते हो दौर की शर्म है गर चाह हो उस शहर में भी हूर की जन्नतों का है तसव्वुर बस यही मेरे लिए टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए मुझ को झरनों की हवस नई और कँवल न ही झील की मुझ को चिढ़ भी है नहीं इस फ़ैक्टरी उस मील की इक बचा है लाल सूरज उस को तो तुम रहने दो उस के मुखड़े का जो टुकड़ा चाँद वो तो रहने दो वर्ना फिर तो इस शहर में क्या मरे और क्या जिए टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए
Om Bhutkar Maghloob
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झील किनारे रहने वाली मोती जैसे चेहरे वाली तुम को मेरी ख़बर नहीं है एक हमारा शहर नहीं है गुंजाइश भी नहीं है कोई कभी मिलेंगे हम दो राही या'नी दूर के ढोल हुनूज़ इक दूजे से हैं महफ़ूज़ इश्क़ कि ख़ातिर बिल्कुल ठीक कभी न आएँगे नज़दीक उसे सुहूलत जान के मैं ने दिल वाली हो मान के मैं ने अपनी तरफ़ से बिना इजाज़त शुरूअ' भी कर दी तुम से मोहब्बत आओ देखो झील किनारा खड़ा हूँ मैं उम्मीद का मारा
Om Bhutkar Maghloob
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ये बातें हैं जवानी की कहानी है जवानी है जवानी में कि क़ुव्वत बाज़ुओं में है वही है उम्र जो अक्सर सबब बनती है जुरअत का व शोहरत का ये बातें हैं जवानी की कहानी है जवानी की बना कर तेग़ जिस को शह-सवारों ने अखाड़े ज़ुल्म-ओ-ज़िल्लत के सभी लश्कर ज़मीं पर से समुंदर से ये बातें हैं जवानी की कहानी है मगर दौर-ए-जवानी ये बहार-ए-ज़िंदगी बन कर नहीं आया मेरे घर में रहा रूखा सहन मेरा ज़ेहन मेरा ये बातें हैं जवानी की कहानी है यहाँ कुछ उलझनें थी यूँँ ज़ेहन का रोग बन कर के जिन्हों ने मुझ को खाया है जलाया है मुझे हर दिन घड़ी गिन गिन ये बातें हैं जवानी की कहानी है किसी नज़दीक वाले ने फ़रेब ऐसा दिया कि बस यक़ीं मेरा सभी जग से उठा बिल्कुल उठा यक-दम रहा बस ग़म ये बातें हैं जवानी की कहानी है परिंदा हूँ नहीं हैं पर हैं तलवारें मियानों में नहीं जाता हूँ जंगों में किसी घर में किसी दिल में न महफ़िल में ये बातें हैं जवानी की कहानी है मैं बदबख़्तों का वारिस हूँ निअंडरथल से ले कर के ये होमो-सेपियन कितने जले यूँँही कहानी में जवानी में
Om Bhutkar Maghloob
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