nazmKuch Alfaaz

झील किनारे रहने वाली मोती जैसे चेहरे वाली तुम को मेरी ख़बर नहीं है एक हमारा शहर नहीं है गुंजाइश भी नहीं है कोई कभी मिलेंगे हम दो राही या'नी दूर के ढोल हुनूज़ इक दूजे से हैं महफ़ूज़ इश्क़ कि ख़ातिर बिल्कुल ठीक कभी न आएँगे नज़दीक उसे सुहूलत जान के मैं ने दिल वाली हो मान के मैं ने अपनी तरफ़ से बिना इजाज़त शुरूअ' भी कर दी तुम से मोहब्बत आओ देखो झील किनारा खड़ा हूँ मैं उम्मीद का मारा

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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ऐ नाज़िर-ए-बे-ख़बर अब तुम ना ही आओ तो अच्छा है अब यहाँ फिर शुरूअ' से शुरूअ' कौन करे लम्हा लम्हा शब-ए-ग़म का यूँँ अदू कौन करे होंट सूखे हैं इन्हें फिर से कमाँ कौन करे दीद को चश्मा-ओ-शमशीर ज़बाँ कौन करे शाम को फिर से चराग़ाँ करूँँ हिम्मत ही नहीं क़िस्से वो फिर से सुनाऊँ तुझे क़ुव्वत ही नहीं जो दरिया बह गया वो फिर न लौट कर आता हूँ अदाकार अदाकारी नहीं कर पाता तू मुझे अब के किसी और मोड़ पर मिलना नया हो ज़ख़्म बहे फिर कोई ख़ूँ का झरना ये ज़िंदगी है तमाशा क्या तुझे इल्म नहीं जो लम्हा टल गया सो टल गया ये फ़िल्म नहीं ऐ नाज़िर-ए-बे-ख़बर अब तुम ना ही आओ तो अच्छा है

Om Bhutkar Maghloob

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हो तसव्वुर इश्क़ का और हो स्याही रात की उम्र नाज़ुक मोम सी हो याद हो इस बात की शहर की ठंडी हवा चेहरे पे मैं लेता हुआ ख़ुश-नसीबी का वो इम्काँ जैसे हो पहला जुआ थक गए जो शोर से तो घर को जाए मय पिए टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए उम्र जैसे कट रही हो और घटती भी न हो इश्क़ की काली घटा हो और छटती भी न हो उस के ख़त की राह देखूँ वक़्त मैं ज़ाएअ'' करूँँ और उस के ख़्वाब में भी काश मैं आया करूँँ ख़ुशबू यक दम फूल की हो हो धुएँ के सिलसिले टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए हो सुहानी तख़लिया हो ग़म जो टलने वाला हो यार मेरा साथ मेरे आह भरने वाला हो जैसे सड़कें भी यहाँ बिस्तर के जैसी नर्म हों हो तो सर्दी सर्द लेकिन लम्स उस का गर्म हो मेरी अदना ज़िंदगी हो उस के अदना मरहले टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए ये भी तोड़े जा रहे हो आशियाँ बनने तो दो मैं तो बूढ़ा भी नहीं नॉस्टेलजिया बनने तो दो कल्परिक्ष और आब आब-ए-कौसर सोचते हो दौर की शर्म है गर चाह हो उस शहर में भी हूर की जन्नतों का है तसव्वुर बस यही मेरे लिए टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए मुझ को झरनों की हवस नई और कँवल न ही झील की मुझ को चिढ़ भी है नहीं इस फ़ैक्टरी उस मील की इक बचा है लाल सूरज उस को तो तुम रहने दो उस के मुखड़े का जो टुकड़ा चाँद वो तो रहने दो वर्ना फिर तो इस शहर में क्या मरे और क्या जिए टार की लंबी सड़क हो उस पे हों पीले दिए

Om Bhutkar Maghloob

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ये बातें हैं जवानी की कहानी है जवानी है जवानी में कि क़ुव्वत बाज़ुओं में है वही है उम्र जो अक्सर सबब बनती है जुरअत का व शोहरत का ये बातें हैं जवानी की कहानी है जवानी की बना कर तेग़ जिस को शह-सवारों ने अखाड़े ज़ुल्म-ओ-ज़िल्लत के सभी लश्कर ज़मीं पर से समुंदर से ये बातें हैं जवानी की कहानी है मगर दौर-ए-जवानी ये बहार-ए-ज़िंदगी बन कर नहीं आया मेरे घर में रहा रूखा सहन मेरा ज़ेहन मेरा ये बातें हैं जवानी की कहानी है यहाँ कुछ उलझनें थी यूँँ ज़ेहन का रोग बन कर के जिन्हों ने मुझ को खाया है जलाया है मुझे हर दिन घड़ी गिन गिन ये बातें हैं जवानी की कहानी है किसी नज़दीक वाले ने फ़रेब ऐसा दिया कि बस यक़ीं मेरा सभी जग से उठा बिल्कुल उठा यक-दम रहा बस ग़म ये बातें हैं जवानी की कहानी है परिंदा हूँ नहीं हैं पर हैं तलवारें मियानों में नहीं जाता हूँ जंगों में किसी घर में किसी दिल में न महफ़िल में ये बातें हैं जवानी की कहानी है मैं बदबख़्तों का वारिस हूँ निअंडरथल से ले कर के ये होमो-सेपियन कितने जले यूँँही कहानी में जवानी में

Om Bhutkar Maghloob

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