कुछ काम करो कुछ काम करो दुनिया में पैदा नाम करो दिन भर मेहनत में शाद रहो जब रात पड़े आराम करो अंजाम ख़ुदा के हाथ में है तुम कोशिश सुब्ह-ओ-शाम करो तकलीफ़ से राहत मिलती है ये सौदा लो वो दाम करो हिम्मत से आगे बढ़ जाओ बढ़ कर हासिल इनआ'म करो हमदर्दी से ग़म-ख़्वारी से हर शख़्स के दिल को राम करो लोगों में तुम्हारी क़द्र बढ़े बच्चो कोई ऐसा काम करो ता'लीम जहाँ में फैलाओ इस 'फ़ैज़' का चर्चा आम करो
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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वो बशर जो पढ़ के भी कहता हो यूँँ बन के तालिब और कुछ हासिल करूँँ कोई शक उस की फ़ज़ीलत में नहीं उस का रुत्बा है फ़रिश्तों से फ़ुज़ूँ वो बशर कुछ भी न आता हो जिसे लेकिन उस को शौक़ हो आलिम बनूँ अपनी बे-इल्मी का उस को इल्म है ना-मुनासिब है उसे जाहिल गिनूँ वो बशर जो हो निरा अहमक़ मगर ख़ुद समझता हो कि दानिश-मंद हूँ मौत है उस की हिमाक़त का इलाज वो रहेगा उम्र भर ख़्वार-ओ-ज़बूँ हर बशर ऐ 'फ़ैज़' ये कोशिश करे जिस तरह भी हो जहालत से बचूँ
Faiz Ludhianvi
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जिस क़दर दुनिया में मख़्लूक़ात है सब से अशरफ़ आदमी की ज़ात है इस की पैदाइश में है उल्फ़त का राज़ इस की हस्ती पर है ख़ुद ख़ालिक़ को नाज़ इस की ख़ातिर कुल जहाँ पैदा हुआ ये ज़मीं ये आसमाँ पैदा हुआ अक़्ल का जौहर इसे बख़्शा गया इल्म का ज़ेवर इसे बख़्शा गया इस के सर में है निहाँ ऐसा दिमाग़ जिस में रौशन है लियाक़त का चराग़ सोच कर हर काम कर सकता है ये शे'र को भी राम कर सकता है ये ये सफ़ाई से चटानें तोड़ दे अपनी दानाई से दरिया मोड़ दे मन-चला है इस की हिम्मत है बुलंद डाल सकता है सितारों पर कमंद इस को ख़तरों की नहीं पर्वा ज़रा आग में कूदा ये सूली पर चढ़ा इस के हर अंदाज़ में ए'जाज़ है अर्श तक इस नूर की परवाज़ है इस की बातों में अजब तासीर है ख़ाक का पुतला नहीं इक्सीर है ये अगर नेकी के ज़ीने पर चढ़े एक दिन सारे फ़रिश्तों से बढ़े और अगर इस्याँ की दलदल में फँसे इस का दर्जा कम हो हैवानात से ये कभी रुई से बढ़ कर नर्म है ये कभी सूरज से बढ़ कर गर्म है एक हालत पर नहीं इस का मिज़ाज हर ज़माने में बदलता है रिवाज और था पहले ये अब कुछ और है आए दिन इस का निराला तौर है इस ने बेहद रूप बदले आज तक इस की तदबीरों से हैराँ है फ़लक डॉक्टर ताजिर प्रोफ़ेसर वकील इन का होना है तरक़्क़ी की दलील इस के पहलू में वो दिल मौजूद है जो भड़कने में निरा बारूद है रेल गाड़ी रेडियो मोटर जहाज़ इस की ईजादों का क़िस्सा है दराज़ दस्त-कारी में बड़ा मश्शाक़ है जिद्दतों का हर घड़ी मुश्ताक़ है खोल आँखें जंग की रफ़्तार देख देख इस के ख़ौफ़नाक औज़ार देख ये कहीं हाकिम कहीं महकूम है ये कहीं ज़ालिम कहीं मज़लूम है आदमी जब ग़ैर के आगे झुका आदमिय्यत से भटकता ही गया आदमी मिलना बहुत दुश्वार है ख़ुद ख़ुदा को आदमी दरकार है प्यारे बच्चो आदमी बन कर रहो हर किसी के साथ हमदर्दी करो सच अगर पूछो तो बस वो मर्द है जिस के दिल में दूसरों का दर्द है 'फ़ैज़' पहुँचाता नहीं जो आदमी उस को अपनी ज़ात से है दुश्मनी उस को अपनी ज़ात से है दुश्मनी
Faiz Ludhianvi
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उठ अज़-सर-ए-नौ दहर के हालात बदल डाल तदबीर से तक़दीर के दिन-रात बदल डाल फिर दरस-ए-मुसावात की हाजत है जहाँ को आक़ाई-ओ-ख़िदमत के ख़िताबात बदल डाल काला हो कि गोरा हो ख़ुदा एक है सब का क़ौमिय्यत-ए-बेजा की रिवायात बदल डाल चीनी हो कि हिन्दी हो बराबर के हैं भाई वतनिय्यत-ए-महदूद के वहमात बदल डाल कुल छोटे-बड़े आदम-ए-ख़ाकी के हैं फ़रज़ंद हर नस्ल से बेज़ार हो हर ज़ात बदल डाल अख़्लाक़ में ताक़त है फ़ुज़ूँ तेग़-ओ-सिनाँ से पैकार के ये आहनी आलात बदल डाल क्या ज़ुल्म है इंसान हो इंसान का दुश्मन मरदान-ए-हवस-कार की आदात बदल डाल मेहनत से भी मज़दूर को रोटी नहीं मिलती इस बंदा-ए-मजबूर के औक़ात बदल डाल आपस में ये हर रोज़ की ख़ूँ-रेज़ियाँ कब तक ख़ुद-साख़्ता मज़हब की रूसूमात बदल डाल हुर्रियत-ए-कामिल का वो ए'जाज़ दिखा तू दुनिया-ए-ग़ुलामी के तिलिस्मात बदल डाल ख़िल्क़त को बुला शिर्क से तौहीद की जानिब पीरों की फ़क़ीरों की करामात बदल डाल ता'लीम पे मौक़ूफ़ है रानाई-ए-अफ़कार बेहूदा किताबों की ख़ुराफ़ात बदल डाल कर फ़िक्र-ए-अमल ज़िक्र-ए-ख़त-ओ-ख़ाल अबस है ऐ 'फ़ैज़' ज़रा अपने ख़यालात बदल डाल
Faiz Ludhianvi
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इस में क्या शक है तिजारत बादशाही काज है ग़ौर कर के देख लो ताजिर के सर पर ताज है हिन्द की तारीख़ पढ़ कर ही सबक़ हासिल करो जो तिजारत करने आए थे अब उन का राज है ज़िंदा रह सकता नहीं हरगिज़ तिजारत के बग़ैर हम ने ये माना कि यूरोप मरकज़-ए-अफ़्वाज है हर दुकान अपनी जगह है एक छोटी सल्तनत नफ़ा कहते हैं जिसे दर-अस्ल उस का बाज है जुज़ तिजारत क़ौम की मुल्की सियासत कुछ नहीं लुत्फ़-ए-आज़ादी इसी में है यही स्वराज है ज़िंदगी की रिफ़अ'तों से है तिजारत ही मुराद हाँ यही बाम-ए-तरक़्क़ी है यही मे'राज है मर्द-ए-ताजिर को ख़ुदा की ज़ात पर है ए'तिमाद मर्द-ए-चाकर हर घड़ी अग़्यार का मुहताज है जब से हम ग़ैरों के आगे झुक गए मिस्ल-ए-कमाँ तब से अपना दिल सितम के तीर का आमाज है चल रही हैं ज़ोर से बेकारियों की आँधियाँ नौजवाँ का गुल्सितान-ए-ज़िंदगी ताराज है ये ज़रूरी काम कल पर टालना अच्छा नहीं बिल-यक़ीं हम को तिजारत की ज़रूरत आज है वाए हसरत क्यूँ तुम्हारी अक़्ल पर पत्थर पड़े जिस को तुम कंकर समझते हो वही पुखराज है फिर ख़रीदो ब्याह का सामान पहले जान लो बस तिजारत ही उरूस-ए-क़ौमीयत का राज है वो हमेशा क़द्र करते हैं स्वदेशी माल की क़ौम का एहसास है जिन को वतन की लाज है ख़ूब मोती रोलते हैं ताजिरान-ए-बा-सफ़ा 'फ़ैज़' बाज़ार-ए-तिजारत क़ुल्ज़ुम-ए-मव्वाज है
Faiz Ludhianvi
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तेज़ सी तलवार सादा सा क़लम बस यही दो ताक़तें हैं बेश-ओ-कम एक है जंगी शुजाअ'त का निशाँ एक है इल्मी लियाक़त का निशाँ आदमी की ज़िंदगी दोनों से है क़ौम की ताबिंदगी दोनों से है जो नहीं डरते क़लम की मार से ज़ेर करते हैं उन्हें तलवार से जब क़लम पाता नहीं कोई सबील उस घड़ी तलवार है रौशन दलील हुक्मरानी को क़लम दरकार है अम्न की ज़ामिन मगर तलवार है इल्म के मैदान में 'राज़ी' बनो जंग के मैदान में ग़ाज़ी बनो वक़्त पर मज़मून लिक्खो ज़ोर-दार वक़्त पर डट कर लड़ो मर्दाना-वार वो पढ़े लिक्खे जो बे-तलवार हैं उन की सारी डिग्रियाँ बे-कार हैं बज़्म में अश'आर के गौहर मुफ़ीद रज़्म में तलवार के जौहर मुफ़ीद आज तक जो भी हुआ है बा-वक़ार था कोई जरनैल या मज़मूँ-निगार 'फ़ैज़' को जितना क़लम से प्यार है उतनी ही प्यारी उसे तलवार है
Faiz Ludhianvi
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