nazmKuch Alfaaz

इस में क्या शक है तिजारत बादशाही काज है ग़ौर कर के देख लो ताजिर के सर पर ताज है हिन्द की तारीख़ पढ़ कर ही सबक़ हासिल करो जो तिजारत करने आए थे अब उन का राज है ज़िंदा रह सकता नहीं हरगिज़ तिजारत के बग़ैर हम ने ये माना कि यूरोप मरकज़-ए-अफ़्वाज है हर दुकान अपनी जगह है एक छोटी सल्तनत नफ़ा कहते हैं जिसे दर-अस्ल उस का बाज है जुज़ तिजारत क़ौम की मुल्की सियासत कुछ नहीं लुत्फ़-ए-आज़ादी इसी में है यही स्वराज है ज़िंदगी की रिफ़अ'तों से है तिजारत ही मुराद हाँ यही बाम-ए-तरक़्क़ी है यही मे'राज है मर्द-ए-ताजिर को ख़ुदा की ज़ात पर है ए'तिमाद मर्द-ए-चाकर हर घड़ी अग़्यार का मुहताज है जब से हम ग़ैरों के आगे झुक गए मिस्ल-ए-कमाँ तब से अपना दिल सितम के तीर का आमाज है चल रही हैं ज़ोर से बेकारियों की आँधियाँ नौजवाँ का गुल्सितान-ए-ज़िंदगी ताराज है ये ज़रूरी काम कल पर टालना अच्छा नहीं बिल-यक़ीं हम को तिजारत की ज़रूरत आज है वाए हसरत क्यूँ तुम्हारी अक़्ल पर पत्थर पड़े जिस को तुम कंकर समझते हो वही पुखराज है फिर ख़रीदो ब्याह का सामान पहले जान लो बस तिजारत ही उरूस-ए-क़ौमीयत का राज है वो हमेशा क़द्र करते हैं स्वदेशी माल की क़ौम का एहसास है जिन को वतन की लाज है ख़ूब मोती रोलते हैं ताजिरान-ए-बा-सफ़ा 'फ़ैज़' बाज़ार-ए-तिजारत क़ुल्ज़ुम-ए-मव्वाज है

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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जिस क़दर दुनिया में मख़्लूक़ात है सब से अशरफ़ आदमी की ज़ात है इस की पैदाइश में है उल्फ़त का राज़ इस की हस्ती पर है ख़ुद ख़ालिक़ को नाज़ इस की ख़ातिर कुल जहाँ पैदा हुआ ये ज़मीं ये आसमाँ पैदा हुआ अक़्ल का जौहर इसे बख़्शा गया इल्म का ज़ेवर इसे बख़्शा गया इस के सर में है निहाँ ऐसा दिमाग़ जिस में रौशन है लियाक़त का चराग़ सोच कर हर काम कर सकता है ये शे'र को भी राम कर सकता है ये ये सफ़ाई से चटानें तोड़ दे अपनी दानाई से दरिया मोड़ दे मन-चला है इस की हिम्मत है बुलंद डाल सकता है सितारों पर कमंद इस को ख़तरों की नहीं पर्वा ज़रा आग में कूदा ये सूली पर चढ़ा इस के हर अंदाज़ में ए'जाज़ है अर्श तक इस नूर की परवाज़ है इस की बातों में अजब तासीर है ख़ाक का पुतला नहीं इक्सीर है ये अगर नेकी के ज़ीने पर चढ़े एक दिन सारे फ़रिश्तों से बढ़े और अगर इस्याँ की दलदल में फँसे इस का दर्जा कम हो हैवानात से ये कभी रुई से बढ़ कर नर्म है ये कभी सूरज से बढ़ कर गर्म है एक हालत पर नहीं इस का मिज़ाज हर ज़माने में बदलता है रिवाज और था पहले ये अब कुछ और है आए दिन इस का निराला तौर है इस ने बेहद रूप बदले आज तक इस की तदबीरों से हैराँ है फ़लक डॉक्टर ताजिर प्रोफ़ेसर वकील इन का होना है तरक़्क़ी की दलील इस के पहलू में वो दिल मौजूद है जो भड़कने में निरा बारूद है रेल गाड़ी रेडियो मोटर जहाज़ इस की ईजादों का क़िस्सा है दराज़ दस्त-कारी में बड़ा मश्शाक़ है जिद्दतों का हर घड़ी मुश्ताक़ है खोल आँखें जंग की रफ़्तार देख देख इस के ख़ौफ़नाक औज़ार देख ये कहीं हाकिम कहीं महकूम है ये कहीं ज़ालिम कहीं मज़लूम है आदमी जब ग़ैर के आगे झुका आदमिय्यत से भटकता ही गया आदमी मिलना बहुत दुश्वार है ख़ुद ख़ुदा को आदमी दरकार है प्यारे बच्चो आदमी बन कर रहो हर किसी के साथ हमदर्दी करो सच अगर पूछो तो बस वो मर्द है जिस के दिल में दूसरों का दर्द है 'फ़ैज़' पहुँचाता नहीं जो आदमी उस को अपनी ज़ात से है दुश्मनी उस को अपनी ज़ात से है दुश्मनी

Faiz Ludhianvi

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वो बशर जो पढ़ के भी कहता हो यूँँ बन के तालिब और कुछ हासिल करूँँ कोई शक उस की फ़ज़ीलत में नहीं उस का रुत्बा है फ़रिश्तों से फ़ुज़ूँ वो बशर कुछ भी न आता हो जिसे लेकिन उस को शौक़ हो आलिम बनूँ अपनी बे-इल्मी का उस को इल्म है ना-मुनासिब है उसे जाहिल गिनूँ वो बशर जो हो निरा अहमक़ मगर ख़ुद समझता हो कि दानिश-मंद हूँ मौत है उस की हिमाक़त का इलाज वो रहेगा उम्र भर ख़्वार-ओ-ज़बूँ हर बशर ऐ 'फ़ैज़' ये कोशिश करे जिस तरह भी हो जहालत से बचूँ

Faiz Ludhianvi

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तेज़ सी तलवार सादा सा क़लम बस यही दो ताक़तें हैं बेश-ओ-कम एक है जंगी शुजाअ'त का निशाँ एक है इल्मी लियाक़त का निशाँ आदमी की ज़िंदगी दोनों से है क़ौम की ताबिंदगी दोनों से है जो नहीं डरते क़लम की मार से ज़ेर करते हैं उन्हें तलवार से जब क़लम पाता नहीं कोई सबील उस घड़ी तलवार है रौशन दलील हुक्मरानी को क़लम दरकार है अम्न की ज़ामिन मगर तलवार है इल्म के मैदान में 'राज़ी' बनो जंग के मैदान में ग़ाज़ी बनो वक़्त पर मज़मून लिक्खो ज़ोर-दार वक़्त पर डट कर लड़ो मर्दाना-वार वो पढ़े लिक्खे जो बे-तलवार हैं उन की सारी डिग्रियाँ बे-कार हैं बज़्म में अश'आर के गौहर मुफ़ीद रज़्म में तलवार के जौहर मुफ़ीद आज तक जो भी हुआ है बा-वक़ार था कोई जरनैल या मज़मूँ-निगार 'फ़ैज़' को जितना क़लम से प्यार है उतनी ही प्यारी उसे तलवार है

Faiz Ludhianvi

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हर दम इल्म सिखाती है अक़्ल के राज़ बताती है प्यारा नाम किताब है उस का मा'लूमात बढ़ाती है कोई बच्चा हो या बूढ़ा सब को यकसाँ भाती है दादा अब्बा मोल अगर लें पोते के काम आती है घर बैठे ही दुनिया भर की हम को सैर कराती है अगले वक़्तों के लोगों का सारा हाल सुनाती है इस की दानाई तो देखो जो पूछो समझाती है जाहिल से जाहिल को आख़िर क़ाबिल शख़्स बनाती है हर दफ़्तर के हर अफ़सर को ये परवान चढ़ाती है दिल की आँखें रौशन कर के हक़ की राह दिखाती है पढ़ने वाले ख़ुश होते हैं उन का रंज मिटाती है तन्हाई में हमदम बन कर 'फ़ैज़' हमें पहुँचाती है

Faiz Ludhianvi

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ऐ कि तू ग़फ़्लत में है डूबा हुआ काम करना सीख तुझ को क्या हुआ आदमी डट कर अगर मेहनत करे फिर कमा ले अपना ज़र खोया हुआ ग़ौर से दोबारा पढ़ लेने के बा'द याद हो जाए सबक़ भूला हुआ और कमज़ोरी में वर्ज़िश के तुफ़ैल ख़ूब मोटा हो बदन सूखा हुआ लेकिन इस दुनिया में ऐसा कौन है वक़्त वापस लाए जो गुज़रा हुआ जिस ने अपने फ़र्ज़ की परवा न की एक दिन पछताएगा रोता हुआ 'फ़ैज़' मंज़िल पर पहुँच सकता नहीं कोई सीधी राह से भटका हुआ

Faiz Ludhianvi

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