तेज़ सी तलवार सादा सा क़लम बस यही दो ताक़तें हैं बेश-ओ-कम एक है जंगी शुजाअ'त का निशाँ एक है इल्मी लियाक़त का निशाँ आदमी की ज़िंदगी दोनों से है क़ौम की ताबिंदगी दोनों से है जो नहीं डरते क़लम की मार से ज़ेर करते हैं उन्हें तलवार से जब क़लम पाता नहीं कोई सबील उस घड़ी तलवार है रौशन दलील हुक्मरानी को क़लम दरकार है अम्न की ज़ामिन मगर तलवार है इल्म के मैदान में 'राज़ी' बनो जंग के मैदान में ग़ाज़ी बनो वक़्त पर मज़मून लिक्खो ज़ोर-दार वक़्त पर डट कर लड़ो मर्दाना-वार वो पढ़े लिक्खे जो बे-तलवार हैं उन की सारी डिग्रियाँ बे-कार हैं बज़्म में अश'आर के गौहर मुफ़ीद रज़्म में तलवार के जौहर मुफ़ीद आज तक जो भी हुआ है बा-वक़ार था कोई जरनैल या मज़मूँ-निगार 'फ़ैज़' को जितना क़लम से प्यार है उतनी ही प्यारी उसे तलवार है
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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं
Divya 'Kumar Sahab'
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सदाक़त-ए-इश्क़ इश्क़ की तुम हक़ीक़त समझ लो इस को ग़म से गुज़रना पड़ेगा उन की यादों में मसरूफ़ हो तुम उन की यादों में रहना पड़ेगा दर्द-ए-दिल अपना तुझ को सुनाऊँ जी तो करता है तुझ को सुनाऊँ तेरी आँखों से कह देंगी आँसू अब मुझे भी निकलना पड़ेगा अपने भी रूठ जाएँगे तेरे रिश्ते भी छूट जाएँगे तेरे लोग तुझ को कहेंगे निकम्मा ऐसा लम्हा भी सहना पड़ेगा तू भरोसा भी करता है जिस पे बे-वजह होगा नाराज़ तुझ से होता अक्सर यहाँ ऐसा आशिक़ इश्क़ से हाँ मुकरना पड़ेगा वो तुझे भूल जाएँगे ऐसे जाने ज़िंदा रहेगा तू कैसे मशवरा बस यही देगा 'दानिश' अलविदा तुझ को कहना पड़ेगा
Danish Balliavi
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आज बहुत फ़ुर्सत में हूँ तेरे ख़त जलाने बैठा हूँ सोचा पढ़ लूँ आख़िरी दफ़ा मैं फिर मुहब्बत कर बैठा हूँ सोचा था क़लम छोड़ दूँगा मैं फिर ग़ज़ल लिख बैठा हूँ झुमके, कंगन, बालियाँ, बिंदी मैं फिर हसरतें लिए बैठा हूँ मैं ख़ुश हूँ बस यूँँही आज भूलना था, याद लिए बैठा हूँ ख़्वाहिशें जो रही अधूरी अब तक पूरी हों यही आस लिए बैठा हूँ तुझे आज़ाद कर चुका हूँ कब से बस ख़ुद को क़ैद किए बैठा हूँ
Prashant Shakun
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"दिवाली" मिरी साँसों को गीत और आत्मा को साज़ देती है ये दिवाली है सब को जीने का अंदाज़ देती है हृदय के द्वार पर रह रह के देता है कोई दस्तक बराबर ज़िंदगी आवाज़ पर आवाज़ देती है सिमटता है अँधेरा पाँव फैलाती है दिवाली हँसाए जाती है रजनी हँसे जाती है दिवाली क़तारें देखता हूँ चलते-फिरते माह-पारों की घटाएँ आँचलों की और बरखा है सितारों की वो काले काले गेसू सुर्ख़ होंट और फूल से आरिज़ नगर में हर तरफ़ परियाँ टहलती हैं बहारों की निगाहों का मुक़द्दर आ के चमकाती है दिवाली पहन कर दीप-माला नाज़ फ़रमाती है दिवाली उजाले का ज़माना है उजाले की जवानी है ये हँसती जगमगाती रात सब रातों की रानी है वही दुनिया है लेकिन हुस्न देखो आज दुनिया का है जब तक रात बाक़ी कह नहीं सकते कि फ़ानी है वो जीवन आज की रात आ के बरसाती है दिवाली पसीना मौत के माथे पे छलकाती है दिवाली सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या गगन की जगमगाहट पड़ गई है आज मद्धम क्यूँँ मुंडेरों और छज्जों पर उतर आए हैं तारे क्या हज़ारों साल गुज़रे फिर भी जब आती है दिवाली महल हो चाहे कुटिया सब पे छा जाती है दिवाली इसी दिन द्रौपदी ने कृष्ण को भाई बनाया था वचन के देने वाले ने वचन अपना निभाया था जनम दिन लक्ष्मी का है भला इस दिन का क्या कहना यही वो दिन है जिस ने राम को राजा बनाया था कई इतिहास को एक साथ दोहराती है दिवाली मोहब्बत पर विजय के फूल बरसाती है दिवाली गले में हार फूलों का चरण में दीप-मालाएँ मुकुट सर पर है मुख पर ज़िंदगी की रूप-रेखाएँ लिए हैं कर में मंगल-घट न क्यूँँ घट घट पे छा जाएँ अगर परतव पड़े मुर्दा-दिलों पर वो भी जी जाएँ अजब अंदाज़ से रह रह के मस़्काती है दिवाली मोहब्बत की लहर नस नस में दौड़ाती है दिवाली तुम्हारा हूँ तुम अपनी बात मुझ से क्यूँँ छुपाते हो मुझे मालूम है जिस के लिए चक्कर लगाते हो बनारस के हो तुम को चाहिए त्यौहार घर करना बुतों को छोड़ कर तुम क्यूँँ इलाहाबाद जाते हो न जाओ ऐसे में बाहर 'नज़ीर' आती है दिवाली ये काशी है यहीं तो रंग दिखलाती है दिवाली
Nazeer Banarasi
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बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज हिमाला के ऊँचे कलस जगमगाए पहाड़ों के चश्मों को सोना बनाया नए बिल नए ज़ोर इन को सिखाए लिबास-ए-ज़री आबशारों ने पाया नशेबी ज़मीनों पे छींटे उड़ाए घने ऊँचे ऊँचे दरख़्तों का मंज़र ये हैं आज सब आब-ए-ज़र में नहाए मगर इन दरख़्तों के साए में ऐ दिल हज़ारों बरस के ये ठिठुरे से पौदे हज़ारों बरस के ये सिमटे से पौदे ये हैं आज भी सर्द बेहाल बे-दम ये हैं आज भी अपने सर को झुकाए अरे ओ नई शान के मेरे सूरज तिरी आब में और भी ताब आए तिरे पास ऐसी भी कोई किरन है जो ऐसे दरख़्तों में भी राह पाए जो ठहरे हुओं को जो सिमटे हुओं को हरारत भी बख़्शे गले भी लगाए बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज हिमाला के ऊँचे कलस जगमगाए फ़ज़ाओं में होने लगी बारिश-ए-ज़र कोई नाज़नीं जैसे अफ़्शाँ छुड़ाए दमकने लगे यूँँ ख़लाओं के ज़र्रे कि तारों की दुनिया को भी रश्क आए हमारे उक़ाबों ने अंगड़ाइयाँ लीं सुनहरी हवाओं में पर फड़फड़ाए फ़ुज़ूँ-तर हुआ नश्शा-ए-कामरानी तजस्सुस की आँखों में डोरे से आए क़दम चूमने बर्क़-ओ-बाद आब-ओ-आतिश ब-सद-शौक़ दौड़े ब-सद-इज्ज़ आए मगर बर्क़ ओ आतिश के साए में ऐ दिल ये सदियों के ख़ुद-रफ़्ता नाशाद ताइर ये सदियों के पर-बस्ता बर्बाद ताइर ये हैं आज भी मुज़्महिल दिल-गिरफ़्ता ये हैं आज भी अपने सर को छुपाए अरे ओ नई शान के मेरे सूरज तिरी आब में और भी ताब आए तिरे पास ऐसी भी कोई किरन है उन्हें पंजा-ए-तेज़ से जो बचाए इन्हें जो नए बाल-ओ-पर आ के बख़्शे इन्हें जो नए सिर से उड़ना सिखाए
Moin Ahsan Jazbi
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वो बशर जो पढ़ के भी कहता हो यूँँ बन के तालिब और कुछ हासिल करूँँ कोई शक उस की फ़ज़ीलत में नहीं उस का रुत्बा है फ़रिश्तों से फ़ुज़ूँ वो बशर कुछ भी न आता हो जिसे लेकिन उस को शौक़ हो आलिम बनूँ अपनी बे-इल्मी का उस को इल्म है ना-मुनासिब है उसे जाहिल गिनूँ वो बशर जो हो निरा अहमक़ मगर ख़ुद समझता हो कि दानिश-मंद हूँ मौत है उस की हिमाक़त का इलाज वो रहेगा उम्र भर ख़्वार-ओ-ज़बूँ हर बशर ऐ 'फ़ैज़' ये कोशिश करे जिस तरह भी हो जहालत से बचूँ
Faiz Ludhianvi
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जिस क़दर दुनिया में मख़्लूक़ात है सब से अशरफ़ आदमी की ज़ात है इस की पैदाइश में है उल्फ़त का राज़ इस की हस्ती पर है ख़ुद ख़ालिक़ को नाज़ इस की ख़ातिर कुल जहाँ पैदा हुआ ये ज़मीं ये आसमाँ पैदा हुआ अक़्ल का जौहर इसे बख़्शा गया इल्म का ज़ेवर इसे बख़्शा गया इस के सर में है निहाँ ऐसा दिमाग़ जिस में रौशन है लियाक़त का चराग़ सोच कर हर काम कर सकता है ये शे'र को भी राम कर सकता है ये ये सफ़ाई से चटानें तोड़ दे अपनी दानाई से दरिया मोड़ दे मन-चला है इस की हिम्मत है बुलंद डाल सकता है सितारों पर कमंद इस को ख़तरों की नहीं पर्वा ज़रा आग में कूदा ये सूली पर चढ़ा इस के हर अंदाज़ में ए'जाज़ है अर्श तक इस नूर की परवाज़ है इस की बातों में अजब तासीर है ख़ाक का पुतला नहीं इक्सीर है ये अगर नेकी के ज़ीने पर चढ़े एक दिन सारे फ़रिश्तों से बढ़े और अगर इस्याँ की दलदल में फँसे इस का दर्जा कम हो हैवानात से ये कभी रुई से बढ़ कर नर्म है ये कभी सूरज से बढ़ कर गर्म है एक हालत पर नहीं इस का मिज़ाज हर ज़माने में बदलता है रिवाज और था पहले ये अब कुछ और है आए दिन इस का निराला तौर है इस ने बेहद रूप बदले आज तक इस की तदबीरों से हैराँ है फ़लक डॉक्टर ताजिर प्रोफ़ेसर वकील इन का होना है तरक़्क़ी की दलील इस के पहलू में वो दिल मौजूद है जो भड़कने में निरा बारूद है रेल गाड़ी रेडियो मोटर जहाज़ इस की ईजादों का क़िस्सा है दराज़ दस्त-कारी में बड़ा मश्शाक़ है जिद्दतों का हर घड़ी मुश्ताक़ है खोल आँखें जंग की रफ़्तार देख देख इस के ख़ौफ़नाक औज़ार देख ये कहीं हाकिम कहीं महकूम है ये कहीं ज़ालिम कहीं मज़लूम है आदमी जब ग़ैर के आगे झुका आदमिय्यत से भटकता ही गया आदमी मिलना बहुत दुश्वार है ख़ुद ख़ुदा को आदमी दरकार है प्यारे बच्चो आदमी बन कर रहो हर किसी के साथ हमदर्दी करो सच अगर पूछो तो बस वो मर्द है जिस के दिल में दूसरों का दर्द है 'फ़ैज़' पहुँचाता नहीं जो आदमी उस को अपनी ज़ात से है दुश्मनी उस को अपनी ज़ात से है दुश्मनी
Faiz Ludhianvi
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कुछ काम करो कुछ काम करो दुनिया में पैदा नाम करो दिन भर मेहनत में शाद रहो जब रात पड़े आराम करो अंजाम ख़ुदा के हाथ में है तुम कोशिश सुब्ह-ओ-शाम करो तकलीफ़ से राहत मिलती है ये सौदा लो वो दाम करो हिम्मत से आगे बढ़ जाओ बढ़ कर हासिल इनआ'म करो हमदर्दी से ग़म-ख़्वारी से हर शख़्स के दिल को राम करो लोगों में तुम्हारी क़द्र बढ़े बच्चो कोई ऐसा काम करो ता'लीम जहाँ में फैलाओ इस 'फ़ैज़' का चर्चा आम करो
Faiz Ludhianvi
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उठ अज़-सर-ए-नौ दहर के हालात बदल डाल तदबीर से तक़दीर के दिन-रात बदल डाल फिर दरस-ए-मुसावात की हाजत है जहाँ को आक़ाई-ओ-ख़िदमत के ख़िताबात बदल डाल काला हो कि गोरा हो ख़ुदा एक है सब का क़ौमिय्यत-ए-बेजा की रिवायात बदल डाल चीनी हो कि हिन्दी हो बराबर के हैं भाई वतनिय्यत-ए-महदूद के वहमात बदल डाल कुल छोटे-बड़े आदम-ए-ख़ाकी के हैं फ़रज़ंद हर नस्ल से बेज़ार हो हर ज़ात बदल डाल अख़्लाक़ में ताक़त है फ़ुज़ूँ तेग़-ओ-सिनाँ से पैकार के ये आहनी आलात बदल डाल क्या ज़ुल्म है इंसान हो इंसान का दुश्मन मरदान-ए-हवस-कार की आदात बदल डाल मेहनत से भी मज़दूर को रोटी नहीं मिलती इस बंदा-ए-मजबूर के औक़ात बदल डाल आपस में ये हर रोज़ की ख़ूँ-रेज़ियाँ कब तक ख़ुद-साख़्ता मज़हब की रूसूमात बदल डाल हुर्रियत-ए-कामिल का वो ए'जाज़ दिखा तू दुनिया-ए-ग़ुलामी के तिलिस्मात बदल डाल ख़िल्क़त को बुला शिर्क से तौहीद की जानिब पीरों की फ़क़ीरों की करामात बदल डाल ता'लीम पे मौक़ूफ़ है रानाई-ए-अफ़कार बेहूदा किताबों की ख़ुराफ़ात बदल डाल कर फ़िक्र-ए-अमल ज़िक्र-ए-ख़त-ओ-ख़ाल अबस है ऐ 'फ़ैज़' ज़रा अपने ख़यालात बदल डाल
Faiz Ludhianvi
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ऐ नए साल बता तुझ में नया-पन क्या है हर तरफ़ ख़ल्क़ ने क्यूँ शोर मचा रखा है रौशनी दिन की वही तारों भरी रात वही आज हम को नज़र आती है हर एक बात वही आसमान बदला है अफ़्सोस ना बदली है ज़मीं एक हिंदिसे का बदलना कोई जिद्दत तो नहीं अगले बरसों की तरह होंगे क़रीने तेरे किसे मालूम नहीं बारह महीने तेरे जनवरी फ़रवरी मार्च में पड़ेगी सर्दी और अप्रैल मई जून में हो गी गर्मी तेरा मन दहर में कुछ खोएगा कुछ पाएगा अपनी मीआ'द बसर कर के चला जाएगा तू नया है तो दिखा सुब्ह नई शाम नई वर्ना इन आँखों ने देखे हैं नए साल कई बे-सबब लोग क्यूँ देते हैं मुबारक-बादें ग़ालिबन भूल गए वक़्त की कड़वी यादें तेरी आमद से घटी उम्र जहाँ से सब की 'फ़ैज़' ने लिक्खी है ये नज़्म निराले ढब की
Faiz Ludhianvi
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