nazmKuch Alfaaz

"दिसम्बर मुझे रास आता नहीं" कई साल गुज़रे कई साल बीते शब-ओ-रोज़ की गर्दिशों का तसलसुल दिल-ओ-जान में साँसों की परतें उल्टे हुए ज़लज़लों की तरह हांफ़ता है चटख़्ते हुए ख़्वाब आँखों की नाज़ुक रगें छीलते हैं मगर मैं इक साल की गोद में जागती सुब्ह को बे-करांचाहतों से अटी ज़िंदगी की दुआ दे कर अब तक वही जुस्तुजू का सफ़र कर रहा हूँ गुज़रता हुआ साल जैसा भी गुज़रा मगर साल के आख़िरी दिन निहायत कठिन हैं मिरे मिलने वालो नए साल की मुस्कुराती हुई सुब्ह गर हाथ आए तो मिलना कि जाते हुए साल की साअ'तों में ये बुझता हुआ दिल धड़कता तो है मुस्कुराता नहीं दिसम्बर मुझे रास आता नहीं

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ

Ali Zaryoun

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है

ZafarAli Memon

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उसे कहना बिछड़ने से मुहब्बत तो नहीं मरती बिछड़ जाना मुहब्बत की सदाकत की अलामत है मुहब्बत एक फितरत है, हाँ फ़ितरत कब बदलती है सो, जब हम दूर हो जाएँ, नए रिश्तों में खो जाएँ तो ये मत सोच लेना तुम, के मुहब्बत मर गई होगी नहीं ऐसे नहीं होगा मेरे बारे में गर तुम्हारी आँखें भर आएँ छलक कर एक भी आँसू पलक पे जो उतर आए तो बस इतना समझ लेना, जो मेरे नाम से इतनी तेरे दिल को अक़ीदत है तेरे दिल में बिछड़ कर भी अभी मेरी मुहब्बत है मुहब्बत तो बिछड़ कर भी सदा आबाद रहती है मुहब्बत हो किसी से तो हमेशा याद रहती है मुहब्बत वक़्त के बे-रहम तूफ़ान से नहीं डरती

Mohsin Naqvi

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"मुझे अब डर नहीं लगता" किसी के दूर जाने से तअ'ल्लुक़ टूट जाने से किसी के मान जाने से किसी के रूठ जाने से मुझे अब डर नहीं लगता किसी को आज़माने से किसी के आज़माने से किसी को याद रखने से किसी को भूल जाने से मुझे अब डर नहीं लगता किसी को छोड़ देने से किसी के छोड़ जाने से न शम्अ'' को जलाने से न शम्अ'' को बुझाने से मुझे अब डर नहीं लगता अकेले मुस्कुराने से कभी आँसू बहाने से न इस सारे ज़माने से हक़ीक़त से फ़साने से मुझे अब डर नहीं लगता किसी की ना-रसाई से किसी की पारसाई से किसी की बे-वफ़ाई से किसी दुख इंतिहाई से मुझे अब डर नहीं लगता न तो इस पार रहने से न तो उस पार रहने से न अपनी ज़िंदगानी से न इक दिन मौत आने से मुझे अब डर नहीं लगता

Mohsin Naqvi

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