nazmKuch Alfaaz

मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस के हमराह बीता बचपन कि जिस के हमराह थी जवानी उमंगें परवान चढ़ रही थीं वो बे-ख़बर रोज़-ओ-शब की यादें कभी कभी छोटी मोटी बातों पे रूठ जाना न बात करना न साथ रहना जो मैं मनाऊँ तो वो न माने वो प्यार क्या था ख़ुदा ही जाने मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस के हमराह बीता बचपन कि जिस के हमराह थी जवानी जो होश आया तो उस ने इक साथ मरने-जीने की खाईं क़स्में मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस की ज़ुल्फ़ों में ज़िंदगी की तमाम क़द्रें उलझ गई थीं कि जिस के माथे की सुर्ख़ बिंदी मिरा नसीबा जगा रही थी कि जिस की नज़रों से मैं ने यकसानियत की मय पी कि जिस के नाज़ुक लबों पे मेरे लिए तबस्सुम की रौशनी थी कि जिस की साँसों में मेरे संगीत की सदा थी कि जिस के सीने की धड़कनों में मिरे लिए एक ज़लज़ला था कि जिस की गुफ़तार-ए-नर्म-ओ-नाज़ुक ने ज़हर-ए-शीरीं पिलाए मुझ को कि जिस के ज़ानू पे मेरा सर था मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस के हमराह बीता बचपन कि जिस के हमराह थी जवानी कि जिस ने इक राह पर ही ग्यारह बरस गुज़ारे थे साथ मेरे वो राह जिस पर मोहब्बतें थीं मसर्रतें थीं मुसीबतें थीं मगर वो ज़ालिम कि जिस ने अपनी ख़ुशी के आगे न ख़ुद को समझा न मुझ को जाना तिलिस्म-ए-हुस्न-ओ-यक़ीन टूटा तो वो नहीं थी जो हम-सफ़र थी मैं अपनी मंज़िल में अपने रस्ते पे अब अकेला ही जा रहा हूँ

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

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"मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम" मेरी शोहरत मेरा डंका मेरे ए'जाज़ का सुन कर कभी ये न समझ लेना मैं चोटी का लिखारी हूँ मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं छोटा सा ब्योपारी हूँ मेरी आरत पे बरसों से जो महँगे दाम बिकता है वो तेरे ग़म का सौदा है तेरी आँखें तेरे आँसू तेरी चाहत तेरे जज़्बे यहाँ सेल्फों पे रखे हैं वही तो मैं ने बेचे हैं तुम्हारी बात छिड़ जाए तो बातें बेच देता हूँ ज़रूरत कुछ ज़ियादा हो तो यादें बेच देता हूँ तुम्हारे नाम के सदके बहुत पैसा कमाया है नई गाड़ी ख़रीदी है नया बँगला बनाया है मगर क्यूँँ मुझ को लगता है मेरे अंदर का ब्योपारी तुम्हीं को बेच आया है मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम मैं बिज़नेस-मैन हूँ जानम

Khalil Ur Rehman Qamar

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वाए नादारियाँ हाए मजबूरियाँ रस्म-ओ-आदाब के बस में है ज़िंदगी ग़ैर की हो के परदेस जाती हो तुम हसरत-ओ-यास-ओ-हिर्मां में डूबी हुई जैसे शादाब सी झील में इक कँवल चढ़ते सूरज की तेज़ी से कुमलाए है या ब-अहद-ए-बहाराँ किसी इक सबब जैसे फूलों से रंगत उतर जाए है हर सहेली तबस्सुम-ब-लब है मगर तुम ही मग़्मूम हो तुम ही ख़ामोश हो जैसे गुलचीं का सारे चमन-ज़ार में इक कली पर ही कुछ ज़ुल्म हो दोश हो ख़ामुशी सद ज़बान-ओ-बयाँ की तरह अपनी दुनिया के दुख दर्द कहती हुई फिर भी अपनों से बेगानगी सी लिए वक़्त की धार पर नाव बहती हुई वो उदासी कि हूरों को अफ़्सोस हो हों फ़रिश्ते भी ऐसी फ़ज़ा में ख़जिल और किस किस को ऐ 'दौर' इल्ज़ाम दूँ कुछ पसीजा तो होगा ख़ुदा का भी दिल

Daur Afridi

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ख़याल-ओ-ख़ाब-ओ-अक़ाएद की सेहर-कारी तक घुटे घुटे से शब-ओ-रोज़ थे बुझी सी फ़ज़ा न जानने से चली बात जानने की तरफ़ सुकूत-ए-मौत है लेकिन सुकूत ख़त्म हुआ जुनूँ-सरिश्त से जज़्बे अमल की राहों में लिबास ओढ़े हुए अज़्म का निकलते हैं ख़िरद के देस में तंज़ीम ज़िंदगी ले कर बहुत ही कम हैं जो ऐसे सँवर के चलते हैं हयात एक सफ़र है बहुत अज़ीम सफ़र गुरेज़-ओ-जज़्ब में डूबा हुआ है हर लम्हा बहुत अज़ीज़ है जो फ़िक्र काम आ जाए कि उस से बढ़ के कहाँ वक़्त का कोई हदिया हयात सूद-ओ-ज़ियाँ से नविश्त रहती है हयात सूद-ओ-ज़ियाँ के जहाँ का मेहवर है कभी है दिल का ज़रर याँ कभी है जाँ को सकूँ कभी दवा है कभी ज़ख़्म-ए-दिल पे नश्तर है हयात राह-ए-अज़िय्यत है अपनी मंज़िल में मगर ये राह-एअज़िय्यत तमाम होने तक न जाने कितनी उमंगों का ख़ून हो जाए कोई तो प्यास बुझे जश्न-ए-जाम होने तक

Daur Afridi

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मेरी हर इक नज़र ने सज्दा किया रौनक़-ए-हुस्न-ओ-जान-ए-रू-ए-निगार फिर भी जुम्बिश न हो सकी तुझ को कितना मज़बूत है तिरा किरदार क्या ख़बर तुझ को प्यार हो कि न हो हूँ तिरी हर ख़ुशी के साथ मगर तेरी फ़िक्र-ओ-अदा समझ न सकूँ बर-महल जैसे बज सके न गजर ज़ेहन की कुछ अमीक़ राहों में ख़ुद को खोया हुआ सा पाता हूँ जाने क्या होगा इश्क़ का हासिल जाने क्या होगा चाहतों का फ़ुसूँ

Daur Afridi

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सुख़न फ़रेब कोई मेहरबाँ की तरह दयार-ए-हुस्न है दुनिया की दास्ताँ की तरह ये मुस्कुराती हुई सुब्ह-ओ-शाम-ओ-शब की दुल्हन दिल-ओ-नज़र के लिए सूद-ए-बे-ज़ियाँ की तरह ये इमतिज़ाज-ए-ज़र-ए-शिर्क़-ओ-ग़र्ब का कल्चर निगाह-ए-हुस्न लिए इश्क़ आशिक़ाँ की तरह हरीर-ओ-रेशम-ओ-दीबा में रंग-ए-नाज़-ओ-अदा सुकून-ए-दिल के लिए हैं क़रार-ए-जाँ की तरह ये रंग रंग के उनवाँ लिए हसीं चेहरे सनम-कदों में तख़य्युल के हैं बुताँ की तरह सुडौल जिस्म कि सर्द-ए-रवाँ सर-ए-राहे चले हैं नाज़ से हूरान-ए-आसमाँ की तरह ये लहकी महकी फ़ज़ाएँ ये दिल-रुबा पैकर गुलों के रंग में डूबे हुए जहाँ की तरह ये रब्त-ओ-रक़्स-ओ-तरन्नुम हवा की लहरों में क़दम क़दम पे अदा-हा-ए-महविशाँ की तरह ये जगमगाती हुई रात ये दहकते कँवल नुजूम-ओ-माह-ओ-सुरय्या-ओ-कहकशाँ की तरह ये मेरे ख़्वाबों-ख़यालों की अप्सरा जिस में निगाह-ए-फ़िक्र-ओ-अमल तीर की कमाँ की तरह मगर वतन भी छुटा 'दौर' दिल की दिल में रही ये बम्बई भी न हो ख़्वाब-ए-दीगराँ की तरह

Daur Afridi

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