मेरी हर इक नज़र ने सज्दा किया रौनक़-ए-हुस्न-ओ-जान-ए-रू-ए-निगार फिर भी जुम्बिश न हो सकी तुझ को कितना मज़बूत है तिरा किरदार क्या ख़बर तुझ को प्यार हो कि न हो हूँ तिरी हर ख़ुशी के साथ मगर तेरी फ़िक्र-ओ-अदा समझ न सकूँ बर-महल जैसे बज सके न गजर ज़ेहन की कुछ अमीक़ राहों में ख़ुद को खोया हुआ सा पाता हूँ जाने क्या होगा इश्क़ का हासिल जाने क्या होगा चाहतों का फ़ुसूँ
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती
Tehzeeb Hafi
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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को
Allama Iqbal
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस के हमराह बीता बचपन कि जिस के हमराह थी जवानी उमंगें परवान चढ़ रही थीं वो बे-ख़बर रोज़-ओ-शब की यादें कभी कभी छोटी मोटी बातों पे रूठ जाना न बात करना न साथ रहना जो मैं मनाऊँ तो वो न माने वो प्यार क्या था ख़ुदा ही जाने मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस के हमराह बीता बचपन कि जिस के हमराह थी जवानी जो होश आया तो उस ने इक साथ मरने-जीने की खाईं क़स्में मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस की ज़ुल्फ़ों में ज़िंदगी की तमाम क़द्रें उलझ गई थीं कि जिस के माथे की सुर्ख़ बिंदी मिरा नसीबा जगा रही थी कि जिस की नज़रों से मैं ने यकसानियत की मय पी कि जिस के नाज़ुक लबों पे मेरे लिए तबस्सुम की रौशनी थी कि जिस की साँसों में मेरे संगीत की सदा थी कि जिस के सीने की धड़कनों में मिरे लिए एक ज़लज़ला था कि जिस की गुफ़तार-ए-नर्म-ओ-नाज़ुक ने ज़हर-ए-शीरीं पिलाए मुझ को कि जिस के ज़ानू पे मेरा सर था मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस के हमराह बीता बचपन कि जिस के हमराह थी जवानी कि जिस ने इक राह पर ही ग्यारह बरस गुज़ारे थे साथ मेरे वो राह जिस पर मोहब्बतें थीं मसर्रतें थीं मुसीबतें थीं मगर वो ज़ालिम कि जिस ने अपनी ख़ुशी के आगे न ख़ुद को समझा न मुझ को जाना तिलिस्म-ए-हुस्न-ओ-यक़ीन टूटा तो वो नहीं थी जो हम-सफ़र थी मैं अपनी मंज़िल में अपने रस्ते पे अब अकेला ही जा रहा हूँ
Daur Afridi
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वाए नादारियाँ हाए मजबूरियाँ रस्म-ओ-आदाब के बस में है ज़िंदगी ग़ैर की हो के परदेस जाती हो तुम हसरत-ओ-यास-ओ-हिर्मां में डूबी हुई जैसे शादाब सी झील में इक कँवल चढ़ते सूरज की तेज़ी से कुमलाए है या ब-अहद-ए-बहाराँ किसी इक सबब जैसे फूलों से रंगत उतर जाए है हर सहेली तबस्सुम-ब-लब है मगर तुम ही मग़्मूम हो तुम ही ख़ामोश हो जैसे गुलचीं का सारे चमन-ज़ार में इक कली पर ही कुछ ज़ुल्म हो दोश हो ख़ामुशी सद ज़बान-ओ-बयाँ की तरह अपनी दुनिया के दुख दर्द कहती हुई फिर भी अपनों से बेगानगी सी लिए वक़्त की धार पर नाव बहती हुई वो उदासी कि हूरों को अफ़्सोस हो हों फ़रिश्ते भी ऐसी फ़ज़ा में ख़जिल और किस किस को ऐ 'दौर' इल्ज़ाम दूँ कुछ पसीजा तो होगा ख़ुदा का भी दिल
Daur Afridi
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ख़याल-ओ-ख़ाब-ओ-अक़ाएद की सेहर-कारी तक घुटे घुटे से शब-ओ-रोज़ थे बुझी सी फ़ज़ा न जानने से चली बात जानने की तरफ़ सुकूत-ए-मौत है लेकिन सुकूत ख़त्म हुआ जुनूँ-सरिश्त से जज़्बे अमल की राहों में लिबास ओढ़े हुए अज़्म का निकलते हैं ख़िरद के देस में तंज़ीम ज़िंदगी ले कर बहुत ही कम हैं जो ऐसे सँवर के चलते हैं हयात एक सफ़र है बहुत अज़ीम सफ़र गुरेज़-ओ-जज़्ब में डूबा हुआ है हर लम्हा बहुत अज़ीज़ है जो फ़िक्र काम आ जाए कि उस से बढ़ के कहाँ वक़्त का कोई हदिया हयात सूद-ओ-ज़ियाँ से नविश्त रहती है हयात सूद-ओ-ज़ियाँ के जहाँ का मेहवर है कभी है दिल का ज़रर याँ कभी है जाँ को सकूँ कभी दवा है कभी ज़ख़्म-ए-दिल पे नश्तर है हयात राह-ए-अज़िय्यत है अपनी मंज़िल में मगर ये राह-एअज़िय्यत तमाम होने तक न जाने कितनी उमंगों का ख़ून हो जाए कोई तो प्यास बुझे जश्न-ए-जाम होने तक
Daur Afridi
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सुख़न फ़रेब कोई मेहरबाँ की तरह दयार-ए-हुस्न है दुनिया की दास्ताँ की तरह ये मुस्कुराती हुई सुब्ह-ओ-शाम-ओ-शब की दुल्हन दिल-ओ-नज़र के लिए सूद-ए-बे-ज़ियाँ की तरह ये इमतिज़ाज-ए-ज़र-ए-शिर्क़-ओ-ग़र्ब का कल्चर निगाह-ए-हुस्न लिए इश्क़ आशिक़ाँ की तरह हरीर-ओ-रेशम-ओ-दीबा में रंग-ए-नाज़-ओ-अदा सुकून-ए-दिल के लिए हैं क़रार-ए-जाँ की तरह ये रंग रंग के उनवाँ लिए हसीं चेहरे सनम-कदों में तख़य्युल के हैं बुताँ की तरह सुडौल जिस्म कि सर्द-ए-रवाँ सर-ए-राहे चले हैं नाज़ से हूरान-ए-आसमाँ की तरह ये लहकी महकी फ़ज़ाएँ ये दिल-रुबा पैकर गुलों के रंग में डूबे हुए जहाँ की तरह ये रब्त-ओ-रक़्स-ओ-तरन्नुम हवा की लहरों में क़दम क़दम पे अदा-हा-ए-महविशाँ की तरह ये जगमगाती हुई रात ये दहकते कँवल नुजूम-ओ-माह-ओ-सुरय्या-ओ-कहकशाँ की तरह ये मेरे ख़्वाबों-ख़यालों की अप्सरा जिस में निगाह-ए-फ़िक्र-ओ-अमल तीर की कमाँ की तरह मगर वतन भी छुटा 'दौर' दिल की दिल में रही ये बम्बई भी न हो ख़्वाब-ए-दीगराँ की तरह
Daur Afridi
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