सुख़न फ़रेब कोई मेहरबाँ की तरह दयार-ए-हुस्न है दुनिया की दास्ताँ की तरह ये मुस्कुराती हुई सुब्ह-ओ-शाम-ओ-शब की दुल्हन दिल-ओ-नज़र के लिए सूद-ए-बे-ज़ियाँ की तरह ये इमतिज़ाज-ए-ज़र-ए-शिर्क़-ओ-ग़र्ब का कल्चर निगाह-ए-हुस्न लिए इश्क़ आशिक़ाँ की तरह हरीर-ओ-रेशम-ओ-दीबा में रंग-ए-नाज़-ओ-अदा सुकून-ए-दिल के लिए हैं क़रार-ए-जाँ की तरह ये रंग रंग के उनवाँ लिए हसीं चेहरे सनम-कदों में तख़य्युल के हैं बुताँ की तरह सुडौल जिस्म कि सर्द-ए-रवाँ सर-ए-राहे चले हैं नाज़ से हूरान-ए-आसमाँ की तरह ये लहकी महकी फ़ज़ाएँ ये दिल-रुबा पैकर गुलों के रंग में डूबे हुए जहाँ की तरह ये रब्त-ओ-रक़्स-ओ-तरन्नुम हवा की लहरों में क़दम क़दम पे अदा-हा-ए-महविशाँ की तरह ये जगमगाती हुई रात ये दहकते कँवल नुजूम-ओ-माह-ओ-सुरय्या-ओ-कहकशाँ की तरह ये मेरे ख़्वाबों-ख़यालों की अप्सरा जिस में निगाह-ए-फ़िक्र-ओ-अमल तीर की कमाँ की तरह मगर वतन भी छुटा 'दौर' दिल की दिल में रही ये बम्बई भी न हो ख़्वाब-ए-दीगराँ की तरह
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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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इक ख़त मुझे लिखना है दिल्ली में बसे दिल को इक दिन मुझे चखना है खाजा तेरी नगरी का खुसरो तेरी चौखट से इक शब मुझे पीनी है शीरीनी सुख़नवाली ख़ुशबू ए वतन वाली ग़ालिब तेरे मरकद को इक शे'र सुनाना है इक सांवली रंगत को चुपके से बताना है मैं दिल भी हूँ दिल्ली भी उर्दू भी हूँ हिन्दी भी इक ख़त मुझे लिखना है मुमकिन है कभी लिक्खूँ मुमकिन है अभी लिक्खूँ
Ali Zaryoun
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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रात रात बड़ी ख़राब है हर रात ख़राब कर देती है रात भर जाग कर हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब कुछ गुज़री रातों के क़िस्से कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक और सिरहाने पर माज़ी के खारे धब्बे रात बड़ी ख़राब है दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को फिर हरा कर देती है और महकने देती है रात भर किसी रात रानी की तरह मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं और फिर ले जाती है अपने साथ पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर रात.. बड़ी ख़राब है पर, एक रात ही तो है जो साथ होती है रात भर ख़ामोशी से सुनती है मेरी हर ख़ामोशी को समझती है मेरी हर बात को मेरी हर रात को रात
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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"हेलुसिनेशन" मैं अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार पर नज़रें जमाए मनाज़िर के अजूबे देखता हूँ उसी दीवार में कोई ख़ला है मुझे जो ग़ार जैसा लग रहा है वहाँ मकड़ी ने जाल बुन लिया है और अब अपने ही जाल में फँसी है वहीं पर एक मुर्दा छिपकिली है कई सदियों से जो साकित पड़ी है अब उस पर काई जमती जा रही है और उस में एक जंगल दिख रहा है दरख़्तों से परिंदे गिर रहे हैं कुल्हाड़ी शाख़ पर लटकी हुई है लक़ड़हारे पे गीदड़ हँस रहे मुसलसल तेज़ बारिश हो रही है किसी पत्ते से गिर कर एक क़तरा अचानक एक समुंदर बन गया है समुंदर नाव से लड़ने लगा है मछेरा मछलियों में घिर गया है और अब पतवार सीने से लगा कर वो नीले आसमाँ को देखता है जो यक-दम ज़र्द पड़ता जा रहा है वो कैसे रेत बनता जा रहा है मुझे अब सिर्फ़ सहरा दिख रहा है और उस में धूम की चादर बिछी है मगर वो एक जगह से फट रही है वहाँ पर एक साया नाचता है जहाँ भी पैर धरता है वहाँ पर सुनहरे फूल खिलते जा रहे है ये सहरा बाग़ बनता जा रहा है और उस में तितलियाँ दिखती हैं परों में जिन के नीली रौशनी है वो हर पल तेज़ होती जा रही है सो मेरी आँख में चुभने लगी है सो मैं ने हाथ आँखों पर रखे हैं और अब उँगली हटा कर देखता हूँ कि अपने बंद कमरे में पड़ा हूँ और इक दीवार के आगे खड़ा हूँ
Ammar Iqbal
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वाए नादारियाँ हाए मजबूरियाँ रस्म-ओ-आदाब के बस में है ज़िंदगी ग़ैर की हो के परदेस जाती हो तुम हसरत-ओ-यास-ओ-हिर्मां में डूबी हुई जैसे शादाब सी झील में इक कँवल चढ़ते सूरज की तेज़ी से कुमलाए है या ब-अहद-ए-बहाराँ किसी इक सबब जैसे फूलों से रंगत उतर जाए है हर सहेली तबस्सुम-ब-लब है मगर तुम ही मग़्मूम हो तुम ही ख़ामोश हो जैसे गुलचीं का सारे चमन-ज़ार में इक कली पर ही कुछ ज़ुल्म हो दोश हो ख़ामुशी सद ज़बान-ओ-बयाँ की तरह अपनी दुनिया के दुख दर्द कहती हुई फिर भी अपनों से बेगानगी सी लिए वक़्त की धार पर नाव बहती हुई वो उदासी कि हूरों को अफ़्सोस हो हों फ़रिश्ते भी ऐसी फ़ज़ा में ख़जिल और किस किस को ऐ 'दौर' इल्ज़ाम दूँ कुछ पसीजा तो होगा ख़ुदा का भी दिल
Daur Afridi
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मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस के हमराह बीता बचपन कि जिस के हमराह थी जवानी उमंगें परवान चढ़ रही थीं वो बे-ख़बर रोज़-ओ-शब की यादें कभी कभी छोटी मोटी बातों पे रूठ जाना न बात करना न साथ रहना जो मैं मनाऊँ तो वो न माने वो प्यार क्या था ख़ुदा ही जाने मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस के हमराह बीता बचपन कि जिस के हमराह थी जवानी जो होश आया तो उस ने इक साथ मरने-जीने की खाईं क़स्में मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस की ज़ुल्फ़ों में ज़िंदगी की तमाम क़द्रें उलझ गई थीं कि जिस के माथे की सुर्ख़ बिंदी मिरा नसीबा जगा रही थी कि जिस की नज़रों से मैं ने यकसानियत की मय पी कि जिस के नाज़ुक लबों पे मेरे लिए तबस्सुम की रौशनी थी कि जिस की साँसों में मेरे संगीत की सदा थी कि जिस के सीने की धड़कनों में मिरे लिए एक ज़लज़ला था कि जिस की गुफ़तार-ए-नर्म-ओ-नाज़ुक ने ज़हर-ए-शीरीं पिलाए मुझ को कि जिस के ज़ानू पे मेरा सर था मगर वो सब कुछ भुला चुकी है कि जिस के हमराह बीता बचपन कि जिस के हमराह थी जवानी कि जिस ने इक राह पर ही ग्यारह बरस गुज़ारे थे साथ मेरे वो राह जिस पर मोहब्बतें थीं मसर्रतें थीं मुसीबतें थीं मगर वो ज़ालिम कि जिस ने अपनी ख़ुशी के आगे न ख़ुद को समझा न मुझ को जाना तिलिस्म-ए-हुस्न-ओ-यक़ीन टूटा तो वो नहीं थी जो हम-सफ़र थी मैं अपनी मंज़िल में अपने रस्ते पे अब अकेला ही जा रहा हूँ
Daur Afridi
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ख़याल-ओ-ख़ाब-ओ-अक़ाएद की सेहर-कारी तक घुटे घुटे से शब-ओ-रोज़ थे बुझी सी फ़ज़ा न जानने से चली बात जानने की तरफ़ सुकूत-ए-मौत है लेकिन सुकूत ख़त्म हुआ जुनूँ-सरिश्त से जज़्बे अमल की राहों में लिबास ओढ़े हुए अज़्म का निकलते हैं ख़िरद के देस में तंज़ीम ज़िंदगी ले कर बहुत ही कम हैं जो ऐसे सँवर के चलते हैं हयात एक सफ़र है बहुत अज़ीम सफ़र गुरेज़-ओ-जज़्ब में डूबा हुआ है हर लम्हा बहुत अज़ीज़ है जो फ़िक्र काम आ जाए कि उस से बढ़ के कहाँ वक़्त का कोई हदिया हयात सूद-ओ-ज़ियाँ से नविश्त रहती है हयात सूद-ओ-ज़ियाँ के जहाँ का मेहवर है कभी है दिल का ज़रर याँ कभी है जाँ को सकूँ कभी दवा है कभी ज़ख़्म-ए-दिल पे नश्तर है हयात राह-ए-अज़िय्यत है अपनी मंज़िल में मगर ये राह-एअज़िय्यत तमाम होने तक न जाने कितनी उमंगों का ख़ून हो जाए कोई तो प्यास बुझे जश्न-ए-जाम होने तक
Daur Afridi
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मेरी हर इक नज़र ने सज्दा किया रौनक़-ए-हुस्न-ओ-जान-ए-रू-ए-निगार फिर भी जुम्बिश न हो सकी तुझ को कितना मज़बूत है तिरा किरदार क्या ख़बर तुझ को प्यार हो कि न हो हूँ तिरी हर ख़ुशी के साथ मगर तेरी फ़िक्र-ओ-अदा समझ न सकूँ बर-महल जैसे बज सके न गजर ज़ेहन की कुछ अमीक़ राहों में ख़ुद को खोया हुआ सा पाता हूँ जाने क्या होगा इश्क़ का हासिल जाने क्या होगा चाहतों का फ़ुसूँ
Daur Afridi
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