nazmKuch Alfaaz

म्यूनिख़ में आज क्रिसमस है सारे मनाज़िर ने सफ़ेद चादर ओढ़ रखी है कमरे की खिड़की से आती उदासी चहार-सू फैलती जा रही है अँधेरा उदासियों के नौहे पढ़ रहा है मुमटियों से फिसलता नहीं कोई कंकर लम्हे साकित हो गए हैं अलमारी के ख़ानों में कुछ यादें बिखरी पड़ी हैं सामने पड़ी कुर्सी झूल रही है सारा माहौल सोगवार है अजीब सा डर है जो आँसू बन कर उतर रहा है आसमाँ सात रंग रौशनियाँ क़हक़हे साज़ नग़्मगी ये हुजूम साल-हा-साल की मसाफ़त है केंचुली बदलने का एहसास आँखों की ख़ामोशी से अथाह गहराई में उतर रहा है मैं अभी लौट कर नहीं आई दिल ने बरसों से रू-ए-आलम की ख़ाक छानी है तेरी अंखों में कहीं वो ज़माने सिमट के आ गए हैं जब कोएटा एयरपोर्ट से नम-नाकी ने तुम्हें रवाना किया रक़्स नग़्मगी चूड़ियों की खनक के नीचे हैं भारी है इन सब साज़ों से हाथ ख़ाली हैं दिल वीरान है दायरा दायरा ये ख़ामोशी दायरा दायरा ये तन्हाई जिस में क़दीम आसार मोहन-जोदाड़ो हड़प्पा बाबिल टेक्सला के जो मेरे अंदर लम्हा लम्हा उतरते जाते हैं मजीद अमजद मैं फ़ासलों की कमंद की असीर मैं तेरी शालात रूद-बार के पुल पर बड़ी देर से खड़ी हूँ

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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आज तुम्हारे शहर से वापस लौट रही हूँ लेकिन कैसे साबित-ओ-सालिम कौन पलट कर जाता है किस दिल से आई थी मैं तुम से मिलना कैसा होगा जाने क्या कुछ मन में था तुम से मिलूँगी और तुम से मिलूँगी और बहुत सी बातें होंगी कुछ होंटों से बह निकलेंगी कुछ आँखें तहरीर करेंगी लेकिन ये सब ख़्वाब था मेरा देखो वापस लौट रही हूँ तारकोल की बल खाती ये साँपों जैसी सड़कें हर इक मोड़ तुम्हारी यादें और हवा में लम्स तुम्हारा भीगती आँखें ले कर वापस लौट रही हूँ लौट रही हूँ ख़ाली आँख और ख़ाली हाथ दूर उफ़ुक़ पर ज़र्द उदासी की चादर में लिपटा चाँद बिजली के तारों पर बैठे कुछ ख़ामोश परिंद इस चलती गाड़ी में जैसे मैं अफ़्सुर्दा-जाँ एक तरफ़ चिड़ियों का चम्बा पेड़ों पर वो शोर मचाता लेकिन जिस का दिल बुझ जाए उस को इन से क्या पोंछ रही हूँ भीगती आँखें इक इक कर के तेरी यादें आँचल के पल्लू में बाँध रही हूँ लेकिन गाँठ नहीं लगती है मेरी पोरें साथ नहीं हैं जैसे मेरे हाथ नहीं हैं

Janan Malik

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तुम्हें याद होगा तुम ने मुझे पिछले बरस ख़त में अप्रैल भेजा जो मुझ तक पहुँचते पहुँचते अगस्त हो गया लफ़्ज़ पीले पत्तों की तरह फ़र्श पर बिखर गए दिसम्बर की सर्द रातों में मैं वा'दों के आतिश-दान पर बैठी जागती रही मेरी रगों में जमा हुआ दिसम्बर आँखों से पिघल कर बहता रहता है इस बरस मुझे ख़त में कुछ नहीं भेजना कुछ भी नहीं शायद अज़िय्यतों से भरी शाख़ों पर किसी वा'दे की कोंपल फूट पड़े मौसमों का क्या है कब बदल जाएँ बे-ए'तिबार लहजों की तरह वक़्त सब कुछ उलट पलट रहा है शायद तुम्हारे लौटने तक बहुत कुछ वैसा न रहे जैसा तुम छोड़ गए थे लोहे के जबड़े मिट्टी के मल्बूस को तार-तार करते जा रहे हैं पुल जहाँ से तुम पार्क के किनारे खड़े दिखाई देते थे वो मंज़र मेट्रो बस ने निगल लिया है सुम्बुल के पेड़ों की जगह शॉपिंग मॉल ले चुका है और हाँ वो फूलों वाली दुकान जहाँ से हम बुके लेते थे वहाँ फास्टफूड बन गया दिल की जगह अंतड़ियों ने ले ली है क्या कुछ और कैसे बदल जाता है

Janan Malik

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तमाम दिन तुम्हारे मैसेजेज़ मेरे दिल की मुंडेरों पर कबूतरों की तरह उतरते हैं सफ़ेद दूधिया सियाह चश्म शरबती और सुरमई माइल जंगली कबूतर जिन के सीने के बाल कई रंगों में दमकते हैं सब्ज़-गूँ नीलगूँ और ताबदार तपते हुए ताँबे के जैसे मैं उन की ज़बान समझती हूँ ग़ुटरग़ूँ ग़ुटरग़ूँ कितनी परवाज़ कर के आते हैं शाम से मैं उन के साथ एक काबुक में बंद हो जाती हूँ वो मेरे बाज़ुओं कंधों और मेरे सर पर बैठ जाते हैं मुझे सुब्ह तक सोने नहीं देते उन के पर सेहर-अंगेज़ लफ़्ज़ों की तरह अपने मआ'नी खोलते हैं तुम्हें मालूम है पर लफ़्ज़ों की तरह होते हैं खुलते हैं मआ'नी की तरह तह-दर-तह अलामतें रम्ज़-निगारी और इशारे किनाए सब कुछ और ये लफ़्ज़ अपने साथ नींदें उड़ा कर ले जाते हैं रात मेरी नींदें ले कर गली में सीटियाँ मारती है और ख़्वाब खिड़कियों पर दस्तकें देते हैं तुम अपनी करवट बदलते हो और रात अपनी पोशाक मैं उन के पैरों में मोतियों वाली झाँझरें डालती हूँ ये अपना अपना दाना दुन्का चुग कर तुम्हारी ओर उड़ जाते हैं और फिर एक नई डार उतरती है

Janan Malik

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तुम ने कभी सोचा है तुम्हारी ये गहरे सन्नाटों में डूबी ख़ामुशी इस दरयूज़ा-गर पर कितनी भारी पड़ती है वो बातें जो तुम्हारे मिज़ाज-ए-मुअल्ला की नफ़ासतों पे गिराँ गुज़रती हैं मेरे लिए क्या मा'नी रखती हैं क्या कभी तुम ने पुर-सुकूत समुंदर के अंदर बिफरी उन लहरों की आवाज़ सुनी है जो किसी तूफ़ान का पेश-ख़ेमा होती हैं मैं ने सुनी है मुझ से पूछो तुम्हारी ख़ामुशी में लिपटे किसी तूफ़ान का साइरन क्या जानते हो तुम मैं ने सुना है तुम्हारे होंटों से गौहर-ए-नायाब की तरह निकला एक एक लफ़्ज़ तुम्हारी ये ठंडे मीठे चश्में जैसी बातें और शीरीं अंदाज़-ए-सुख़न सहरा में चलते मुसाफ़िर की तरह मेरे वजूद को सैराब करता है मैं जो तुम्हारे दर के आगे अपना दामन फैलाए उन नायाब मोतियों को चुनने की चाहत में बैठी रहती हूँ जिसे कभी तो तुम ना-मुराद लौटा देते हो कभी बहुत मेहरबाँ हो कर कुछ ख़ैरात उस के दामन में डाल जाते हो जिस को मैं तुम्हारी गलियों की दरयूज़ा-गर किसी क़ीमती असासे की तरह चुन के अपनी पोटली में रख लेती हूँ

Janan Malik

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मैं ने एक सूखते पेड़ पर नज़्म लिखना शुरूअ' की मेरे अंदर पीले पत्तों के ढेर लग गए मैं ने हवा पर नज़्म लिखी मेरे अंदर शाख़ें फूटने लगीं फूल मेरी हथेलियों से बाहर निकल आए मैं ने बारिश पर नज़्म लिखी मेरी चादर के पल्लू भीग गए जिन को सुखाने के लिए मैं ने धूप पर नज़्म लिखी सूरज सवा नेज़े पर आ गया पेड़ जलने लगे और परिंद मरने लगे मैं ने बादलों के लिए हाथ उठाए फिर कश्तियाँ कम पड़ गईं लोग डूबने लगे मैं ने डूबने वालों पर नज़्म लिखना चाही लाशें ही लाशें मेरी चारों जानिब तैरने लगीं हर एक लाश कहने लगी पहले मुझ पर लिखो पहले मुझ पर मैं ने इस शोर में अपनी भी चीख़ें सुनीं फिर मेरे अंदर एक गहरे और पुर-असरार सुकूत ने बसेरा कर लिया अब मैं इस सुकूत की मेज़बानी करती हूँ इसी के साथ बातें करती हूँ सोती और जागती हूँ दीवारें मेरे लिए लिबास बनती रहती हैं खिड़कियाँ और रौशन-दान मेरे वजूद के घाव हैं जिन पर हर आती हुई सुब्ह और ढलती हुई शाम अपना अपना मरहम रखती हैं और मुझ से कहती हैं हम पर भी नज़्म लिखना जब ये घाव भर जाएँ गली में खेलते बच्चे कभी कभी खिड़की के शीशे से आँखें चिपका कर अंदर झाँकने की कोशिश करते हैं उन्हें कौन ये समझाए चीज़ों के अंदर झाँकने की कोशिश शाइ'र बना देती है

Janan Malik

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