nazmKuch Alfaaz

तुम्हें याद होगा तुम ने मुझे पिछले बरस ख़त में अप्रैल भेजा जो मुझ तक पहुँचते पहुँचते अगस्त हो गया लफ़्ज़ पीले पत्तों की तरह फ़र्श पर बिखर गए दिसम्बर की सर्द रातों में मैं वा'दों के आतिश-दान पर बैठी जागती रही मेरी रगों में जमा हुआ दिसम्बर आँखों से पिघल कर बहता रहता है इस बरस मुझे ख़त में कुछ नहीं भेजना कुछ भी नहीं शायद अज़िय्यतों से भरी शाख़ों पर किसी वा'दे की कोंपल फूट पड़े मौसमों का क्या है कब बदल जाएँ बे-ए'तिबार लहजों की तरह वक़्त सब कुछ उलट पलट रहा है शायद तुम्हारे लौटने तक बहुत कुछ वैसा न रहे जैसा तुम छोड़ गए थे लोहे के जबड़े मिट्टी के मल्बूस को तार-तार करते जा रहे हैं पुल जहाँ से तुम पार्क के किनारे खड़े दिखाई देते थे वो मंज़र मेट्रो बस ने निगल लिया है सुम्बुल के पेड़ों की जगह शॉपिंग मॉल ले चुका है और हाँ वो फूलों वाली दुकान जहाँ से हम बुके लेते थे वहाँ फास्टफूड बन गया दिल की जगह अंतड़ियों ने ले ली है क्या कुछ और कैसे बदल जाता है

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइ‌नात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है

Divya 'Kumar Sahab'

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याद है एक दिन? मेरी मेज़ पे बैठे-बैठे सिगरेट की डिबिया पर तुम ने एक स्केच बनाया था आ कर देखो उस पौधे पर फूल आया है.

Gulzar

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आज तुम्हारे शहर से वापस लौट रही हूँ लेकिन कैसे साबित-ओ-सालिम कौन पलट कर जाता है किस दिल से आई थी मैं तुम से मिलना कैसा होगा जाने क्या कुछ मन में था तुम से मिलूँगी और तुम से मिलूँगी और बहुत सी बातें होंगी कुछ होंटों से बह निकलेंगी कुछ आँखें तहरीर करेंगी लेकिन ये सब ख़्वाब था मेरा देखो वापस लौट रही हूँ तारकोल की बल खाती ये साँपों जैसी सड़कें हर इक मोड़ तुम्हारी यादें और हवा में लम्स तुम्हारा भीगती आँखें ले कर वापस लौट रही हूँ लौट रही हूँ ख़ाली आँख और ख़ाली हाथ दूर उफ़ुक़ पर ज़र्द उदासी की चादर में लिपटा चाँद बिजली के तारों पर बैठे कुछ ख़ामोश परिंद इस चलती गाड़ी में जैसे मैं अफ़्सुर्दा-जाँ एक तरफ़ चिड़ियों का चम्बा पेड़ों पर वो शोर मचाता लेकिन जिस का दिल बुझ जाए उस को इन से क्या पोंछ रही हूँ भीगती आँखें इक इक कर के तेरी यादें आँचल के पल्लू में बाँध रही हूँ लेकिन गाँठ नहीं लगती है मेरी पोरें साथ नहीं हैं जैसे मेरे हाथ नहीं हैं

Janan Malik

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म्यूनिख़ में आज क्रिसमस है सारे मनाज़िर ने सफ़ेद चादर ओढ़ रखी है कमरे की खिड़की से आती उदासी चहार-सू फैलती जा रही है अँधेरा उदासियों के नौहे पढ़ रहा है मुमटियों से फिसलता नहीं कोई कंकर लम्हे साकित हो गए हैं अलमारी के ख़ानों में कुछ यादें बिखरी पड़ी हैं सामने पड़ी कुर्सी झूल रही है सारा माहौल सोगवार है अजीब सा डर है जो आँसू बन कर उतर रहा है आसमाँ सात रंग रौशनियाँ क़हक़हे साज़ नग़्मगी ये हुजूम साल-हा-साल की मसाफ़त है केंचुली बदलने का एहसास आँखों की ख़ामोशी से अथाह गहराई में उतर रहा है मैं अभी लौट कर नहीं आई दिल ने बरसों से रू-ए-आलम की ख़ाक छानी है तेरी अंखों में कहीं वो ज़माने सिमट के आ गए हैं जब कोएटा एयरपोर्ट से नम-नाकी ने तुम्हें रवाना किया रक़्स नग़्मगी चूड़ियों की खनक के नीचे हैं भारी है इन सब साज़ों से हाथ ख़ाली हैं दिल वीरान है दायरा दायरा ये ख़ामोशी दायरा दायरा ये तन्हाई जिस में क़दीम आसार मोहन-जोदाड़ो हड़प्पा बाबिल टेक्सला के जो मेरे अंदर लम्हा लम्हा उतरते जाते हैं मजीद अमजद मैं फ़ासलों की कमंद की असीर मैं तेरी शालात रूद-बार के पुल पर बड़ी देर से खड़ी हूँ

Janan Malik

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मैं रात थी सियाह रात एक नुक़्ते में सिमटी हुई आँख की पुतली जैसे नुक़्ते में मैं ने एक दिन को बाहर निकाला फिर उस दिन की बा-ईं पस्ली से ख़ुद बाहर निकली फिर मिरे अंदर कितने सूरज चाँद और सितारे अपनी अपनी मंज़िलें तय करने लगे मैं रात हूँ कभी न ख़त्म होने वाली रात मैं ने अपनी पोशाक का रंग पैदा किया फिर रंगों से रंग मिलते चले गए मैं रात हूँ मेरे एक बाज़ू पर सुब्ह और दूसरे पर शाम सो रहे हैं मेरी चादर के नीचे शहर क़ब्रिस्तानों की तरह पड़े हुए हैं अज़ानें एक दूसरे से टकरा कर गुम्बदों के आस-पास गिर जाती हैं लोग भिनभिनाती हुई मक्खियों की तरह जागते और सो जाते हैं ख़ुद अपना लहू गिराते और चाटते हैं समुंदर चीख़ते और दरिया रेंगते देखती रहती हूँ देखती रहती हूँ चुप-चाप उन का अंत जिन से फिर उन्हीं का जनम होगा अंत जो नए जन्म का बीज है ग़ुरूब जो तुलूअ'' के तश्त का ग़िलाफ़ है मैं रोने और हँसने से मावरा हूँ कभी कभी माँ की मोहब्बत में रोते हुए बच्चे की आवाज़ मुझे चौंका देती है

Janan Malik

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मैं ने एक सूखते पेड़ पर नज़्म लिखना शुरूअ' की मेरे अंदर पीले पत्तों के ढेर लग गए मैं ने हवा पर नज़्म लिखी मेरे अंदर शाख़ें फूटने लगीं फूल मेरी हथेलियों से बाहर निकल आए मैं ने बारिश पर नज़्म लिखी मेरी चादर के पल्लू भीग गए जिन को सुखाने के लिए मैं ने धूप पर नज़्म लिखी सूरज सवा नेज़े पर आ गया पेड़ जलने लगे और परिंद मरने लगे मैं ने बादलों के लिए हाथ उठाए फिर कश्तियाँ कम पड़ गईं लोग डूबने लगे मैं ने डूबने वालों पर नज़्म लिखना चाही लाशें ही लाशें मेरी चारों जानिब तैरने लगीं हर एक लाश कहने लगी पहले मुझ पर लिखो पहले मुझ पर मैं ने इस शोर में अपनी भी चीख़ें सुनीं फिर मेरे अंदर एक गहरे और पुर-असरार सुकूत ने बसेरा कर लिया अब मैं इस सुकूत की मेज़बानी करती हूँ इसी के साथ बातें करती हूँ सोती और जागती हूँ दीवारें मेरे लिए लिबास बनती रहती हैं खिड़कियाँ और रौशन-दान मेरे वजूद के घाव हैं जिन पर हर आती हुई सुब्ह और ढलती हुई शाम अपना अपना मरहम रखती हैं और मुझ से कहती हैं हम पर भी नज़्म लिखना जब ये घाव भर जाएँ गली में खेलते बच्चे कभी कभी खिड़की के शीशे से आँखें चिपका कर अंदर झाँकने की कोशिश करते हैं उन्हें कौन ये समझाए चीज़ों के अंदर झाँकने की कोशिश शाइ'र बना देती है

Janan Malik

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आगही का दुख तुम क्या जानो किस अज़िय्यत से गुज़रना पड़ता है जब इस के साँप गले में लिपट जाते हैं और भींचते हैं साँसें रुक जाती हैं बार बार फुंकारते और डसते हैं सुब्ह-ओ-शाम रात-दिन उन का ज़हर रग-ओ-पै में उतर जाता है मेरे लहू में सरायत करता है मैं टूटती फूटती रहती हूँ काँच की तरह रेत की तरह खन्खनाती हुई मिट्टी की तरह मेरी नस नस से लहू बहता है शाम ही से मेरे बिस्तर पर आसन जमा लेते हैं मुझे सोने नहीं देते करवट करवट मुझे डसते हैं लेकिन ये साँप मैं ने ख़ुद अपने लहू से पाले हैं अपने वजूद के अंदर 'शकेब' 'सरवत' और ‘सारा’ ने भी पाले थे उन्हें भी नींद नहीं आती थी आख़िर-ए-कार वो रेल की पटरी पर जा कर मीठी नींद सो गए शायद ये रेल की सीटियों से बहुत डरते हैं रेल की पटरी को पार नहीं कर पाते

Janan Malik

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