आगे पीछे दाएँ बाएँ काएँ काएँ काएँ काएँ सुब्ह-सवेरे नूर के तड़के मुँह धो-धा कर नन्हे लड़के बैठते हैं जब खाना खाने कव्वे लगते हैं मंडलाने तौबा तौबा ढीट हैं कितने कव्वे हैं या काले फ़ित्ने लाख हँकाओ लाख उड़ाओ मुँह से चीख़ो हाथ हिलाओ घूरो घुड़को या धुतकारो कोई चीज़ उठा कर मारो कव्वे बाज़ नहीं आते हैं जाते हैं फिर आ जाते हैं हर दम है खाने की आदत शोर मचाने की है आदत बच्चों से बिल्कुल नहीं डरता उन की कुछ परवा नहीं करता देखा नन्हा भोला-भाला छीन लिया हाथों से निवाला कोई इशारा हो या आहट ताड़ के उड़ जाता है झट-पट अब करने दो काएँ काएँ हम क्यूँँ अपनी जान खपाएँ
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हवा का एक झोंका ऐसे गुज़रा कि अपने साथ उस सूनी सड़क पर पड़े बेजान पीले हो चुके उन आम के इमली के गुलमोहर के पत्तों को जिन्हें हम रोज़ अपने पाँव से बाइक के टायर से कुचलते देते थे और इग्नोर कर के आगे बढ़ जाते थे.. अपने साथ सड़कों के किनारों पर बने उन छोटे सूखे नालों में सरका के फेंक आया ये पत्ते याद दिलवाते हैं उन बीते पलों की कि जब हम अपनी धुन में कान में वो लीड ठूँसे अपनी मस्ती से गुज़रते थे किसी जाती हुई स्कूटी पर शहरीली परी को उस के शानों से लटकते बेहया आँचल को बेहद ध्यान से तकते हुए और पास आ कर बोल कर कि "देखिए ये ख़ुश-नसीब आँचल कहीं ग़लती से टायर में न फँस जाए" ओवर टेक करते थे ज़रा सा तेज़ चल कर और आगे बाईं जानिब वो चचा जो 10 की सिगरेट हम को अक्सर 9 में देते थे और उन की ये मुहब्बत पाँव की ज़ंजीर होती थी जो हम को रोक देती थी इन्हें इग्नोर करने से कि ऑफ़िस लेट पहुँचो.. डोंट केयर मगर याँ एक कश तो खींच ही लो क़सम से लॉकडाउन क्या हुआ है ये सब कुछ एक पुरानी फ़िल्म का एक सीन सा मालूम होता है कि जिस में हीरो ग़लती से बहुत पीछे चला आया जहाँ पर दूर तक इंसान क्या हैवान भी ढूँढ़े नहीं मिलते दुआ करता हूँ हम सब इस बला से जीत जाएँ हमारे पाँव चलती ज़िन्दगी के ब्रेक से हट कर दुबारा एक्सेलेटर को दबाएँ !!
Shadab Javed
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नज़्म - वो क्या है उस की आँखें कैसी हैं उस की आँखें रब सी हैं उस की बातें कैसी हैं उस की बातें रौनक़ हैं उस की यादें कैसी हैं मेरी रातों जैसी हैं उस की यादें हिज्र है क्या ये फ़क़त बेकार किस ने बोली है उस का चेहरा कैसा है उस का चेहरा चाँद सा है उस की ज़ुल्फ़ें कैसी है उस की ज़ुल्फ़ें क़ाएनात है उस का साथ चलना क्या है मेरा आगे और आगे बढ़ना है उस की बिंदिया कैसी है माथे पर चाँद जैसी है उस का बोलना कैसा है सारे फ़ज़ा में फ़क़त प्यार ही घोलना है बाग़ में उस का होना कैसा है सारे फूलों को बस खिलना है उस सेे मुहब्बत किस को है उस सेे मुहब्बत सब को है जिस को उस ने चाहा है उस का मुक़द्दर रब ने लिक्खा है मेरी ग़ज़लें मेरी नज़्में क्या है उन के सारे हर्फ़ और सारे मिसरे उस पर है मेरी ग़ज़ल का मतला क्या है उस का चेहरा है शे'र के मिसरे क्या हैं उस की दो आँखें हैं ग़ज़ल का क़ाफ़िया क्या है क़ाफ़िया उस के लब हैं तो रदीफ़ क्या है वो उस की सुंदरता है बताओ फिर मक़्ता क्या है वो उस का दिल है उसपर क्या क्या जँचता है उस पर साड़ी सूट सब जँचता है उस के गाल में पड़ता वो गड्ढा देखो मुझ को दीवाना करता है उस का हुस्न तो है बहुत सुंदर रूह में उस के रब बसता है
Lalit Mohan Joshi
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“इक तरफ़ा मोहब्बत” जान-ए-जिगर ऐ जान-ए-वफ़ा तू मेरे लिए मत ख़्वाब सजा जन्नत की शहज़ादी है तू मैं गलियों का आवारा दिल देने की बात न कर यूँँ मेरे लिए फ़रियाद न कर मेरे पीछे-पीछे मत आ वक़्त अपना बर्बाद न कर तू महलों में रहती मैं सड़कों पे गुज़ारा करता हूँ तू अरबों की मालिक है मैं सब्जी बेचा करता हूँ पछताएगी प्रीत बढ़ा मत कहता हूँ फिर दोबारा जन्नत की शहज़ादी है तू मैं गलियों का आवारा मारा मारा फिरता हूँ मैं फिर भी मुझ पे मरती है रात को मेरे दर्द में ख़ूब उठ उठ के रोया करती है मैं मोहताज़ निवाले का तू चाँद से खेला करती है मुझ सेे मोहब्बत करने की तू फिर भी सोचा करती है इश्क़ मोहब्बत क्या जानूँ मैं तो हूँ पागल बेचारा जन्नत की शहज़ादी है तू मैं गलियों का आवारा तू गद्दे पर सोती है और मैं सोता हूँ सड़कों पर तू रहती है महलों में और मैं रहता फ़ुटपाथों पर रात को चैन से सोते हैं सब मैं मज़दूरी करता हूँ रोज़ निवाले की ख़ातिर मैं जान पे खेला करता हूँ तुझ को कहाँ पे रक्खूँगा ना घर मेरा ना चौबारा जन्नत की शहज़ादी है तू मैं गलियों का आवारा
Prashant Kumar
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"यार" यार था मैं तुम्हारा या महज़ कोई सीढ़ी मंज़िल तक पहूँच गए, पीछे देखा तक नहीं जो सीख किसी ने नहीं वो सीख पेड़ों ने दी छाओं लेते रहे मगर तुम्हारी आरी रुकी नहीं बचपन में खेला करते साथ हम साँप सीढ़ी उतरा ये ज़िंदगी में कब, भनक तक लगी नहीं सपने भी साथ बुने थे बहुत उमीदें भी थी कई बादलों की सैर पर निकल गए तुम, पर मैं नहीं अगर रुकसत की होती ख़बर ज़रा सी भी तब माँ से दो रोटी ज़्यादा, बनवाता नहीं ‘अर्पित’ मैं ने घूम फिर कर यही बात है मानी कई मिलेंगे इन के जैसे, ये ज़ालिम अकेले नहीं
Arpit Sharma
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सुन मेरे ऐ प्यारे रब सुन मेरे ऐ प्यारे रब सारी मुश्किल कर दे हल तू तो वाक़िफ़ है कैसे कटता है मेरा हर पल फ़िक्र-ए-फ़र्दा या तंगी मर्ज़-ए-तन या मजबूरी मुश्किल मुश्किल हर-सू है कितनी क़िस्में हैं इस की माना इन सब के पीछे कुछ तो बेहतर ही होगा मेरी भी ख़ातिर तू ने कुछ है बेहतर ही सोचा पर फिर भी घबराए जी जब सोचूँ मैं मुस्तक़बिल आँखें हो जाती हैं नम अंदर से जलता है दिल चारो जानिब तारीकी दिखती है मुझ को जब जब दिल तब तब ये कहता है सुन मेरे ऐ प्यारे रब
Zaan Farzaan
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देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी आ हा जी गुल-नारी चुनरी रंग रंगीली प्यारी चुनरी मलमल की इक तारी चुनरी नाज़ुक नाज़ुक सारी चुनरी देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी अम्मी के कुछ जी में आया गोटे का इक थान मंगाया चुनरी पर सारा चिपकाया हर कोने पर फूल बनाया देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी लचका है हाथों में लचकता गोटा है कुंदन सा दमकता रौशनी में कैसा है चमकता हाथ लगाने से है मसकता देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी इस को ख़राब होने न दूँगी बैठूँगी तो सँभाल रखूँगी घर में जा कर रख छोड़ूँगी और तेहवार के दिन ओढ़ूँगी देख बुआ मिरी गोटे की चुनरी
Hafeez Jalandhari
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इमारत और शौकत और सरमाए की तस्वीरें ये ऐवानात सब हैं हाल ही की ताज़ा तामीरें इधर कुछ फ़ासले पर चंद घर थे काश्त-कारों के जहाँ अब कार-ख़ाने बन गए सरमाया-दारों के मवेशी हो गए नीलाम क्यूँँ ये कोई क्या जाने कचेहरी जाने साहूकार जाने या ख़ुदा जाने ज़मीं-दारों को जा कर देख ले जो भी कोई चाहे नए भट्टों में ईंटें थापते फिरते हैं हलवाहे यहाँ अपने पुराने गाँव का अब क्या रहा बाक़ी यही तकिया यही इक मैं यही इक झोंपड़ा बाक़ी अज़ीमुश्शान बस्ती है ये नौ-आबाद वीराना यहाँ हम अजनबी दोनों हैं मैं और मेरा काशाना
Hafeez Jalandhari
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लहद में सो रही है आज बे-शक मुश्त-ए-ख़ाक उस की मगर गर्म-ए-अमल है जागती है जान-ए-पाक उस की वो इक फ़ानी बशर था मैं ये बावर कर नहीं सकता बशर इक़बाल हो जाए तो हरगिज़ मर नहीं सकता ब-ज़ेर-ए-साया-ए-दीवार-ए-मस्जिद है जो आसूदा ये ख़ाकी जिस्म है सत्तर बरस का राह पैमूदा ये ख़ाकी जिस्म भी उस का बहुत ही बेश-क़ीमत था जिसे हम-जल्वा समझे थे वो पर्दा भी ग़नीमत था उसे हम नापते थे ले के आँखों ही का पैमाना ग़ज़ल-ख़्वाँ उस को जाना हम ने शाइ'र उस को गर्दाना फ़क़त सूरत ही देखी उस के मअ'नी हम नहीं समझे न देखा रंग-ए-तस्वीर आइने को दिल-नशीं समझे हमें ज़ोफ़-ए-बसारत से कहाँ थी ताब-ए-नज़्ज़ारा सिखाए उस के पर्दे ने हमें आदाब-ए-नज़ारा ये नग़्मा क्या है ज़ेर-ए-पर्दा-हा-ए-साज़ कम समझे रहे सब गोश-बर-आवाज़ लेकिन राज़ कम समझे शिकस्त-ए-पैकर-ए-महसूस ने तोड़ा हिजाब आख़िर तुलू-ए-सुब्ह-ए-महशर बन के चमका आफ़्ताब आख़िर मुक़य्यद अब नहीं 'इक़बाल' अपने जिस्म-ए-फ़ानी में नहीं वो बंद हाइल आज दरिया की रवानी में वजूद-ए-मर्ग की क़ाएल नहीं थी ज़िंदगी उस की त आला अल्लाह अब देखे कोई पाइंदगी उस की जिसे हम मुर्दा समझे ज़िंदा तर पाइंदा तर निकला मह ओ ख़ुर्शीद से ज़र्रे का दिल ताबिंदा तर निकला अभी अंदाज़ा हो सकता नहीं उस की बुलंदी का अभी दुनिया की आँखों पर है पर्दा फ़िरक़ा-बंदी का मगर मेरी निगाहों में हैं चेहरे उन जवानों के जिन्हें 'इक़बाल' ने बख़्शे हैं बाज़ू क़हर-मानों के
Hafeez Jalandhari
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नन्ही हो तुम बच्ची हो तुम सब अक़्ल की कच्ची हो तुम आओ मिरी बातें सुनो चालें सुनो घातें सुनो उस्ताद की हर बात को अपनी गिरह में बाँध लो जब तुम जवाँ हो जाओगी मछली की माँ हो जाओगी फिर याद आएँगी तुम्हें लहरे दिखाएँगी तुम्हें बातें हमारी मछलिओ ऐ प्यारी प्यारी मछलिओ रोहू की बेटी कान धर सांवल की बच्ची आ इधर और नन्ही मुन्नी तू भी सुन ओ थुन मथुन्नी तू भी सुन चौड़े दहाने वालियो और दुम हिलाने वालियो तुम भी सुनो चमकीलियो ऐ काली नीली पीलियो तुम को यहाँ पर देख कर नद्दी पे आ जाए अगर कोई शिकारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो जब वो किनारे बैठ कर डोरी को फेंकेगा इधर नन्हे से काँटे पर चढ़ा होगा मज़े का केचुआ लपकोगी तुम सब बे-ख़बर इक तर निवाला जान कर काँटा मगर चुभ जाएगा बस हल्क़ में खुब जाएगा तड़पोगी और घबराओगी लेकिन सभी फँस जाओगी तुम बारी बारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो जब केचुआ खा जाओ तुम बस लौट कर आ जाओ तुम लेकिन ज़रा सा छेड़ दो काँटे की पतली डोर को सरकंडा जब खिंच आएगा धोका शिकारी खाएगा समझेगा मछली फँस गई खींचेगा बंसी डोर की फिर शक्ल उस की देखना होती है कैसी देखना वो बे-क़रारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो अब वो बहुत झल्लाएगा चीख़ेगा और चिल्लाएगा फिर केचवे पर केचुआ काँटे में भरता जाएगा तुम भी इसी तरकीब से खाती ही जाना केचुवे आख़िर शिकारी हार कर उठेगा दिल को मार कर हीला-गरी रह जाएगी सारी धरी रह जाएगी थैली पिटारी मछलियो ऐ प्यारी प्यारी मछलियो
Hafeez Jalandhari
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आज बादल ख़ूब बरसा और बरस कर खुल गया गुल्सिताँ की डाली डाली पत्ता पत्ता धुल गया देखना क्या धुल गया सारे का सारा आसमाँ ऊदा ऊदा नीला नीला प्यारा प्यारा आसमाँ हट गया बादल का पर्दा मिल गई किरनों को राह सल्तनत पर अपनी फिर ख़ुर्शीद ने डाली निगाह धूप में है घास पर पानी के क़तरों की चमक मात है इस वक़्त मोती और हीरे की दमक दे रही है लुत्फ़ क्या सरसब्ज़ पेड़ों की क़तार और हरी शाख़ों पे है रंगीन फूलों की बहार क्या परिंदे फिर रहे हैं चहचहाते हर तरफ़ रागनी बरसात की ख़ुश हो के गाते हर तरफ़ देखना वो क्या अचम्भा है अरे वो देखना आसमाँ पर इन दरख़्तों से परे वो देखना ये कोई जादू है या सच-मुच है इक रंगीं कमाँ वाह वा कैसा भला लगता है ये प्यारा समाँ किस मुसव्विर ने भरे हैं रंग ऐसे ख़ुशनुमा इस का हर इक रंग है आँखों में जैसे खुब गया इक जगह कैसे इकट्ठे कर दिए हैं सात रंग शोख़ हैं सातों के सातों इक नहीं है मात रंग है ये क़ुदरत का नज़ारा और क्या कहिए इसे बस यही जी चाहता है देखते रहिए इसे नन्हे नन्हे जम्अ'' थे पानी के कुछ क़तरे वहाँ उन पे डाला अक्स सूरज ने बना दी ये कमाँ देखो देखो अब मिटी जाती है वो प्यारी धनक देखते ही देखते गुम हो गई सारी धनक फिर हवा में मिल गई वो सब की सब कुछ भी नहीं आँखें मल मल कर न देखो आओ अब कुछ भी नहीं
Hafeez Jalandhari
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