nazmKuch Alfaaz

लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन तेरे गहवारा-ए-आग़ोश में ऐ जान-ए-बहार अपनी दुनिया-ए-हसीं दफ़्न किए जाता हूँ तू ने जिस दिल को धड़कने की अदा बख़्शी थी आज वो दिल भी यहीं दफ़्न किए जाता हूँ दफ़्न है देख मिरा अहद-ए-बहाराँ तुझ में दफ़्न है देख मिरी रूह-ए-गुलिस्ताँ तुझ में मेरी गुल-पोश जवाँ-साल उमंगों का सुहाग मेरी शादाब तमन्ना के महकते हुए ख़्वाब मेरी बेदार जवानी के फ़िरोज़ाँ मह ओ साल मेरी शामों की मलाहत मिरी सुब्हों का जमाल मेरी महफ़िल का फ़साना मिरी ख़ल्वत का फ़ुसूँ मेरी दीवानगी-ए-शौक़ मिरा नाज़-ए-जुनून मेरे मरने का सलीक़ा मिरे जीने का शुऊ'र मेरा नामूस-ए-वफ़ा मेरी मोहब्बत का ग़ुरूर मेरी नब्ज़ों का तरन्नुम मिरे नग़्मों की पुकार मेरे शे'रों की सजावट मिरे गीतों का सिंगार लखनऊ अपना जहाँ सौंप चला हूँ तुझ को अपना हर ख़्वाब-ए-जवाँ सौंप चला हूँ तुझ को अपना सरमाया-ए-जाँ सौंप चला हूँ तुझ को लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा दफ़्न हैं इस में मोहब्बत के ख़ज़ाने कितने एक उनवान में मुज़्मर हैं फ़साने कितने इक बहन अपनी रिफ़ाक़त की क़सम खाए हुए एक माँ मर के भी सीने में लिए माँ का गुदाज़ अपने बच्चों के लड़कपन को कलेजे से लगाए अपने खिलते हुए मासूम शगूफ़ों के लिए बंद आँखों में बहारों के जवाँ ख़्वाब बसाए ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा एक साथी भी तह-ए-ख़ाक यहाँ सोती है अरसा-ए-दहर की बे-रहम कशाकश का शिकार जान दे कर भी ज़माने से न माने हुए हार अपने तेवर में वही अज़्म-ए-जवाँ-साल लिए ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा देख इक शम-ए-सर-ए-राह-गुज़र चलती है जगमगाता है अगर कोई निशान-ए-मंज़िल ज़िंदगी और भी कुछ तेज़ क़दम चलती है लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन देख इस ख़्वाब-गह-ए-नाज़ पे कल मौज-ए-सबा ले के नौ-रोज़-ए-बहाराँ की ख़बर आएगी सुर्ख़ फूलों का बड़े नाज़ से गूँधे हुए हार कल इसी ख़ाक पे गुल-रंग सहर आएगी कल इसी ख़ाक के ज़र्रों में समा जाएगा रंग कल मिरे प्यार की तस्वीर उभर आएगी ऐ मिरी रूह-ए-चमन ख़ाक-ए-लहद से तेरी आज भी मुझ को तिरे प्यार की बू आती है ज़ख़्म सीने के महकते हैं तिरी ख़ुश्बू से वो महक है कि मिरी साँस घुटी जाती है मुझ से क्या बात बनाएगी ज़माने की जफ़ा मौत ख़ुद आँख मिलाते हुए शरमाती है मैं और इन आँखों से देखूँ तुझे पैवंद-ए-ज़मीं इस क़दर ज़ुल्म नहीं हाए नहीं हाए नहीं कोई ऐ काश बुझा दे मिरी आँखों के दिए छीन ले मुझ से कोई काश निगाहें मेरी ऐ मिरी शम-ए-वफ़ा ऐ मिरी मंज़िल के चराग़ आज तारीक हुई जाती हैं राहें मेरी तुझ को रोऊँ भी तो क्या रोऊँ कि इन आँखों में अश्क पत्थर की तरह जम से गए हैं मेरे ज़िंदगी अर्सा-गह-ए-जोहद-ए-मुसलसल ही सही एक लम्हे को क़दम थम से गए हैं मेरे फिर भी इस अर्सा-गह-ए-जोहद-ए-मुसलसल से मुझे कोई आवाज़ पे आवाज़ दिए जाता है आज सोता ही तुझे छोड़ के जाना होगा नाज़ ये भी ग़म-ए-दौराँ का उठाना होगा ज़िंदगी देख मुझे हुक्म-ए-सफ़र देती है इक दिल-ए-शोला-ब-जाँ साथ लिए जाता हूँ हर क़दम तू ने कभी अज़्म-ए-जवाँ बख़्शा था! मैं वही अज़्म-ए-जवाँ साथ लिए जाता हूँ चूम कर आज तिरी ख़ाक-ए-लहद के ज़र्रे अन-गिनत फूल मोहब्बत के चढ़ाता जाऊँ जाने इस सम्त कभी मेरा गुज़र हो कि न हो आख़िरी बार गले तुझ को लगाता जाऊँ लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन देख इस ख़ाक को आँखों में बसा कर रखना इस अमानत को कलेजे से लगा कर रखना

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी ज़िंदगी शमाकी सूरत हो ख़ुदाया मेरी! दूर दुनिया का मिरे दम से अँधेरा हो जाए! हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाए! हो मिरे दम से यूँंही मेरे वतन की ज़ीनत जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत ज़िंदगी हो मिरी परवाने की सूरत या-रब इल्म की शमासे हो मुझ को मोहब्बत या-रब हो मिरा काम ग़रीबों की हिमायत करना दर्द-मंदों से ज़ईफ़ों से मोहब्बत करना मिरे अल्लाह! बुराई से बचाना मुझ को नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझ को

Allama Iqbal

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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं

Jaun Elia

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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जून का तपता महीना तिम्तिमाता आफ़्ताब ढल चुका है दिन के साँचे में जहन्नम का शबाब दोपहर इक आतिश-ए-सय्याल बरसाती हुई सीना-ए-कोहसार में लावा सा पिघलाती हुई वो झुलसती घास वो पगडंडियाँ पामाल सी नहर के लब ख़ुश्क से ज़र्रों की आँखें लाल सी चिलचिलाती धूप में मैदान को चढ़ता बुख़ार आह के मानिंद उठता हल्का हल्का सा ग़ुबार देख वो मैदान में है इक बगूला बे-क़रार आँधियों की गोद में हो जैसे मुफ़लिस का मज़ार चाक पर जैसे बनाए जा रहे हों ज़लज़ले या जुनूँ तय कर रहा हो गर्दिशों के मरहले ढालना चाहे ज़मीं जिस तरह कोई आसमाँ जैसे चक्कर खा के निकले तोप के मुँह से धुआँ मिल रहा हो जिस तरह जोश-ए-बग़ावत को फ़राग़ जंग छिड़ जाने पे जैसे एक लीडर का दिमाग़ ख़शमगीं अबरू पे डाले ख़ाक-आलूदा नक़ाब जंगलों की राह से आए सफ़ीर-ए-इंक़लाब यूँँ बगूले में हैं तपते सुर्ख़ ज़र्रे बे-क़रार जिस तरह अफ़्लास के दिल में बग़ावत के शरार कस क़दर आज़ाद है ये रूह-ए-सहरा ये भी देख कस तरह ज़र्रों में है तूफ़ान बरपा ये भी देख उठ बगूले की तरह मैदान में गाता निकल ज़िंदगी की रूह हर ज़र्रे में दौड़ाता निकल

Jaan Nisar Akhtar

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फ़ज़ाओं में है सुब्ह का रंग तारी गई है अभी गर्ल्स कॉलेज की लारी गई है अभी गूँजती गुनगुनाती ज़माने की रफ़्तार का राग गाती लचकती हुई सी छलकती हुई सी बहकती हुई सी महकती हुई सी वो सड़कों पे फूलों की धारी सी बनती इधर से उधर से हसीनों को चुनती झलकते वो शीशों में शादाब चेहरे वो कलियाँ सी खुलती हुई मुँह अंधेरे वो माथे पे साड़ी के रंगीं किनारे सहरस निकलती शफ़क़ के इशारे किसी की अदास अयाँ ख़ुश-मज़ाक़ी किसी की निगाहों में कुछ नींद बाक़ी किसी की नज़र में मोहब्बत के दोहे सखी री ये जीवन पिया बिन न सोहे ये खिड़की का रंगीन शीशा गिराए वो शीशे से रंगीन चेहरा मिलाए ये चलती ज़मीं पे निगाहें जमाती वो होंटों में अपने क़लम को दबाती ये खिड़की से इक हाथ बाहर निकाले वो ज़ानू पे गिरती किताबें सँभाले किसी को वो हर बार तेवरी सी चढ़ती दुकानों के तख़्ते अधूरे से पढ़ती कोई इक तरफ़ को सिमटती हुई सी किनारे को साड़ी के बटती हुई सी वो लारी में गूँजे हुए ज़मज़ में से दबी मुस्कुराहट सुबुक क़हक़हे से वो लहजों में चाँदी खनकती हुई सी वो नज़रों से कलियाँ चटकती हुई सी सरों से वो आँचल ढलकते हुए से वो शानों से साग़र छलकते हुए से जवानी निगाहों में बहकी हुई सी मोहब्बत तख़य्युल में बहकी हुई सी वो आपस की छेड़ें वो झूटे फ़साने कोई उन की बातों को कैसे न माने फ़साना भी उन का तराना भी उन का जवानी भी उन की ज़माना भी उन का

Jaan Nisar Akhtar

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तेरी पेशानी-ए-रंगीं में झलकती है जो आग तेरे रुख़्सार के फूलों में दमकती है जो आग तेरे सीने में जवानी की दहकती है जो आग ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे तेरी आँखों में फ़रोज़ाँ हैं जवानी के शरार लब-ए-गुल-रंग पे रक़्साँ हैं जवानी के शरार तेरी हर साँस में ग़लताँ हैं जवानी के शरार ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे हर अदा में है जवाँ आतिश-ए-जज़्बात की रौ ये मचलते हुए शो'ले ये तड़पती हुई लौ आ मिरी रूह पे भी डाल दे अपना परतव ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे कितनी महरूम निगाहें हैं तुझे क्या मालूम कितनी तरसी हुई बाहें हैं तुझे क्या मालूम कैसी धुँदली मिरी राहें हैं तुझे क्या मालूम ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे आ कि ज़ुल्मत में कोई नूर का सामाँ कर लूँ अपने तारीक शबिस्ताँ को शबिस्ताँ कर लूँ इस अँधेरे में कोई शम्अ' फ़रोज़ाँ कर लूँ ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे बार-ए-ज़ुल्मात से सीने की फ़ज़ा है बोझल न कोई साज़-ए-तमन्ना न कोई सोज़-ए-अमल आ कि मशअल से तिरी मैं भी जला लूँ मशअल ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे

Jaan Nisar Akhtar

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तुम मिरी ज़िंदगी में आई हो मेरा इक पाँव जब रिकाब में है दिल की धड़कन है डूबने के क़रीब साँस हर लहजा पेच-ओ-ताब में है टूटते बे-ख़रोश तारों की आख़िरी कपकपी रुबाब में है कोई मंज़िल न जादा-ए-मंज़िल रास्ता गुम किसी सराब में है तुम को चाहा किया ख़यालों में तुम को पाया भी जैसे ख़्वाब में है तुम मिरी ज़िंदगी में आई हो मेरा इक पाँव जब रिकाब में है मैं सोचता था कि तुम आओगी तुम्हें पा कर मैं इस जहान के दुख-दर्द भूल जाऊँगा गले में डाल के बाँहें जो झूल जाओगी मैं आसमान के तारे भी तोड़ लाऊँगा तुम एक बेल की मानिंद बढ़ती जाओगी न छू सकेंगी हवादिस की आँधियाँ तुम को मैं अपनी जान पे सौ आफ़तें उठा लूँगा छुपा के रक्खूँगा बाँहों के दरमियाँ तुम को मगर मैं आज बहुत दूर जाने वाला हूँ बस और चंद नफ़स को तुम्हारे पास हूँ मैं तुम्हें जो पा के ख़ुशी है तुम उस ख़ुशी पे न जाओ तुम्हें ये इल्म नहीं किस क़दर उदास हूँ मैं क्या तुम को ख़बर इस दुनिया की क्या तुम को पता इस दुनिया का मासूम दिलों को दुख देना शेवा है इस दुनिया का ग़म अपना नहीं ग़म इस का है कल जाने तुम्हारा क्या होगा परवान चढ़ोगी तुम कैसे जीने का सहारा क्या होगा आओ कि तरसती बाँहों में इक बार तो तुम को भर लूँ मैं कल तुम जो बड़ी हो जाओगी जब तुम को शुऊर आ जाएगा कितने ही सवालों का धारा एहसास से टकरा जाएगा सोचोगी कि दुनिया तबक़ों में तक़्सीम है क्यूँँ ये फेर है क्या इंसान का इंसाँ बैरी है ये ज़ुल्म है क्या अंधेर है क्या ये नस्ल है क्या ये ज़ात है क्या ये नफ़रत की ता'लीम है क्यूँँ दौलत तो बहुत है मुल्कों में दौलत की मगर तक़्सीम है क्यूँँ तारीख़ बताएगी तुम को इंसाँ से कहाँ पर भूल हुई सरमाए के हाथों लोगों की किस तरह मोहब्बत धूल हुई सदियों से बराबर मेहनत-कश हालात से लड़ते आए हैं छाई है जो अब तक धरती पर उस रात से लड़ते आए हैं दुनिया से अभी तक मिट न सका पर राज इजारा-दारी का ग़ुर्बत है वही अफ़्लास वही रोना है वही बेकारी का मेहनत की अभी तक क़द्र नहीं मेहनत का अभी तक मोल नहीं ढूँडे नहीं मिलतीं वो आँखें जो आँखें हो कश्कोल नहीं सोचा था कि कल इस धरती पर इक रंग नया छा जाएगा इंसान हज़ार बरसों की मेहनत का समर पा जाएगा जीने का बराबर हक़ सब को जब मिलता वो पल आ न सका जिस कल की ख़ातिर जीते-जी मरते रहे वो कल आ न सका लेकिन ये लड़ाई ख़त्म नहीं ये जंग न होगी बंद कभी सौ ज़ख़्म भी खा कर मैदाँ से हटते नहीं जुरअत-मंद कभी वो वक़्त कभी तो आएगा जब दिल के चमन लहराएँगे मर जाऊँ तो क्या मरने से मिरे ये ख़्वाब नहीं मर जाएँगे ये ख़्वाब ही मेरी दौलत हैं ये ख़्वाब तुम्हें दे जाऊँगा इस दहर में जीने मरने के आदाब तुम्हें दे जाऊँगा मुमकिन है कि ये दुनिया की रविश पल भर को तुम्हारा साथ न दे काँटों ही का तोहफ़ा नज़्र करे फूलों की कोई सौग़ात न दे मुमकिन है तुम्हारे रस्ते में हर ज़ुल्म-ओ-सितम दीवार बने सीने में दहकते शो'ले हों हर साँस कोई आज़ार बने ऐसे में न खुल कर रह जाना अश्कों से न आँचल भर लेना ग़म आप बड़ी इक ताक़त है ये ताक़त बस में कर लेना हो अज़्म तो लौ दे उठता है हर ज़ख़्म सुलगते सीने का जो अपना हक़ ख़ुद छीन सके मिलता है उसे हक़ जीने का लेकिन ये हमेशा याद रहे इक फ़र्द की ताक़त कुछ भी नहीं जो भी हो अकेले इंसाँ से दुनिया की बग़ावत कुछ भी नहीं तन्हा जो किसी को पाएँगे ताक़त के शिकंजे जकड़ेंगे सौ हाथ उठेंगे जब मिल कर दुनिया का गरेबाँ पकड़ेंगे इंसान वही है ताबिंदा उस राज़ से जिस का सीना है औरों के लिए तो जीना ही ख़ुद अपने लिए भी जीना है जीने की हर तरह से तमन्ना हसीन है हर शर के बावजूद ये दुनिया हसीन है दरिया की तुंद बाढ़ भयानक सही मगर तूफ़ाँ से खेलता हुआ तिनका हसीन है सहरा का हर सुकूत डराता रहे तो क्या जंगल को काटता हुआ रस्ता हसीन है दिल को हिलाए लाख घटाओं की घन-गरज मिट्टी पे जो गिरा है वो क़तरा हसीन है दहशत दिला रही हैं चटानें तो क्या हुआ पत्थर में जो सनम है वो कितना हसीन है रातों की तीरगी है जो पुर-हौल ग़म नहीं सुब्हों का झाँकता हुआ चेहरा हसीन है हों लाख कोहसार भी हाएल तो क्या हुआ पल पल चमक रहा है जो तेशा हसीन है लाखों सऊबतों का अगर सामना भी हो हर ज़ोहद हर अमल का तक़ाज़ा हसीन है चमन से चंद ही काँटे मैं चुन सका लेकिन बड़ी है बात जो तुम रंग-ए-गुल निखार सको ये दूर दौर-ए-जहाँ काश तुम को रास आए तुम इस ज़मीन को कुछ और भी सँवार सको अमल तुम्हारा ये तौफ़ीक़ दे सके तुम को कि ज़िंदगी का हर इक क़र्ज़ तुम उतार सको सफ़र हयात का आसान हो ही जाता है अगर हो दिल को सहारा किसी की चाहत का वो प्यार जिस में न हो अक़्ल ओ दिल की यक-जेहती किसी तरीक़ से जज़्बा नहीं मोहब्बत का हज़ारों साल में तहज़ीब-ए-जिस्म निखरी है बजा कि जिंस तक़ाज़ा है एक फ़ितरत का तुम्हें कल अपने शरीक-ए-सफ़र को चुनना है वो जिस से तुम को मोहब्बत मिले रिफ़ाक़त भी हज़ार एक हों दो ज़ेहन मुख़्तलिफ़ होंगे ये बात तल्ख़ है लेकिन है ऐन-फ़ितरत भी बहुत हसीन है ज़ेहनी मुफ़ाहमत लेकिन बड़ी अज़ीम है आदर्श की हिफ़ाज़त भी कभी ये गुल भी नज़र को फ़रेब देते हैं हर एक फूल में तमईज़-ए-रंग-ओ-बू रखना ख़याल जिस का गुज़र-गाह-ए-सद-बहाराँ है हर इक क़दम उसी मंज़िल की आरज़ू रखना कोई भी फ़र्ज़ हो ख़्वाहिश से फिर भी बरतर है तमाम उम्र फ़राएज़ की आबरू रखना तुम एक ऐसे घराने की लाज हो जिस ने हर एक दौर को तहज़ीब ओ आगही दी है तमाम मंतिक़ ओ हिकमत तमाम इल्म ओ अदब चराग़ बन के ज़माने को रौशनी दी है जिला-वतन हुए आज़ादी-ए-वतन के लिए मरे तो ऐसे कि औरों को ज़िंदगी दी है ग़म-ए-हयात से लड़ते गुज़ार दी मैं ने मगर ये ग़म है तुम्हें कुछ ख़ुशी न दे पाया वो प्यार जिस से लड़कपन के दिन महक उट्ठें वो प्यार भी मैं तुम्हें दो घड़ी न दे पाया मैं जानता हूँ कि हालात साज़गार न थे मगर मैं ख़ुद को तसल्ली कभी न दे पाया ये मेरी नज़्म मिरा प्यार है तुम्हारे लिए ये शे'र तुम को मिरी रूह का पता देंगे यही तुम्हें मिरे अज़्म ओ अमल की देंगे ख़बर यही तुम्हें मिरी मजबूरियाँ बता देंगे कभी जो ग़म के अँधेरे में डगमगाओगी तुम्हारी राह में कितने दिए जला देंगे अब मिरे पास और वक़्त नहीं साँस हर लहजा इज़्तिराब में है लर्ज़ां लर्ज़ां कोई धुँदलका सा डूबते ज़र्द आफ़्ताब में है मौत को किस लिए हिजाब कहें किस को मालूम क्या हिजाब में है जिस्म-ओ-जाँ का ये आरज़ी रिश्ता कितना मिलता हुआ हुबाब में है आज जो है वो कल नहीं होगा आदमी कौन से हिसाब में है ख़ुद ज़माने बदलते रहते हैं ज़िंदगी सिर्फ़ इंक़लाब में है आओ आँखों में डाल दो आँखें रूह अब नज़'अ के अज़ाब में है थरथराता हुआ तुम्हारा अक्स कब से इस दीदा-ए-पुर-आब में है रौशनी देर से आँखों की बुझी जाती है ठीक से कुछ भी दिखाई नहीं देता मुझ को एक चेहरा मिरे चेहरे पे झुका आता है कौन है ये भी सुझाई नहीं देता मुझ को सिर्फ़ सन्नाटे की आवाज़ चली आती है और तो कुछ भी सुनाई नहीं देता मुझ को आओ उस चाँद से माथे को ज़रा चूम तो लूँ फिर न होगा तुम्हें ये प्यार नसीब आ जाओ आख़िरी लम्हा है सीने पे मिरे सर रख दो दिल की हालत हुई जाती है अजीब आ जाओ न अइज़्ज़ा न अहिब्बा न ख़ुदा है न रसूल कोई इस वक़्त नहीं मेरे क़रीब आ जाओ तुम तो क़रीब आ जाओ!

Jaan Nisar Akhtar

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आज भी कितनी अन-गिनत शमएँ मेरे सीने में झिलमिलाती हैं कितने आरिज़ की झलकियाँ अब तक दिल में सीमीं वरक़ लुटाती हैं कितने हीरा-तराश जिस्मों की बिजलियाँ दिल में कौंद जाती हैं कितनी तारों से ख़ुश-नुमा आँखें मेरी आँखों में मुस्कुराती हैं कितने होंटों की गुल-फ़िशाँ आँचें मेरे होंटों में सनसनाती हैं कितनी शब-ताब रेशमी ज़ुल्फ़ें मेरे बाज़ू पे सरसराती हैं कितनी ख़ुश-रंग मोतियों से भरी बालियाँ दिल में टिमटिमाती हैं कितनी गोरी कलाइयों की लवें दिल के गोशों में जगमगाती हैं कितनी रंगीं हथेलियाँ छुप कर धी में धी में कँवल जलाती हैं कितनी आँचल से फूटती किरनें मेरे पहलू में रसमसाती हैं कितनी पायल की शोख़ झंकारें दिल में चिंगारियाँ उड़ाती हैं कितनी अंगड़ाइयाँ धनक बन कर ख़ुद उभरती हैं टूट जाती हैं कितनी गुल-पोश नक़्रई बाँहें दिल को हल्क़े में ले के गाती हैं आज भी कितनी अन-गिनत शमएँ मेरे सीने में झिलमिलाती हैं अपने इस जल्वा-गर तसव्वुर की जाँ-फ़ज़ा दिलकशी से ज़िंदा हूँ इन ही बीते जवान लम्हों की शोख़-ताबिंदगी से ज़िंदा हूँ यही यादों की रौशनी तो है आज जिस रौशनी से ज़िंदा हूँ आओ मैं तुम से ए'तिराफ़ करूँँ मैं इसी शा'इरी से ज़िंदा हूँ

Jaan Nisar Akhtar

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