तेरी पेशानी-ए-रंगीं में झलकती है जो आग तेरे रुख़्सार के फूलों में दमकती है जो आग तेरे सीने में जवानी की दहकती है जो आग ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे तेरी आँखों में फ़रोज़ाँ हैं जवानी के शरार लब-ए-गुल-रंग पे रक़्साँ हैं जवानी के शरार तेरी हर साँस में ग़लताँ हैं जवानी के शरार ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे हर अदा में है जवाँ आतिश-ए-जज़्बात की रौ ये मचलते हुए शो'ले ये तड़पती हुई लौ आ मिरी रूह पे भी डाल दे अपना परतव ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे कितनी महरूम निगाहें हैं तुझे क्या मालूम कितनी तरसी हुई बाहें हैं तुझे क्या मालूम कैसी धुँदली मिरी राहें हैं तुझे क्या मालूम ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे आ कि ज़ुल्मत में कोई नूर का सामाँ कर लूँ अपने तारीक शबिस्ताँ को शबिस्ताँ कर लूँ इस अँधेरे में कोई शम्अ' फ़रोज़ाँ कर लूँ ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे बार-ए-ज़ुल्मात से सीने की फ़ज़ा है बोझल न कोई साज़-ए-तमन्ना न कोई सोज़-ए-अमल आ कि मशअल से तिरी मैं भी जला लूँ मशअल ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है
Sohaib Mugheera Siddiqi
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जून का तपता महीना तिम्तिमाता आफ़्ताब ढल चुका है दिन के साँचे में जहन्नम का शबाब दोपहर इक आतिश-ए-सय्याल बरसाती हुई सीना-ए-कोहसार में लावा सा पिघलाती हुई वो झुलसती घास वो पगडंडियाँ पामाल सी नहर के लब ख़ुश्क से ज़र्रों की आँखें लाल सी चिलचिलाती धूप में मैदान को चढ़ता बुख़ार आह के मानिंद उठता हल्का हल्का सा ग़ुबार देख वो मैदान में है इक बगूला बे-क़रार आँधियों की गोद में हो जैसे मुफ़लिस का मज़ार चाक पर जैसे बनाए जा रहे हों ज़लज़ले या जुनूँ तय कर रहा हो गर्दिशों के मरहले ढालना चाहे ज़मीं जिस तरह कोई आसमाँ जैसे चक्कर खा के निकले तोप के मुँह से धुआँ मिल रहा हो जिस तरह जोश-ए-बग़ावत को फ़राग़ जंग छिड़ जाने पे जैसे एक लीडर का दिमाग़ ख़शमगीं अबरू पे डाले ख़ाक-आलूदा नक़ाब जंगलों की राह से आए सफ़ीर-ए-इंक़लाब यूँँ बगूले में हैं तपते सुर्ख़ ज़र्रे बे-क़रार जिस तरह अफ़्लास के दिल में बग़ावत के शरार कस क़दर आज़ाद है ये रूह-ए-सहरा ये भी देख कस तरह ज़र्रों में है तूफ़ान बरपा ये भी देख उठ बगूले की तरह मैदान में गाता निकल ज़िंदगी की रूह हर ज़र्रे में दौड़ाता निकल
Jaan Nisar Akhtar
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फ़ज़ाओं में है सुब्ह का रंग तारी गई है अभी गर्ल्स कॉलेज की लारी गई है अभी गूँजती गुनगुनाती ज़माने की रफ़्तार का राग गाती लचकती हुई सी छलकती हुई सी बहकती हुई सी महकती हुई सी वो सड़कों पे फूलों की धारी सी बनती इधर से उधर से हसीनों को चुनती झलकते वो शीशों में शादाब चेहरे वो कलियाँ सी खुलती हुई मुँह अंधेरे वो माथे पे साड़ी के रंगीं किनारे सहरस निकलती शफ़क़ के इशारे किसी की अदास अयाँ ख़ुश-मज़ाक़ी किसी की निगाहों में कुछ नींद बाक़ी किसी की नज़र में मोहब्बत के दोहे सखी री ये जीवन पिया बिन न सोहे ये खिड़की का रंगीन शीशा गिराए वो शीशे से रंगीन चेहरा मिलाए ये चलती ज़मीं पे निगाहें जमाती वो होंटों में अपने क़लम को दबाती ये खिड़की से इक हाथ बाहर निकाले वो ज़ानू पे गिरती किताबें सँभाले किसी को वो हर बार तेवरी सी चढ़ती दुकानों के तख़्ते अधूरे से पढ़ती कोई इक तरफ़ को सिमटती हुई सी किनारे को साड़ी के बटती हुई सी वो लारी में गूँजे हुए ज़मज़ में से दबी मुस्कुराहट सुबुक क़हक़हे से वो लहजों में चाँदी खनकती हुई सी वो नज़रों से कलियाँ चटकती हुई सी सरों से वो आँचल ढलकते हुए से वो शानों से साग़र छलकते हुए से जवानी निगाहों में बहकी हुई सी मोहब्बत तख़य्युल में बहकी हुई सी वो आपस की छेड़ें वो झूटे फ़साने कोई उन की बातों को कैसे न माने फ़साना भी उन का तराना भी उन का जवानी भी उन की ज़माना भी उन का
Jaan Nisar Akhtar
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तुम मिरी ज़िंदगी में आई हो मेरा इक पाँव जब रिकाब में है दिल की धड़कन है डूबने के क़रीब साँस हर लहजा पेच-ओ-ताब में है टूटते बे-ख़रोश तारों की आख़िरी कपकपी रुबाब में है कोई मंज़िल न जादा-ए-मंज़िल रास्ता गुम किसी सराब में है तुम को चाहा किया ख़यालों में तुम को पाया भी जैसे ख़्वाब में है तुम मिरी ज़िंदगी में आई हो मेरा इक पाँव जब रिकाब में है मैं सोचता था कि तुम आओगी तुम्हें पा कर मैं इस जहान के दुख-दर्द भूल जाऊँगा गले में डाल के बाँहें जो झूल जाओगी मैं आसमान के तारे भी तोड़ लाऊँगा तुम एक बेल की मानिंद बढ़ती जाओगी न छू सकेंगी हवादिस की आँधियाँ तुम को मैं अपनी जान पे सौ आफ़तें उठा लूँगा छुपा के रक्खूँगा बाँहों के दरमियाँ तुम को मगर मैं आज बहुत दूर जाने वाला हूँ बस और चंद नफ़स को तुम्हारे पास हूँ मैं तुम्हें जो पा के ख़ुशी है तुम उस ख़ुशी पे न जाओ तुम्हें ये इल्म नहीं किस क़दर उदास हूँ मैं क्या तुम को ख़बर इस दुनिया की क्या तुम को पता इस दुनिया का मासूम दिलों को दुख देना शेवा है इस दुनिया का ग़म अपना नहीं ग़म इस का है कल जाने तुम्हारा क्या होगा परवान चढ़ोगी तुम कैसे जीने का सहारा क्या होगा आओ कि तरसती बाँहों में इक बार तो तुम को भर लूँ मैं कल तुम जो बड़ी हो जाओगी जब तुम को शुऊर आ जाएगा कितने ही सवालों का धारा एहसास से टकरा जाएगा सोचोगी कि दुनिया तबक़ों में तक़्सीम है क्यूँँ ये फेर है क्या इंसान का इंसाँ बैरी है ये ज़ुल्म है क्या अंधेर है क्या ये नस्ल है क्या ये ज़ात है क्या ये नफ़रत की ता'लीम है क्यूँँ दौलत तो बहुत है मुल्कों में दौलत की मगर तक़्सीम है क्यूँँ तारीख़ बताएगी तुम को इंसाँ से कहाँ पर भूल हुई सरमाए के हाथों लोगों की किस तरह मोहब्बत धूल हुई सदियों से बराबर मेहनत-कश हालात से लड़ते आए हैं छाई है जो अब तक धरती पर उस रात से लड़ते आए हैं दुनिया से अभी तक मिट न सका पर राज इजारा-दारी का ग़ुर्बत है वही अफ़्लास वही रोना है वही बेकारी का मेहनत की अभी तक क़द्र नहीं मेहनत का अभी तक मोल नहीं ढूँडे नहीं मिलतीं वो आँखें जो आँखें हो कश्कोल नहीं सोचा था कि कल इस धरती पर इक रंग नया छा जाएगा इंसान हज़ार बरसों की मेहनत का समर पा जाएगा जीने का बराबर हक़ सब को जब मिलता वो पल आ न सका जिस कल की ख़ातिर जीते-जी मरते रहे वो कल आ न सका लेकिन ये लड़ाई ख़त्म नहीं ये जंग न होगी बंद कभी सौ ज़ख़्म भी खा कर मैदाँ से हटते नहीं जुरअत-मंद कभी वो वक़्त कभी तो आएगा जब दिल के चमन लहराएँगे मर जाऊँ तो क्या मरने से मिरे ये ख़्वाब नहीं मर जाएँगे ये ख़्वाब ही मेरी दौलत हैं ये ख़्वाब तुम्हें दे जाऊँगा इस दहर में जीने मरने के आदाब तुम्हें दे जाऊँगा मुमकिन है कि ये दुनिया की रविश पल भर को तुम्हारा साथ न दे काँटों ही का तोहफ़ा नज़्र करे फूलों की कोई सौग़ात न दे मुमकिन है तुम्हारे रस्ते में हर ज़ुल्म-ओ-सितम दीवार बने सीने में दहकते शो'ले हों हर साँस कोई आज़ार बने ऐसे में न खुल कर रह जाना अश्कों से न आँचल भर लेना ग़म आप बड़ी इक ताक़त है ये ताक़त बस में कर लेना हो अज़्म तो लौ दे उठता है हर ज़ख़्म सुलगते सीने का जो अपना हक़ ख़ुद छीन सके मिलता है उसे हक़ जीने का लेकिन ये हमेशा याद रहे इक फ़र्द की ताक़त कुछ भी नहीं जो भी हो अकेले इंसाँ से दुनिया की बग़ावत कुछ भी नहीं तन्हा जो किसी को पाएँगे ताक़त के शिकंजे जकड़ेंगे सौ हाथ उठेंगे जब मिल कर दुनिया का गरेबाँ पकड़ेंगे इंसान वही है ताबिंदा उस राज़ से जिस का सीना है औरों के लिए तो जीना ही ख़ुद अपने लिए भी जीना है जीने की हर तरह से तमन्ना हसीन है हर शर के बावजूद ये दुनिया हसीन है दरिया की तुंद बाढ़ भयानक सही मगर तूफ़ाँ से खेलता हुआ तिनका हसीन है सहरा का हर सुकूत डराता रहे तो क्या जंगल को काटता हुआ रस्ता हसीन है दिल को हिलाए लाख घटाओं की घन-गरज मिट्टी पे जो गिरा है वो क़तरा हसीन है दहशत दिला रही हैं चटानें तो क्या हुआ पत्थर में जो सनम है वो कितना हसीन है रातों की तीरगी है जो पुर-हौल ग़म नहीं सुब्हों का झाँकता हुआ चेहरा हसीन है हों लाख कोहसार भी हाएल तो क्या हुआ पल पल चमक रहा है जो तेशा हसीन है लाखों सऊबतों का अगर सामना भी हो हर ज़ोहद हर अमल का तक़ाज़ा हसीन है चमन से चंद ही काँटे मैं चुन सका लेकिन बड़ी है बात जो तुम रंग-ए-गुल निखार सको ये दूर दौर-ए-जहाँ काश तुम को रास आए तुम इस ज़मीन को कुछ और भी सँवार सको अमल तुम्हारा ये तौफ़ीक़ दे सके तुम को कि ज़िंदगी का हर इक क़र्ज़ तुम उतार सको सफ़र हयात का आसान हो ही जाता है अगर हो दिल को सहारा किसी की चाहत का वो प्यार जिस में न हो अक़्ल ओ दिल की यक-जेहती किसी तरीक़ से जज़्बा नहीं मोहब्बत का हज़ारों साल में तहज़ीब-ए-जिस्म निखरी है बजा कि जिंस तक़ाज़ा है एक फ़ितरत का तुम्हें कल अपने शरीक-ए-सफ़र को चुनना है वो जिस से तुम को मोहब्बत मिले रिफ़ाक़त भी हज़ार एक हों दो ज़ेहन मुख़्तलिफ़ होंगे ये बात तल्ख़ है लेकिन है ऐन-फ़ितरत भी बहुत हसीन है ज़ेहनी मुफ़ाहमत लेकिन बड़ी अज़ीम है आदर्श की हिफ़ाज़त भी कभी ये गुल भी नज़र को फ़रेब देते हैं हर एक फूल में तमईज़-ए-रंग-ओ-बू रखना ख़याल जिस का गुज़र-गाह-ए-सद-बहाराँ है हर इक क़दम उसी मंज़िल की आरज़ू रखना कोई भी फ़र्ज़ हो ख़्वाहिश से फिर भी बरतर है तमाम उम्र फ़राएज़ की आबरू रखना तुम एक ऐसे घराने की लाज हो जिस ने हर एक दौर को तहज़ीब ओ आगही दी है तमाम मंतिक़ ओ हिकमत तमाम इल्म ओ अदब चराग़ बन के ज़माने को रौशनी दी है जिला-वतन हुए आज़ादी-ए-वतन के लिए मरे तो ऐसे कि औरों को ज़िंदगी दी है ग़म-ए-हयात से लड़ते गुज़ार दी मैं ने मगर ये ग़म है तुम्हें कुछ ख़ुशी न दे पाया वो प्यार जिस से लड़कपन के दिन महक उट्ठें वो प्यार भी मैं तुम्हें दो घड़ी न दे पाया मैं जानता हूँ कि हालात साज़गार न थे मगर मैं ख़ुद को तसल्ली कभी न दे पाया ये मेरी नज़्म मिरा प्यार है तुम्हारे लिए ये शे'र तुम को मिरी रूह का पता देंगे यही तुम्हें मिरे अज़्म ओ अमल की देंगे ख़बर यही तुम्हें मिरी मजबूरियाँ बता देंगे कभी जो ग़म के अँधेरे में डगमगाओगी तुम्हारी राह में कितने दिए जला देंगे अब मिरे पास और वक़्त नहीं साँस हर लहजा इज़्तिराब में है लर्ज़ां लर्ज़ां कोई धुँदलका सा डूबते ज़र्द आफ़्ताब में है मौत को किस लिए हिजाब कहें किस को मालूम क्या हिजाब में है जिस्म-ओ-जाँ का ये आरज़ी रिश्ता कितना मिलता हुआ हुबाब में है आज जो है वो कल नहीं होगा आदमी कौन से हिसाब में है ख़ुद ज़माने बदलते रहते हैं ज़िंदगी सिर्फ़ इंक़लाब में है आओ आँखों में डाल दो आँखें रूह अब नज़'अ के अज़ाब में है थरथराता हुआ तुम्हारा अक्स कब से इस दीदा-ए-पुर-आब में है रौशनी देर से आँखों की बुझी जाती है ठीक से कुछ भी दिखाई नहीं देता मुझ को एक चेहरा मिरे चेहरे पे झुका आता है कौन है ये भी सुझाई नहीं देता मुझ को सिर्फ़ सन्नाटे की आवाज़ चली आती है और तो कुछ भी सुनाई नहीं देता मुझ को आओ उस चाँद से माथे को ज़रा चूम तो लूँ फिर न होगा तुम्हें ये प्यार नसीब आ जाओ आख़िरी लम्हा है सीने पे मिरे सर रख दो दिल की हालत हुई जाती है अजीब आ जाओ न अइज़्ज़ा न अहिब्बा न ख़ुदा है न रसूल कोई इस वक़्त नहीं मेरे क़रीब आ जाओ तुम तो क़रीब आ जाओ!
Jaan Nisar Akhtar
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शिद्दत-ए-इफ़्लास से जब ज़िंदगी थी तुझ पे तंग इश्तिहा के साथ थी जब ग़ैरत ओ इस्मत की जंग घात में तेरी रहा ये ख़ुद-ग़रज़ सरमाया-दार खेलता है जो बराबर नौ-ए-इंसाँ का शिकार रफ़्ता रफ़्ता लूट ली तेरी मता-ए-आबरू ख़ूब चूसा तेरी रग रग से जवानी का लहू खेलते हैं आज भी तुझ से यही सरमाया-दार ये तमद्दुन के ख़ुदा तहज़ीब के परवरदिगार सामने दुनिया के तुफ़ करते हैं तेरे नाम पर ख़ल्वतों में जो तिरे क़दमों पे रख देते हैं सर रास्ते में दिन को ले सकते नहीं तेरा सलाम रात को जो तेरे हाथों से चढ़ा जाते हैं जाम तेरे कूचा से जिन्हें हो कर गुज़रना है गुनाह गर्म उन की साँस से रहती है तेरी ख़्वाब-गाह महफ़िलों में तुझ से कर सकते नहीं जो गुफ़्तुगू तेरे आँचल में बंधी है उन की झूटी आबरू पेट की ख़ातिर अगर तू बेचती है जिस्म आज कौन है नफ़रत से तुझ को देखने वाला समाज
Jaan Nisar Akhtar
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उफ़ ये शबनम से छलकते हुए फूलों के अयाग़ इस चमन में हैं अभी दीदा-ए-पुर-नम कितने कितने ग़ुंचे हैं जिगर-चाक गुलिस्ताँ में अभी हर तरफ़ ज़ख़्म हैं बे-मिन्नत-ए-मरहम कितने कितने सीनों में शिकस्ता हैं अभी दिल के रबाब लब-ए-ख़ामोश पे हैं नग़्मा-ए-मातम कितने कितने माथों के अभी सर्द हैं रंगीन गुलाब गर्द अफ़्शाँ हैं अभी गेसू-ए-पुर-ख़म कितने ज़ेहन-ए-आदम में है अफ़्कार की दुनिया आबाद क़ल्ब-ए-इंसाँ में अमानत हैं अभी ग़म कितने धुँदले धुँदले से सितारे हैं उफ़ुक़ पर लर्ज़ां ज़िंदगानी के हसीं ख़्वाब हैं मुबहम कितने आज तो काकुल-ए-गीती न सँवर जाएगी सिलसिले शौक़ के होंगे अभी बरहम कितने जज़्ब होंगे अभी इस ख़ाक-ए-चमन में ऐ दोस्त अश्क बन बन के गुहर-रेज़ा-ए-शबनम कितने अभी गूंजेंगे सलासिल की सदाएँ कितनी और होंगे अभी ज़ंजीर से मातम कितने ज़िंदगी राह-ए-तसादुम में भटकती है अभी वक़्त के लब पे अभी उज़्र हैं पैहम कितने इक ज़रा सब्र कि इन सुर्ख़ घटाओं के तले सर-निगूँ होंगे यहाँ ख़ाक पे परचम कितने लाला-ओ-गुल के तबस्सुम से शफ़क़ फूलेगी हर तरफ़ रंग नज़र आएँगे बाहम कितने ख़ून-ए-दिल में है निहाँ शोला-ए-सद-रंग-ए-बहार इस गुलिस्ताँ में हैं इस राज़ के महरम कितने इन्ही ज़र्रों से उभर आएँगे कितने मह-ओ-मेहर इसी आलम से सँवर जाएँगे आलम कितने
Jaan Nisar Akhtar
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