उफ़ ये शबनम से छलकते हुए फूलों के अयाग़ इस चमन में हैं अभी दीदा-ए-पुर-नम कितने कितने ग़ुंचे हैं जिगर-चाक गुलिस्ताँ में अभी हर तरफ़ ज़ख़्म हैं बे-मिन्नत-ए-मरहम कितने कितने सीनों में शिकस्ता हैं अभी दिल के रबाब लब-ए-ख़ामोश पे हैं नग़्मा-ए-मातम कितने कितने माथों के अभी सर्द हैं रंगीन गुलाब गर्द अफ़्शाँ हैं अभी गेसू-ए-पुर-ख़म कितने ज़ेहन-ए-आदम में है अफ़्कार की दुनिया आबाद क़ल्ब-ए-इंसाँ में अमानत हैं अभी ग़म कितने धुँदले धुँदले से सितारे हैं उफ़ुक़ पर लर्ज़ां ज़िंदगानी के हसीं ख़्वाब हैं मुबहम कितने आज तो काकुल-ए-गीती न सँवर जाएगी सिलसिले शौक़ के होंगे अभी बरहम कितने जज़्ब होंगे अभी इस ख़ाक-ए-चमन में ऐ दोस्त अश्क बन बन के गुहर-रेज़ा-ए-शबनम कितने अभी गूंजेंगे सलासिल की सदाएँ कितनी और होंगे अभी ज़ंजीर से मातम कितने ज़िंदगी राह-ए-तसादुम में भटकती है अभी वक़्त के लब पे अभी उज़्र हैं पैहम कितने इक ज़रा सब्र कि इन सुर्ख़ घटाओं के तले सर-निगूँ होंगे यहाँ ख़ाक पे परचम कितने लाला-ओ-गुल के तबस्सुम से शफ़क़ फूलेगी हर तरफ़ रंग नज़र आएँगे बाहम कितने ख़ून-ए-दिल में है निहाँ शोला-ए-सद-रंग-ए-बहार इस गुलिस्ताँ में हैं इस राज़ के महरम कितने इन्ही ज़र्रों से उभर आएँगे कितने मह-ओ-मेहर इसी आलम से सँवर जाएँगे आलम कितने
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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"नज़्म" इक बरस और कट गया 'शारिक़' रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए यार को भूलने से डरते हुए और सब से बड़ा कमाल है ये साँसें लेने से दिल नहीं भरता अब भी मरने को जी नहीं करता
Shariq Kaifi
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"मैं और मेरी दुनिया" एक ऐसी दुनिया जिस में सिर्फ़ मैं हूँ और सब कुछ मेरे इर्द-गिर्द बुना हुआ जहाँ ख़यालों का आसमाँ है और दिल की ज़मीं है ख़्वाबों के कुछ शजर हैं नीचे अश्कों की नमी है ख़ुशियों की हवा है जो हौले से मुझे छू कर मुस्कुराते हुए गुज़र जाती है ग़मो की बारिश भी है जो दिल की ज़मीं सोख लेती है और तन्हाइयों के मौसम में अक्सर उगने लगते है अहसास के नन्हे पौधे खिलने लगती है उन में अल्फ़ाज़ की नन्ही कलियाँ और फिर बिखर जाती हैं सफ़्हों की फ़िज़ा में कोई ग़ज़ल या नज़्म बनकर
Priya omar
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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जून का तपता महीना तिम्तिमाता आफ़्ताब ढल चुका है दिन के साँचे में जहन्नम का शबाब दोपहर इक आतिश-ए-सय्याल बरसाती हुई सीना-ए-कोहसार में लावा सा पिघलाती हुई वो झुलसती घास वो पगडंडियाँ पामाल सी नहर के लब ख़ुश्क से ज़र्रों की आँखें लाल सी चिलचिलाती धूप में मैदान को चढ़ता बुख़ार आह के मानिंद उठता हल्का हल्का सा ग़ुबार देख वो मैदान में है इक बगूला बे-क़रार आँधियों की गोद में हो जैसे मुफ़लिस का मज़ार चाक पर जैसे बनाए जा रहे हों ज़लज़ले या जुनूँ तय कर रहा हो गर्दिशों के मरहले ढालना चाहे ज़मीं जिस तरह कोई आसमाँ जैसे चक्कर खा के निकले तोप के मुँह से धुआँ मिल रहा हो जिस तरह जोश-ए-बग़ावत को फ़राग़ जंग छिड़ जाने पे जैसे एक लीडर का दिमाग़ ख़शमगीं अबरू पे डाले ख़ाक-आलूदा नक़ाब जंगलों की राह से आए सफ़ीर-ए-इंक़लाब यूँँ बगूले में हैं तपते सुर्ख़ ज़र्रे बे-क़रार जिस तरह अफ़्लास के दिल में बग़ावत के शरार कस क़दर आज़ाद है ये रूह-ए-सहरा ये भी देख कस तरह ज़र्रों में है तूफ़ान बरपा ये भी देख उठ बगूले की तरह मैदान में गाता निकल ज़िंदगी की रूह हर ज़र्रे में दौड़ाता निकल
Jaan Nisar Akhtar
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फ़ज़ाओं में है सुब्ह का रंग तारी गई है अभी गर्ल्स कॉलेज की लारी गई है अभी गूँजती गुनगुनाती ज़माने की रफ़्तार का राग गाती लचकती हुई सी छलकती हुई सी बहकती हुई सी महकती हुई सी वो सड़कों पे फूलों की धारी सी बनती इधर से उधर से हसीनों को चुनती झलकते वो शीशों में शादाब चेहरे वो कलियाँ सी खुलती हुई मुँह अंधेरे वो माथे पे साड़ी के रंगीं किनारे सहरस निकलती शफ़क़ के इशारे किसी की अदास अयाँ ख़ुश-मज़ाक़ी किसी की निगाहों में कुछ नींद बाक़ी किसी की नज़र में मोहब्बत के दोहे सखी री ये जीवन पिया बिन न सोहे ये खिड़की का रंगीन शीशा गिराए वो शीशे से रंगीन चेहरा मिलाए ये चलती ज़मीं पे निगाहें जमाती वो होंटों में अपने क़लम को दबाती ये खिड़की से इक हाथ बाहर निकाले वो ज़ानू पे गिरती किताबें सँभाले किसी को वो हर बार तेवरी सी चढ़ती दुकानों के तख़्ते अधूरे से पढ़ती कोई इक तरफ़ को सिमटती हुई सी किनारे को साड़ी के बटती हुई सी वो लारी में गूँजे हुए ज़मज़ में से दबी मुस्कुराहट सुबुक क़हक़हे से वो लहजों में चाँदी खनकती हुई सी वो नज़रों से कलियाँ चटकती हुई सी सरों से वो आँचल ढलकते हुए से वो शानों से साग़र छलकते हुए से जवानी निगाहों में बहकी हुई सी मोहब्बत तख़य्युल में बहकी हुई सी वो आपस की छेड़ें वो झूटे फ़साने कोई उन की बातों को कैसे न माने फ़साना भी उन का तराना भी उन का जवानी भी उन की ज़माना भी उन का
Jaan Nisar Akhtar
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तेरी पेशानी-ए-रंगीं में झलकती है जो आग तेरे रुख़्सार के फूलों में दमकती है जो आग तेरे सीने में जवानी की दहकती है जो आग ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे तेरी आँखों में फ़रोज़ाँ हैं जवानी के शरार लब-ए-गुल-रंग पे रक़्साँ हैं जवानी के शरार तेरी हर साँस में ग़लताँ हैं जवानी के शरार ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे हर अदा में है जवाँ आतिश-ए-जज़्बात की रौ ये मचलते हुए शो'ले ये तड़पती हुई लौ आ मिरी रूह पे भी डाल दे अपना परतव ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे कितनी महरूम निगाहें हैं तुझे क्या मालूम कितनी तरसी हुई बाहें हैं तुझे क्या मालूम कैसी धुँदली मिरी राहें हैं तुझे क्या मालूम ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे आ कि ज़ुल्मत में कोई नूर का सामाँ कर लूँ अपने तारीक शबिस्ताँ को शबिस्ताँ कर लूँ इस अँधेरे में कोई शम्अ' फ़रोज़ाँ कर लूँ ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे बार-ए-ज़ुल्मात से सीने की फ़ज़ा है बोझल न कोई साज़-ए-तमन्ना न कोई सोज़-ए-अमल आ कि मशअल से तिरी मैं भी जला लूँ मशअल ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे
Jaan Nisar Akhtar
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लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन तेरे गहवारा-ए-आग़ोश में ऐ जान-ए-बहार अपनी दुनिया-ए-हसीं दफ़्न किए जाता हूँ तू ने जिस दिल को धड़कने की अदा बख़्शी थी आज वो दिल भी यहीं दफ़्न किए जाता हूँ दफ़्न है देख मिरा अहद-ए-बहाराँ तुझ में दफ़्न है देख मिरी रूह-ए-गुलिस्ताँ तुझ में मेरी गुल-पोश जवाँ-साल उमंगों का सुहाग मेरी शादाब तमन्ना के महकते हुए ख़्वाब मेरी बेदार जवानी के फ़िरोज़ाँ मह ओ साल मेरी शामों की मलाहत मिरी सुब्हों का जमाल मेरी महफ़िल का फ़साना मिरी ख़ल्वत का फ़ुसूँ मेरी दीवानगी-ए-शौक़ मिरा नाज़-ए-जुनून मेरे मरने का सलीक़ा मिरे जीने का शुऊ'र मेरा नामूस-ए-वफ़ा मेरी मोहब्बत का ग़ुरूर मेरी नब्ज़ों का तरन्नुम मिरे नग़्मों की पुकार मेरे शे'रों की सजावट मिरे गीतों का सिंगार लखनऊ अपना जहाँ सौंप चला हूँ तुझ को अपना हर ख़्वाब-ए-जवाँ सौंप चला हूँ तुझ को अपना सरमाया-ए-जाँ सौंप चला हूँ तुझ को लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा दफ़्न हैं इस में मोहब्बत के ख़ज़ाने कितने एक उनवान में मुज़्मर हैं फ़साने कितने इक बहन अपनी रिफ़ाक़त की क़सम खाए हुए एक माँ मर के भी सीने में लिए माँ का गुदाज़ अपने बच्चों के लड़कपन को कलेजे से लगाए अपने खिलते हुए मासूम शगूफ़ों के लिए बंद आँखों में बहारों के जवाँ ख़्वाब बसाए ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा एक साथी भी तह-ए-ख़ाक यहाँ सोती है अरसा-ए-दहर की बे-रहम कशाकश का शिकार जान दे कर भी ज़माने से न माने हुए हार अपने तेवर में वही अज़्म-ए-जवाँ-साल लिए ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा देख इक शम-ए-सर-ए-राह-गुज़र चलती है जगमगाता है अगर कोई निशान-ए-मंज़िल ज़िंदगी और भी कुछ तेज़ क़दम चलती है लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन देख इस ख़्वाब-गह-ए-नाज़ पे कल मौज-ए-सबा ले के नौ-रोज़-ए-बहाराँ की ख़बर आएगी सुर्ख़ फूलों का बड़े नाज़ से गूँधे हुए हार कल इसी ख़ाक पे गुल-रंग सहर आएगी कल इसी ख़ाक के ज़र्रों में समा जाएगा रंग कल मिरे प्यार की तस्वीर उभर आएगी ऐ मिरी रूह-ए-चमन ख़ाक-ए-लहद से तेरी आज भी मुझ को तिरे प्यार की बू आती है ज़ख़्म सीने के महकते हैं तिरी ख़ुश्बू से वो महक है कि मिरी साँस घुटी जाती है मुझ से क्या बात बनाएगी ज़माने की जफ़ा मौत ख़ुद आँख मिलाते हुए शरमाती है मैं और इन आँखों से देखूँ तुझे पैवंद-ए-ज़मीं इस क़दर ज़ुल्म नहीं हाए नहीं हाए नहीं कोई ऐ काश बुझा दे मिरी आँखों के दिए छीन ले मुझ से कोई काश निगाहें मेरी ऐ मिरी शम-ए-वफ़ा ऐ मिरी मंज़िल के चराग़ आज तारीक हुई जाती हैं राहें मेरी तुझ को रोऊँ भी तो क्या रोऊँ कि इन आँखों में अश्क पत्थर की तरह जम से गए हैं मेरे ज़िंदगी अर्सा-गह-ए-जोहद-ए-मुसलसल ही सही एक लम्हे को क़दम थम से गए हैं मेरे फिर भी इस अर्सा-गह-ए-जोहद-ए-मुसलसल से मुझे कोई आवाज़ पे आवाज़ दिए जाता है आज सोता ही तुझे छोड़ के जाना होगा नाज़ ये भी ग़म-ए-दौराँ का उठाना होगा ज़िंदगी देख मुझे हुक्म-ए-सफ़र देती है इक दिल-ए-शोला-ब-जाँ साथ लिए जाता हूँ हर क़दम तू ने कभी अज़्म-ए-जवाँ बख़्शा था! मैं वही अज़्म-ए-जवाँ साथ लिए जाता हूँ चूम कर आज तिरी ख़ाक-ए-लहद के ज़र्रे अन-गिनत फूल मोहब्बत के चढ़ाता जाऊँ जाने इस सम्त कभी मेरा गुज़र हो कि न हो आख़िरी बार गले तुझ को लगाता जाऊँ लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन देख इस ख़ाक को आँखों में बसा कर रखना इस अमानत को कलेजे से लगा कर रखना
Jaan Nisar Akhtar
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शिद्दत-ए-इफ़्लास से जब ज़िंदगी थी तुझ पे तंग इश्तिहा के साथ थी जब ग़ैरत ओ इस्मत की जंग घात में तेरी रहा ये ख़ुद-ग़रज़ सरमाया-दार खेलता है जो बराबर नौ-ए-इंसाँ का शिकार रफ़्ता रफ़्ता लूट ली तेरी मता-ए-आबरू ख़ूब चूसा तेरी रग रग से जवानी का लहू खेलते हैं आज भी तुझ से यही सरमाया-दार ये तमद्दुन के ख़ुदा तहज़ीब के परवरदिगार सामने दुनिया के तुफ़ करते हैं तेरे नाम पर ख़ल्वतों में जो तिरे क़दमों पे रख देते हैं सर रास्ते में दिन को ले सकते नहीं तेरा सलाम रात को जो तेरे हाथों से चढ़ा जाते हैं जाम तेरे कूचा से जिन्हें हो कर गुज़रना है गुनाह गर्म उन की साँस से रहती है तेरी ख़्वाब-गाह महफ़िलों में तुझ से कर सकते नहीं जो गुफ़्तुगू तेरे आँचल में बंधी है उन की झूटी आबरू पेट की ख़ातिर अगर तू बेचती है जिस्म आज कौन है नफ़रत से तुझ को देखने वाला समाज
Jaan Nisar Akhtar
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