शिद्दत-ए-इफ़्लास से जब ज़िंदगी थी तुझ पे तंग इश्तिहा के साथ थी जब ग़ैरत ओ इस्मत की जंग घात में तेरी रहा ये ख़ुद-ग़रज़ सरमाया-दार खेलता है जो बराबर नौ-ए-इंसाँ का शिकार रफ़्ता रफ़्ता लूट ली तेरी मता-ए-आबरू ख़ूब चूसा तेरी रग रग से जवानी का लहू खेलते हैं आज भी तुझ से यही सरमाया-दार ये तमद्दुन के ख़ुदा तहज़ीब के परवरदिगार सामने दुनिया के तुफ़ करते हैं तेरे नाम पर ख़ल्वतों में जो तिरे क़दमों पे रख देते हैं सर रास्ते में दिन को ले सकते नहीं तेरा सलाम रात को जो तेरे हाथों से चढ़ा जाते हैं जाम तेरे कूचा से जिन्हें हो कर गुज़रना है गुनाह गर्म उन की साँस से रहती है तेरी ख़्वाब-गाह महफ़िलों में तुझ से कर सकते नहीं जो गुफ़्तुगू तेरे आँचल में बंधी है उन की झूटी आबरू पेट की ख़ातिर अगर तू बेचती है जिस्म आज कौन है नफ़रत से तुझ को देखने वाला समाज
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"शाइराना मिज़ाज" अबकि पास आए हो ख़ुश्बूओं के साए हो कल तलक तो मेरे थे आज तुम पराए हो उम्र भर की चाहत की रुख़्सती नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते सादगी से आओगे बे-रुखी से जाओगे मेरे पास आए हो किस का दिल दुखाओगे दिलजलों से जान-ए-जानाँ दिल-लगी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते ख़ार मुस्कुराए थे फूल मुँह बनाए थे मैं ने ख़्वाब बेंचा था मैं ने दिल उगाए थे मैं कि जैसे करता था आदमी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते बे-वफ़ाई आदत है बे-हयाई फ़ितरत है मेरे जैसे आशिक़ हैं आशिक़ी पे लानत है जानाँ मेरे जैसों से मुँह-लगी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते हुस्न पे लिबादा है दर्द भी कुशादा है ज़ेहन का तो फिर भी ठीक दिल नहीं अमादा है यूँँ पराई रौशनी से रौशनी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते ख़ार बोए जाएँगे ख़ाक अब उड़ाएँगे मैं ने तुम को चाहा था और अब भुलाएँगे तुम सेे बैर नहीं करते प्यार भी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते दिल से आगे जाना है पेट चुन के आना है हाथ जिस का थामा है उम्र भर निभाना है उम्र भर के साथी को यूँँ दुखी नहीं करते कहता था न शाइरों से आशिक़ी नहीं करते
Rakesh Mahadiuree
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जून का तपता महीना तिम्तिमाता आफ़्ताब ढल चुका है दिन के साँचे में जहन्नम का शबाब दोपहर इक आतिश-ए-सय्याल बरसाती हुई सीना-ए-कोहसार में लावा सा पिघलाती हुई वो झुलसती घास वो पगडंडियाँ पामाल सी नहर के लब ख़ुश्क से ज़र्रों की आँखें लाल सी चिलचिलाती धूप में मैदान को चढ़ता बुख़ार आह के मानिंद उठता हल्का हल्का सा ग़ुबार देख वो मैदान में है इक बगूला बे-क़रार आँधियों की गोद में हो जैसे मुफ़लिस का मज़ार चाक पर जैसे बनाए जा रहे हों ज़लज़ले या जुनूँ तय कर रहा हो गर्दिशों के मरहले ढालना चाहे ज़मीं जिस तरह कोई आसमाँ जैसे चक्कर खा के निकले तोप के मुँह से धुआँ मिल रहा हो जिस तरह जोश-ए-बग़ावत को फ़राग़ जंग छिड़ जाने पे जैसे एक लीडर का दिमाग़ ख़शमगीं अबरू पे डाले ख़ाक-आलूदा नक़ाब जंगलों की राह से आए सफ़ीर-ए-इंक़लाब यूँँ बगूले में हैं तपते सुर्ख़ ज़र्रे बे-क़रार जिस तरह अफ़्लास के दिल में बग़ावत के शरार कस क़दर आज़ाद है ये रूह-ए-सहरा ये भी देख कस तरह ज़र्रों में है तूफ़ान बरपा ये भी देख उठ बगूले की तरह मैदान में गाता निकल ज़िंदगी की रूह हर ज़र्रे में दौड़ाता निकल
Jaan Nisar Akhtar
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तेरी पेशानी-ए-रंगीं में झलकती है जो आग तेरे रुख़्सार के फूलों में दमकती है जो आग तेरे सीने में जवानी की दहकती है जो आग ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे तेरी आँखों में फ़रोज़ाँ हैं जवानी के शरार लब-ए-गुल-रंग पे रक़्साँ हैं जवानी के शरार तेरी हर साँस में ग़लताँ हैं जवानी के शरार ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे हर अदा में है जवाँ आतिश-ए-जज़्बात की रौ ये मचलते हुए शो'ले ये तड़पती हुई लौ आ मिरी रूह पे भी डाल दे अपना परतव ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे कितनी महरूम निगाहें हैं तुझे क्या मालूम कितनी तरसी हुई बाहें हैं तुझे क्या मालूम कैसी धुँदली मिरी राहें हैं तुझे क्या मालूम ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे आ कि ज़ुल्मत में कोई नूर का सामाँ कर लूँ अपने तारीक शबिस्ताँ को शबिस्ताँ कर लूँ इस अँधेरे में कोई शम्अ' फ़रोज़ाँ कर लूँ ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे बार-ए-ज़ुल्मात से सीने की फ़ज़ा है बोझल न कोई साज़-ए-तमन्ना न कोई सोज़-ए-अमल आ कि मशअल से तिरी मैं भी जला लूँ मशअल ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे
Jaan Nisar Akhtar
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लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन तेरे गहवारा-ए-आग़ोश में ऐ जान-ए-बहार अपनी दुनिया-ए-हसीं दफ़्न किए जाता हूँ तू ने जिस दिल को धड़कने की अदा बख़्शी थी आज वो दिल भी यहीं दफ़्न किए जाता हूँ दफ़्न है देख मिरा अहद-ए-बहाराँ तुझ में दफ़्न है देख मिरी रूह-ए-गुलिस्ताँ तुझ में मेरी गुल-पोश जवाँ-साल उमंगों का सुहाग मेरी शादाब तमन्ना के महकते हुए ख़्वाब मेरी बेदार जवानी के फ़िरोज़ाँ मह ओ साल मेरी शामों की मलाहत मिरी सुब्हों का जमाल मेरी महफ़िल का फ़साना मिरी ख़ल्वत का फ़ुसूँ मेरी दीवानगी-ए-शौक़ मिरा नाज़-ए-जुनून मेरे मरने का सलीक़ा मिरे जीने का शुऊ'र मेरा नामूस-ए-वफ़ा मेरी मोहब्बत का ग़ुरूर मेरी नब्ज़ों का तरन्नुम मिरे नग़्मों की पुकार मेरे शे'रों की सजावट मिरे गीतों का सिंगार लखनऊ अपना जहाँ सौंप चला हूँ तुझ को अपना हर ख़्वाब-ए-जवाँ सौंप चला हूँ तुझ को अपना सरमाया-ए-जाँ सौंप चला हूँ तुझ को लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा दफ़्न हैं इस में मोहब्बत के ख़ज़ाने कितने एक उनवान में मुज़्मर हैं फ़साने कितने इक बहन अपनी रिफ़ाक़त की क़सम खाए हुए एक माँ मर के भी सीने में लिए माँ का गुदाज़ अपने बच्चों के लड़कपन को कलेजे से लगाए अपने खिलते हुए मासूम शगूफ़ों के लिए बंद आँखों में बहारों के जवाँ ख़्वाब बसाए ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा एक साथी भी तह-ए-ख़ाक यहाँ सोती है अरसा-ए-दहर की बे-रहम कशाकश का शिकार जान दे कर भी ज़माने से न माने हुए हार अपने तेवर में वही अज़्म-ए-जवाँ-साल लिए ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा देख इक शम-ए-सर-ए-राह-गुज़र चलती है जगमगाता है अगर कोई निशान-ए-मंज़िल ज़िंदगी और भी कुछ तेज़ क़दम चलती है लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन देख इस ख़्वाब-गह-ए-नाज़ पे कल मौज-ए-सबा ले के नौ-रोज़-ए-बहाराँ की ख़बर आएगी सुर्ख़ फूलों का बड़े नाज़ से गूँधे हुए हार कल इसी ख़ाक पे गुल-रंग सहर आएगी कल इसी ख़ाक के ज़र्रों में समा जाएगा रंग कल मिरे प्यार की तस्वीर उभर आएगी ऐ मिरी रूह-ए-चमन ख़ाक-ए-लहद से तेरी आज भी मुझ को तिरे प्यार की बू आती है ज़ख़्म सीने के महकते हैं तिरी ख़ुश्बू से वो महक है कि मिरी साँस घुटी जाती है मुझ से क्या बात बनाएगी ज़माने की जफ़ा मौत ख़ुद आँख मिलाते हुए शरमाती है मैं और इन आँखों से देखूँ तुझे पैवंद-ए-ज़मीं इस क़दर ज़ुल्म नहीं हाए नहीं हाए नहीं कोई ऐ काश बुझा दे मिरी आँखों के दिए छीन ले मुझ से कोई काश निगाहें मेरी ऐ मिरी शम-ए-वफ़ा ऐ मिरी मंज़िल के चराग़ आज तारीक हुई जाती हैं राहें मेरी तुझ को रोऊँ भी तो क्या रोऊँ कि इन आँखों में अश्क पत्थर की तरह जम से गए हैं मेरे ज़िंदगी अर्सा-गह-ए-जोहद-ए-मुसलसल ही सही एक लम्हे को क़दम थम से गए हैं मेरे फिर भी इस अर्सा-गह-ए-जोहद-ए-मुसलसल से मुझे कोई आवाज़ पे आवाज़ दिए जाता है आज सोता ही तुझे छोड़ के जाना होगा नाज़ ये भी ग़म-ए-दौराँ का उठाना होगा ज़िंदगी देख मुझे हुक्म-ए-सफ़र देती है इक दिल-ए-शोला-ब-जाँ साथ लिए जाता हूँ हर क़दम तू ने कभी अज़्म-ए-जवाँ बख़्शा था! मैं वही अज़्म-ए-जवाँ साथ लिए जाता हूँ चूम कर आज तिरी ख़ाक-ए-लहद के ज़र्रे अन-गिनत फूल मोहब्बत के चढ़ाता जाऊँ जाने इस सम्त कभी मेरा गुज़र हो कि न हो आख़िरी बार गले तुझ को लगाता जाऊँ लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन देख इस ख़ाक को आँखों में बसा कर रखना इस अमानत को कलेजे से लगा कर रखना
Jaan Nisar Akhtar
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उफ़ ये शबनम से छलकते हुए फूलों के अयाग़ इस चमन में हैं अभी दीदा-ए-पुर-नम कितने कितने ग़ुंचे हैं जिगर-चाक गुलिस्ताँ में अभी हर तरफ़ ज़ख़्म हैं बे-मिन्नत-ए-मरहम कितने कितने सीनों में शिकस्ता हैं अभी दिल के रबाब लब-ए-ख़ामोश पे हैं नग़्मा-ए-मातम कितने कितने माथों के अभी सर्द हैं रंगीन गुलाब गर्द अफ़्शाँ हैं अभी गेसू-ए-पुर-ख़म कितने ज़ेहन-ए-आदम में है अफ़्कार की दुनिया आबाद क़ल्ब-ए-इंसाँ में अमानत हैं अभी ग़म कितने धुँदले धुँदले से सितारे हैं उफ़ुक़ पर लर्ज़ां ज़िंदगानी के हसीं ख़्वाब हैं मुबहम कितने आज तो काकुल-ए-गीती न सँवर जाएगी सिलसिले शौक़ के होंगे अभी बरहम कितने जज़्ब होंगे अभी इस ख़ाक-ए-चमन में ऐ दोस्त अश्क बन बन के गुहर-रेज़ा-ए-शबनम कितने अभी गूंजेंगे सलासिल की सदाएँ कितनी और होंगे अभी ज़ंजीर से मातम कितने ज़िंदगी राह-ए-तसादुम में भटकती है अभी वक़्त के लब पे अभी उज़्र हैं पैहम कितने इक ज़रा सब्र कि इन सुर्ख़ घटाओं के तले सर-निगूँ होंगे यहाँ ख़ाक पे परचम कितने लाला-ओ-गुल के तबस्सुम से शफ़क़ फूलेगी हर तरफ़ रंग नज़र आएँगे बाहम कितने ख़ून-ए-दिल में है निहाँ शोला-ए-सद-रंग-ए-बहार इस गुलिस्ताँ में हैं इस राज़ के महरम कितने इन्ही ज़र्रों से उभर आएँगे कितने मह-ओ-मेहर इसी आलम से सँवर जाएँगे आलम कितने
Jaan Nisar Akhtar
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आज भी कितनी अन-गिनत शमएँ मेरे सीने में झिलमिलाती हैं कितने आरिज़ की झलकियाँ अब तक दिल में सीमीं वरक़ लुटाती हैं कितने हीरा-तराश जिस्मों की बिजलियाँ दिल में कौंद जाती हैं कितनी तारों से ख़ुश-नुमा आँखें मेरी आँखों में मुस्कुराती हैं कितने होंटों की गुल-फ़िशाँ आँचें मेरे होंटों में सनसनाती हैं कितनी शब-ताब रेशमी ज़ुल्फ़ें मेरे बाज़ू पे सरसराती हैं कितनी ख़ुश-रंग मोतियों से भरी बालियाँ दिल में टिमटिमाती हैं कितनी गोरी कलाइयों की लवें दिल के गोशों में जगमगाती हैं कितनी रंगीं हथेलियाँ छुप कर धी में धी में कँवल जलाती हैं कितनी आँचल से फूटती किरनें मेरे पहलू में रसमसाती हैं कितनी पायल की शोख़ झंकारें दिल में चिंगारियाँ उड़ाती हैं कितनी अंगड़ाइयाँ धनक बन कर ख़ुद उभरती हैं टूट जाती हैं कितनी गुल-पोश नक़्रई बाँहें दिल को हल्क़े में ले के गाती हैं आज भी कितनी अन-गिनत शमएँ मेरे सीने में झिलमिलाती हैं अपने इस जल्वा-गर तसव्वुर की जाँ-फ़ज़ा दिलकशी से ज़िंदा हूँ इन ही बीते जवान लम्हों की शोख़-ताबिंदगी से ज़िंदा हूँ यही यादों की रौशनी तो है आज जिस रौशनी से ज़िंदा हूँ आओ मैं तुम से ए'तिराफ़ करूँँ मैं इसी शा'इरी से ज़िंदा हूँ
Jaan Nisar Akhtar
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