ख़त एक शा'इरी लिखी है तुम्हारे लिए कभी मिलोगी तो सुनाऊँगा, उस में लिखा है मैं ने कि कितनी रातें तुम्हें याद कर बिताई हैं, हर इक लफ़्ज़ लिखते समय तुम्हारी याद आई हैं, तुम दूर होकर भी हमेशा मेरे पास रही हो, कोई न रहा है जब तुम मेरे साथ रही हो, तुम्हारे मासूम से चेहरे ने सताया है मुझे क्या कहूँ किस तरह से तड़पाया है मुझे इस दर्द को मैं ने एक काग़ज़ में लिखा है, शा'इरी के नाम पर तुम्हें ख़त लिखा है, मिलोगी कभी तो पढ़ दूँगा, वरना पते पर तुम्हारे भेज दूँगा, लगे गर तुम्हें तो जवाब देना रखा है दिल मैं ने इस में, चाहो तो तुम भी रख देना, इस तरह से शा'इरी मेरी मुकम्मल होगी, जैसे ख़ुदा के दर पे दुआ क़ुबूल होगी, तुम कहोगी तो सुना दूँगा, एक शा'इरी लिखी है तुम्हारे लिए मिलोगी कभी तो सुना दूँगा
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
Jaun Elia
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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"पुरानी बातें" प्यार-मुहब्बत, ग़म की बातें, उन बातों में क्या रखा है, छोड़ो यार पुरानी बातें उन बातों में क्या रखा है, सब-कुछ तो अब छूट गया है, गाँव-शहर और दोस्त पुराने, क्यूँ याद करें हम उन की यादें, उन यादों में क्या रखा है, गड़े-मुर्दे, पुरानी यादें, सब तो दिल को दुखाती है, मिलो तो हो कुछ नई बातें, उन बातों में क्या रखा है, सुब्ह नई है, शाम नई है, हाथों का ये जाम नया है, क्यो छेड़े हम वो राग पुराने, उन रागों में क्या रखा है
Mahesh Natakwala
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"आधुनिक मौत" इस दौर में बुज़ुर्ग लाचारी से मरेंगे, औरतें मरेगी समझौतों से नए लड़के न कैंसर से मरेंगे न हार्ट-अटैक से वो मरेंगे अवसाद से, और इस सब का इलाज़ ये है कि इन्हें सिर्फ़ सुना जाए, तब-तक जब तक कि मरज़ पूरा ख़त्म नहीं हो जाता, और कोई इलाज़ नहीं है और कोई इलाज़ कभी था ही नहीं
Mahesh Natakwala
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"इंतिज़ार" हम मिले दिल मिले रात हुई बात हुई प्यार हुआ मौन हुआ बोला न गया पूछा न गया लफ़्ज़ इक भी कहा न गया वो जाने है न माने है ख़ामोशी है अफ़साने हैं इक अदा है जो जफ़ा है लफ़्ज़ बेमानी है ख़ामोशी न जानी है इज़हार है इंतिज़ार है इंतिज़ार है इंतिज़ार है
Mahesh Natakwala
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