"ख़त" हालात पर इक दोष था मजबूर कर के रख दिया हालात ने अपनी दिफ़ा में एक ख़त फिर लिख दिया आदम सुनो किस के कहन पर चल रहे जो ख़ुद ही ख़ुद को खल रहे मंज़िल चुनी रस्ता चुना ख़ुद आप ही बस्ता बुना फिर क्यूँँ उफ़न मुझ पर रहे किस के कहन पर चल रहे क्यूँ चाल लालच में भला टेढ़ी चली मेढ़ी चली जिस के सबब से दाल बिल्कुल भी तुम्हारी नइ गली अब दाल गलने से रही तो क्यूँँ जलाते जा रहे क्यूँ तुम जली ये दाल अब सब को खिलाते जा रहे यूँँ क्यूँँ सभी को छल रहे किस के कहन पर चल रहे
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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मरहले इज़हार-ए-इश्क़ को जो चला तो हुआ ये हाल आया मैं लौट साथ लिए यार इक मलाल मेरे रक़ीब ने कहा कहता हूँ एक बात तेरा हबीब साथ मिरे ही था पिछली रात सुन कर चुभी बहुत मुझे उस ने कही जो बात अँगड़ाइयाँ तवील थीं दोनों की चाँद-रात क्यूँँ मेरी धड़कनों का सबब कर दिया जुदा क्या तख़्त आ गया तिरा ख़तरे में ऐ ख़ुदा कर दर-किनार मेरी दुआ को है खेलता मेरे दिल-ओ-दिमाग़ से क्यूँँ हिज्र का जुआ रब्ब-ए-करीम अब तो करामात कुछ दिखा बन कर हबीब हाथ ज़रा थाम तू मिरा मायूस तुझ से है तू ही इस को सँभाल के दिल इक शफ़ीक़ जाँ है शिकस्ता किया जिसे मेरे लिए बहुत है जनाज़े का इंतिज़ार हो आरज़ू-ए-शोख़ मुबारक सितम-शिआर पर ये न तू समझना कि बर्बाद हाल में छुप कर शब-ए-सियाह गुज़ारूँ मलाल में ठहरूँ न अब कभी दिल-ए-गुलफ़ाम थाम कर दिन काम कर गुज़ार दूँ शब वक़्फ़-ए-जाम कर
Karal 'Maahi'
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"दिल-ए-मुब्तला" हाँ पता है तुम्हें मुहब्बत है बस नहीं जानती मुझी से क्यूँँ राम जाने कि क्या ही देख लिया एक मामूली शक्ल-ओ-सूरत हूँ गुफ़्तगू ख़्वार भी नहीं करती आँख मैं चार भी नहीं करती देख उन नाज़नीं हसीनों को सिर से पा तक नबीन हूरों को जल्वा-ए-बा कमाल है 'माही' नक़्श पूरा बवाल है 'माही' आह भर भर के देखते हैं सब आज़माओ भी अपनी क़िस्मत अब क्या पता दिल वो तुम पे ला बैठे नर्म लहजे में रहना बिन ऐंठे मैं दुआ मैं रखूँगी याद तुम्हें दे न पाएगा कोई माद तुम्हें कहने को अब नहीं है कुछ बाक़ी जाओ भी अब करो उन्हें राज़ी और इक मश्वरा ज़रूरी है बात जिस के बिना अधूरी है रात होने को दिन बुझाने में आँख तक नींद आने जाने में तुम मुझे याद तो नहीं करते वक़्त बर्बाद तो नहीं करते
Karal 'Maahi'
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भोले सब के हैं न दानव देवता का भेद भोले साथ सब के हैं सरलतम बात इतनी है कि भोलेनाथ सब के हैं अगर अनुराग नन्दी सा है तो शिव के निकट हैं आप कि माया-मोह तज कर भी फ़क़ीरी में विकट हैं आप उठाओ हाथ गा कर गाथ काशी-नाथ सब के हैं सरलतम बात इतनी है कि भोलेनाथ सब के हैं न दुगना राम से है स्नेह रावण से न है आधा न भक्तों के लिए विषपान करने में इन्हें बाधा वो शिव ही हैं जिन्हें अपना बनाना हाथ सब के है सरलतम बात इतनी है कि भोलेनाथ सब के हैं
Karal 'Maahi'
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"तेरे जाने से, आने तक" तेरे जाने से, तेरे आने तक इक इंतिज़ार रहता है दिल बे-क़रार रहता है तुझ सेे मिलने का इक जुनून सिर पर सवार रहता है अक्सर तेरी यादों से रुख पर कुछ निखार रहता है बस एक दीद को तकती इन आँखों की पलकों में मेरी कुछ उभार रहता है पूछे जो कोई तो चुप रहता हूँ के क्यूँँकर तेरा इतना ख़ुमार रहता है गर्मी के मौसम में भी मुझ को क्यूँँ तेरा ही एक सो चार बुख़ार रहता है कोशिश तो करता हूँ ख़ुश रक्खूँ इस को फिर भी कमबख़्त दिल ये बीमार रहता है रुस्वा ही कर दूँ खो ही दूँ तुझ को ऐसी बातों से दिल ये होशियार रहता है तुझ सेे शुरू हुआ और तुझ पे ही ख़त्म मेरा दिल तुझ पर जाँनिसार रहता है तेरे बिन आई जो साँसें मुझ को उन का भी जान मुझ पे उधार रहता है धड़कन से धड़कन के बीच की घड़ियों में तेरी ही यादों का शुमार रहता है तेरे हर इक इशारे पर हद ये पार करने को मेरा दिल हर पल तैयार ही रहता है तेरी ही जुस्तजू है तेरी ही चर्चा मेरा तो बस ये रोज़गार रहता है पूछे ख़ुदा अगर तो फिर भी यही कहूँ तेरा हूँ तेरा बस ये ख़याल रहता है तेरे जाने से, तेरे आने तक...
Karal 'Maahi'
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बड़े पावन हृदय हैं नहीं चिंतित वो जिन को ध्यान सुब्ह-ओ-शाम रहते हैं बड़े पावन हृदय हैं जिन में खाटू श्याम रहते हैं गँवाने का न डर होगा न होगी चाह पाने की जो खाटू आ गए वो पा गए मस्ती ख़ज़ाने की ख़ुमारी पा के भी सतनाम की जो आम रहते हैं बड़े पावन हृदय हैं जिन में खाटू श्याम रहते हैं जो पा लो श्याम को तो और क्या पाना ज़रूरी है कि उन का पूर्ण चित से ध्यान करना भी हुज़ूरी है शरण आए जो उन की वो उन्हें फिर थाम रहते हैं बड़े पावन हृदय हैं जिन में खाटू श्याम रहते हैं
Karal 'Maahi'
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