"तेरे जाने से, आने तक" तेरे जाने से, तेरे आने तक इक इंतिज़ार रहता है दिल बे-क़रार रहता है तुझ सेे मिलने का इक जुनून सिर पर सवार रहता है अक्सर तेरी यादों से रुख पर कुछ निखार रहता है बस एक दीद को तकती इन आँखों की पलकों में मेरी कुछ उभार रहता है पूछे जो कोई तो चुप रहता हूँ के क्यूँँकर तेरा इतना ख़ुमार रहता है गर्मी के मौसम में भी मुझ को क्यूँँ तेरा ही एक सो चार बुख़ार रहता है कोशिश तो करता हूँ ख़ुश रक्खूँ इस को फिर भी कमबख़्त दिल ये बीमार रहता है रुस्वा ही कर दूँ खो ही दूँ तुझ को ऐसी बातों से दिल ये होशियार रहता है तुझ सेे शुरू हुआ और तुझ पे ही ख़त्म मेरा दिल तुझ पर जाँनिसार रहता है तेरे बिन आई जो साँसें मुझ को उन का भी जान मुझ पे उधार रहता है धड़कन से धड़कन के बीच की घड़ियों में तेरी ही यादों का शुमार रहता है तेरे हर इक इशारे पर हद ये पार करने को मेरा दिल हर पल तैयार ही रहता है तेरी ही जुस्तजू है तेरी ही चर्चा मेरा तो बस ये रोज़गार रहता है पूछे ख़ुदा अगर तो फिर भी यही कहूँ तेरा हूँ तेरा बस ये ख़याल रहता है तेरे जाने से, तेरे आने तक...
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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने
"Nadeem khan' Kaavish"
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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'हमारी बे-वफ़ा हम सफ़र' बे-सबब प्यार करते हैं तुझ से हम ने ये भी जताया नहीं है कब से तू ने निकाला है दिल से तू ने अब तक बताया नहीं है अपने चेहरे से चिलमन हटा ले हम ने जी भर के देखा नहीं है प्यार होगा मुकम्मल ये कैसे साथ तू ने निभाया नहीं है हम तेरे हैं तेरे ही रहेंगे तू ने अपना ही समझा नहीं है हम तो मजनूँ हुए तेरी ख़ातिर तुझ को हम ने सताया नहीं है प्यार के तोहफ़े हम ने जो दी हैं तू ने उस को भी रक्खा नहीं है रंजिशों में ही छोड़ा है तू ने हम ने मातम मनाया नहीं है बे-वफ़ा तू है 'दानिश' के दिल में तेरे दिल में क्यूँ 'दानिश' नहीं है तेरी ख़ातिर ये जाँ भी है हाज़िर तुझ को जुमला सुनाया नहीं है
Danish Balliavi
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"वजहें" सुनो! जाने से ऐतराज़ नहीं मुझे पर जाओ, तो लौट आने की वजहें छोड़ जाना आज न सही कल सुलझ जाएंगी क्या सही है इन्हें खींच कर तोड़ देना? या बेहतर है गिरहें रहने देना और वक़्त पर छोड़ देना अदद राब्तों में लाज़िम हैं रुस्वाइयाँ भी जब मनाये कोई तो और रूठना जिरह करना फिर मान जाना बात बिगड़ जाती है चुप रहने से भी सब चुप-चाप सहने से भी कहना कह देना कहने देना ख़ामोशियों के भरोसे मत रहना अब जाओ पर लौट आने की वजहें छोड़ जाना
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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मरहले इज़हार-ए-इश्क़ को जो चला तो हुआ ये हाल आया मैं लौट साथ लिए यार इक मलाल मेरे रक़ीब ने कहा कहता हूँ एक बात तेरा हबीब साथ मिरे ही था पिछली रात सुन कर चुभी बहुत मुझे उस ने कही जो बात अँगड़ाइयाँ तवील थीं दोनों की चाँद-रात क्यूँँ मेरी धड़कनों का सबब कर दिया जुदा क्या तख़्त आ गया तिरा ख़तरे में ऐ ख़ुदा कर दर-किनार मेरी दुआ को है खेलता मेरे दिल-ओ-दिमाग़ से क्यूँँ हिज्र का जुआ रब्ब-ए-करीम अब तो करामात कुछ दिखा बन कर हबीब हाथ ज़रा थाम तू मिरा मायूस तुझ से है तू ही इस को सँभाल के दिल इक शफ़ीक़ जाँ है शिकस्ता किया जिसे मेरे लिए बहुत है जनाज़े का इंतिज़ार हो आरज़ू-ए-शोख़ मुबारक सितम-शिआर पर ये न तू समझना कि बर्बाद हाल में छुप कर शब-ए-सियाह गुज़ारूँ मलाल में ठहरूँ न अब कभी दिल-ए-गुलफ़ाम थाम कर दिन काम कर गुज़ार दूँ शब वक़्फ़-ए-जाम कर
Karal 'Maahi'
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"ख़त" हालात पर इक दोष था मजबूर कर के रख दिया हालात ने अपनी दिफ़ा में एक ख़त फिर लिख दिया आदम सुनो किस के कहन पर चल रहे जो ख़ुद ही ख़ुद को खल रहे मंज़िल चुनी रस्ता चुना ख़ुद आप ही बस्ता बुना फिर क्यूँँ उफ़न मुझ पर रहे किस के कहन पर चल रहे क्यूँ चाल लालच में भला टेढ़ी चली मेढ़ी चली जिस के सबब से दाल बिल्कुल भी तुम्हारी नइ गली अब दाल गलने से रही तो क्यूँँ जलाते जा रहे क्यूँ तुम जली ये दाल अब सब को खिलाते जा रहे यूँँ क्यूँँ सभी को छल रहे किस के कहन पर चल रहे
Karal 'Maahi'
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भोले सब के हैं न दानव देवता का भेद भोले साथ सब के हैं सरलतम बात इतनी है कि भोलेनाथ सब के हैं अगर अनुराग नन्दी सा है तो शिव के निकट हैं आप कि माया-मोह तज कर भी फ़क़ीरी में विकट हैं आप उठाओ हाथ गा कर गाथ काशी-नाथ सब के हैं सरलतम बात इतनी है कि भोलेनाथ सब के हैं न दुगना राम से है स्नेह रावण से न है आधा न भक्तों के लिए विषपान करने में इन्हें बाधा वो शिव ही हैं जिन्हें अपना बनाना हाथ सब के है सरलतम बात इतनी है कि भोलेनाथ सब के हैं
Karal 'Maahi'
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"दिल-ए-मुब्तला" हाँ पता है तुम्हें मुहब्बत है बस नहीं जानती मुझी से क्यूँँ राम जाने कि क्या ही देख लिया एक मामूली शक्ल-ओ-सूरत हूँ गुफ़्तगू ख़्वार भी नहीं करती आँख मैं चार भी नहीं करती देख उन नाज़नीं हसीनों को सिर से पा तक नबीन हूरों को जल्वा-ए-बा कमाल है 'माही' नक़्श पूरा बवाल है 'माही' आह भर भर के देखते हैं सब आज़माओ भी अपनी क़िस्मत अब क्या पता दिल वो तुम पे ला बैठे नर्म लहजे में रहना बिन ऐंठे मैं दुआ मैं रखूँगी याद तुम्हें दे न पाएगा कोई माद तुम्हें कहने को अब नहीं है कुछ बाक़ी जाओ भी अब करो उन्हें राज़ी और इक मश्वरा ज़रूरी है बात जिस के बिना अधूरी है रात होने को दिन बुझाने में आँख तक नींद आने जाने में तुम मुझे याद तो नहीं करते वक़्त बर्बाद तो नहीं करते
Karal 'Maahi'
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बड़े पावन हृदय हैं नहीं चिंतित वो जिन को ध्यान सुब्ह-ओ-शाम रहते हैं बड़े पावन हृदय हैं जिन में खाटू श्याम रहते हैं गँवाने का न डर होगा न होगी चाह पाने की जो खाटू आ गए वो पा गए मस्ती ख़ज़ाने की ख़ुमारी पा के भी सतनाम की जो आम रहते हैं बड़े पावन हृदय हैं जिन में खाटू श्याम रहते हैं जो पा लो श्याम को तो और क्या पाना ज़रूरी है कि उन का पूर्ण चित से ध्यान करना भी हुज़ूरी है शरण आए जो उन की वो उन्हें फिर थाम रहते हैं बड़े पावन हृदय हैं जिन में खाटू श्याम रहते हैं
Karal 'Maahi'
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