भोले सब के हैं न दानव देवता का भेद भोले साथ सब के हैं सरलतम बात इतनी है कि भोलेनाथ सब के हैं अगर अनुराग नन्दी सा है तो शिव के निकट हैं आप कि माया-मोह तज कर भी फ़क़ीरी में विकट हैं आप उठाओ हाथ गा कर गाथ काशी-नाथ सब के हैं सरलतम बात इतनी है कि भोलेनाथ सब के हैं न दुगना राम से है स्नेह रावण से न है आधा न भक्तों के लिए विषपान करने में इन्हें बाधा वो शिव ही हैं जिन्हें अपना बनाना हाथ सब के है सरलतम बात इतनी है कि भोलेनाथ सब के हैं
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती
Abrar Kashif
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मरहले इज़हार-ए-इश्क़ को जो चला तो हुआ ये हाल आया मैं लौट साथ लिए यार इक मलाल मेरे रक़ीब ने कहा कहता हूँ एक बात तेरा हबीब साथ मिरे ही था पिछली रात सुन कर चुभी बहुत मुझे उस ने कही जो बात अँगड़ाइयाँ तवील थीं दोनों की चाँद-रात क्यूँँ मेरी धड़कनों का सबब कर दिया जुदा क्या तख़्त आ गया तिरा ख़तरे में ऐ ख़ुदा कर दर-किनार मेरी दुआ को है खेलता मेरे दिल-ओ-दिमाग़ से क्यूँँ हिज्र का जुआ रब्ब-ए-करीम अब तो करामात कुछ दिखा बन कर हबीब हाथ ज़रा थाम तू मिरा मायूस तुझ से है तू ही इस को सँभाल के दिल इक शफ़ीक़ जाँ है शिकस्ता किया जिसे मेरे लिए बहुत है जनाज़े का इंतिज़ार हो आरज़ू-ए-शोख़ मुबारक सितम-शिआर पर ये न तू समझना कि बर्बाद हाल में छुप कर शब-ए-सियाह गुज़ारूँ मलाल में ठहरूँ न अब कभी दिल-ए-गुलफ़ाम थाम कर दिन काम कर गुज़ार दूँ शब वक़्फ़-ए-जाम कर
Karal 'Maahi'
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"तेरे जाने से, आने तक" तेरे जाने से, तेरे आने तक इक इंतिज़ार रहता है दिल बे-क़रार रहता है तुझ सेे मिलने का इक जुनून सिर पर सवार रहता है अक्सर तेरी यादों से रुख पर कुछ निखार रहता है बस एक दीद को तकती इन आँखों की पलकों में मेरी कुछ उभार रहता है पूछे जो कोई तो चुप रहता हूँ के क्यूँँकर तेरा इतना ख़ुमार रहता है गर्मी के मौसम में भी मुझ को क्यूँँ तेरा ही एक सो चार बुख़ार रहता है कोशिश तो करता हूँ ख़ुश रक्खूँ इस को फिर भी कमबख़्त दिल ये बीमार रहता है रुस्वा ही कर दूँ खो ही दूँ तुझ को ऐसी बातों से दिल ये होशियार रहता है तुझ सेे शुरू हुआ और तुझ पे ही ख़त्म मेरा दिल तुझ पर जाँनिसार रहता है तेरे बिन आई जो साँसें मुझ को उन का भी जान मुझ पे उधार रहता है धड़कन से धड़कन के बीच की घड़ियों में तेरी ही यादों का शुमार रहता है तेरे हर इक इशारे पर हद ये पार करने को मेरा दिल हर पल तैयार ही रहता है तेरी ही जुस्तजू है तेरी ही चर्चा मेरा तो बस ये रोज़गार रहता है पूछे ख़ुदा अगर तो फिर भी यही कहूँ तेरा हूँ तेरा बस ये ख़याल रहता है तेरे जाने से, तेरे आने तक...
Karal 'Maahi'
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"ख़त" हालात पर इक दोष था मजबूर कर के रख दिया हालात ने अपनी दिफ़ा में एक ख़त फिर लिख दिया आदम सुनो किस के कहन पर चल रहे जो ख़ुद ही ख़ुद को खल रहे मंज़िल चुनी रस्ता चुना ख़ुद आप ही बस्ता बुना फिर क्यूँँ उफ़न मुझ पर रहे किस के कहन पर चल रहे क्यूँ चाल लालच में भला टेढ़ी चली मेढ़ी चली जिस के सबब से दाल बिल्कुल भी तुम्हारी नइ गली अब दाल गलने से रही तो क्यूँँ जलाते जा रहे क्यूँ तुम जली ये दाल अब सब को खिलाते जा रहे यूँँ क्यूँँ सभी को छल रहे किस के कहन पर चल रहे
Karal 'Maahi'
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"दिल-ए-मुब्तला" हाँ पता है तुम्हें मुहब्बत है बस नहीं जानती मुझी से क्यूँँ राम जाने कि क्या ही देख लिया एक मामूली शक्ल-ओ-सूरत हूँ गुफ़्तगू ख़्वार भी नहीं करती आँख मैं चार भी नहीं करती देख उन नाज़नीं हसीनों को सिर से पा तक नबीन हूरों को जल्वा-ए-बा कमाल है 'माही' नक़्श पूरा बवाल है 'माही' आह भर भर के देखते हैं सब आज़माओ भी अपनी क़िस्मत अब क्या पता दिल वो तुम पे ला बैठे नर्म लहजे में रहना बिन ऐंठे मैं दुआ मैं रखूँगी याद तुम्हें दे न पाएगा कोई माद तुम्हें कहने को अब नहीं है कुछ बाक़ी जाओ भी अब करो उन्हें राज़ी और इक मश्वरा ज़रूरी है बात जिस के बिना अधूरी है रात होने को दिन बुझाने में आँख तक नींद आने जाने में तुम मुझे याद तो नहीं करते वक़्त बर्बाद तो नहीं करते
Karal 'Maahi'
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"तलाश" मैं ख़ुद ही ख़ुदको लगा हूँ खोने तलाश में अब यक़ीन कैसे तुझे दिलाऊँ तलाश का अब सवेर होने पे रात का हश्र याद कर के जहाँ था छूटा शुरू वहीं से करूँँ लगूँ फिर तलाश में अब मैं झूठ ही दिल को दूँ दिलासा के पूछ सपनों से और अपनों से मशवरा कर तुझे तलाशूँ मैं धूप से पूछता जो तुझ को गुज़रते देखा हो दूर से अक्स को तिरे गर निखरते देखा न खो दूँ फिर से ये सोच कर दौड़ मैं पड़ूँ पर पहुँच तिरे अक्स तक तुझे फिर से खो ही देता क़दम क़दम पर निशान खोजूँ फिरूँ हूँ मारा डगर डगर मैं कभी यहाँ तो कभी वहाँ पर निकल पड़ा हूँ तलाश में अब कभी जो रातों को गर मैं निकलूँ तो जुगनुओं से पता लगाऊँ करूँँ मैं पीछा हर इक सितारे का और फिर घर तलाश कर लूँ गुज़र पड़े दर्द हद से तो फिर ग़ज़ल कहूँ और दर्ज कर दूँ दबा के पलकों में अश्क अपने निकल पड़ूँ फिर तलाश में पर यक़ीन कैसे तुझे दिलाऊँ तलाश का अब के ख़ुद ही ख़ुदको लगा हूँ खोने तलाश में अब
Karal 'Maahi'
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