शाम होते ही मैं पसीने में भीगा हुआ बदन खूँटी से लटका देता हूँ दिन भर की कमाई देखने के लिए जेबें टटोलता हूँ तो ख़ाली हाथ जेबों से बाहर गिर पड़ते हैं सोचता हूँ पचास से ऊपर का हो चुका हूँ मेरा मुस्तक़बिल क्या होगा आने वाली नस्ल को क्या मुँह दिखाऊँगा पसीने में भीगा हुआ बदन धोने से डरता हूँ कि आने वाले मेरी मेहनत की निशानी माँगेंगे तो क्या दिखाऊँगा खूँटी पर लटका हुआ बदन सारी रात मुझे घूरता रहता है ख़ाली हाथ चारपाई के नीचे पड़े रहते हैं सुब्ह होने पर बदन खूँटी से उतारता हूँ हाथ चारपाई के नीचे से उठाता हूँ दरवाज़ा खोलता हूँ दिन अपनी पूरी सफ़्फ़ाकी के साथ एक बार फिर मेरे मुक़ाबिल खड़ा होता है
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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बीवी मुझ से कहती है सारा दिन लेटे रहने और नज़्में लिखने से घर कैसे चलेगा नज़्में रोटियाँ तो नहीं कि बच्चों का पेट भर सकें तुम तो अपना पेट शाएरी की तलवार से काट कर मुस्तक़बिल की खूँटी से लटका चुके हो लेकिन हमारे पेट इतने शाइराना नहीं सोचता हूँ बीवी ठीक कहती है नज़्में तो ग़ैब से उतर आती हैं लेकिन रोटियाँ ग़ैब के तन्नूर में नहीं पकतीं वैसे भी शाएरी को ज़िंदा रखने के लिए पेट पर रोटी बाँधनी ज़रूरी है लेकिन मैं उसे दरख़्वास्त करूँँगा वो मुझे एक नज़्म और लिख लेने दे आख़िरी नज़्म जिस में आने वाली कल के लिए कोई ता'रीफ़ नहीं होगी जिस में गुज़र जाने वाली कल के लिए कोई पछतावा नहीं होगा जिस में आज के किसी दुख का मातम नहीं होगा हर लिहाज़ से मुकम्मल नज़्म
Javed Shaheen
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हवा मेरी बात नहीं समझती हवा तुम्हारी बात नहीं समझती हवा हम दोनों से हमारी बात नहीं करती हमारे लफ़्ज़ उस की समा'अत से फिसल जाते हैं वो बे-म'अनी आँखों से हमें देखती रहती है मैं उन का हाल कैसे जानूँ उन्हें अपना हाल कैसे बताऊँ जिन के घर वीरान हैं जिन की सुब्हें रंग से ख़ाली और रातें चाँदनी से महरूम हैं जिन की खिड़कियों पर भारी पर्दे पड़े हैं और दरवाज़ों पर ताले लेकिन हवा ये बातें नहीं समझती वो तो ख़ाली हाथ आती जाती है और ख़ाली हाथ आने और ख़ाली हाथ जाने वालों से हमें क्या लेना
Javed Shaheen
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अगर सर्दियों की किसी रात को कोई भूका गदागर मिरे घर पे आवाज़ दे उस को रोटी का टुकड़ा न दूँगा झुलसती हुई सख़्त दोपहर में कोई बे-कस मुसाफ़िर कहीं प्यास से गिर पड़े उस को पानी का क़तरा न दूँगा मिरा कोई हम-साया मुल्क-ए-अदम को सिधारे तो उस के जनाज़े को कंधा न दूँगा किसी ने मिरी बे-हिसी का सबब मुझ से पूछा तो उस से कहूँगा मिरे शहर में जिस क़दर नेकियाँ थीं वो इक शख़्स की बे-वफ़ाई पे रो कर कहीं आसमानों में गुम हो गई हैं
Javed Shaheen
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बड़ी मुश्किलों से दर्द-ए-ज़ेह में मुब्तला चुप ने एक आवाज़ को जनम दिया मैं ने उसे गोद ले लिया पाल-पोस कर बड़ा किया और उस की ज़बान पर एक लफ़्ज़ रखा मगर वो गूँगी निकली मैं ने मायूसी में उसे क़त्ल कर दिया और पकड़ा गया लाश ठिकाने लगाते वक़्त मुझ पर मुक़द्दमा चला क़त्ल के इल्ज़ाम में मगर मुझे फाँसी की सज़ा हुई एक लफ़्ज़ किसी ज़बान पर रखने के जुर्म में
Javed Shaheen
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मैं ने रात से पूछा ''मेरे घर से चोरी हो जाने वाला ख़्वाब तुम्हारे पास तो नहीं मेरे हम-साए के बच्चों का ख़्वाब घरों में बैठी जवाँ लड़कियों के ख़्वाब शहर से हिजरत कर जाने वाले सारे ख़्वाब तुम्हारे पास तो नहीं''? रात मेरी आँखों में झाँक कर बोली ''इतने सारे ख़्वाबों का चोरी हो जाना और शोर न मचना इतने सारे ख़्वाबों का क़त्ल हो जाना और सुराग़ न चलना इतनी सारी लाशों का दरिया में बहा दिया जाना और पानी का रंग न बदलना कैसे मुमकिन है तुम्हारी मर्ज़ी के बग़ैर तुम्हारी शिरकत के बगै़र'' फिर वो गोद में उठाया हुआ चाँद मेरी तरफ़ बढ़ा कर बोली: ''इस के सर पर हाथ रखो और क़सम खाओ अपनी बे-गुनाही की अपनी मासूमियत की'' और मैं उस का मुँह तकता रह गया
Javed Shaheen
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