nazmKuch Alfaaz

अगर सर्दियों की किसी रात को कोई भूका गदागर मिरे घर पे आवाज़ दे उस को रोटी का टुकड़ा न दूँगा झुलसती हुई सख़्त दोपहर में कोई बे-कस मुसाफ़िर कहीं प्यास से गिर पड़े उस को पानी का क़तरा न दूँगा मिरा कोई हम-साया मुल्क-ए-अदम को सिधारे तो उस के जनाज़े को कंधा न दूँगा किसी ने मिरी बे-हिसी का सबब मुझ से पूछा तो उस से कहूँगा मिरे शहर में जिस क़दर नेकियाँ थीं वो इक शख़्स की बे-वफ़ाई पे रो कर कहीं आसमानों में गुम हो गई हैं

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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"जज़्बात" जो ये आँखों से बह रहा है कितने हम लाचार है तुम समझो तो इंतिज़ार है वरना कोई इंतिज़ार नहीं तुम्हारी याद में ऐसे डूबा जैसे कोई बीमार है तुम समझो तो बे-क़रार है वरना कोई बे-क़रार नहीं जो मेरी धड़कन चल रही है इन में बस तुम्हारा नाम है तुम समझो तो ये पुकार है वरना कोई पुकार नहीं इन हाथो से तुम्हारी ज़ुल्फ़ें सँवारनी हैं हर शाम तुम्हारे साथ गुज़ारनी है तुम समझो तो ये दुलार है वरना कोई दुलार नहीं तुम्हारे बस दिल में जगह नहीं तुम्हारी रूह से रिश्ता चाहिए तुम समझो तो ये आर-पार है वरना कुछ आर-पार नहीं तुम्हें मिल तो जाएगा मुझ सेे अच्छा सामने तुम्हारे तो क़तार है तुम्हें पता है ना तुम्हारी चाहत का बस एक हक़दार है बाकी कोई हक़दार नहीं तुम्हारी बाँहों में ही सुकून मिलेगा मुझे सच कहूँ तो दरकार है तुम समझो तो ये बहार है वरना कहीं बहार नहीं तुम्हारी गोद में आराम चाहिए तुम्हारी आवाज़ में बस अपना नाम चाहिए तुम समझो तो ये क़रार है वरना कोई क़रार नहीं तुम हो जो मेरे जीवन का तुम नहीं तो सब बेज़ार है तुम समझो तो ये आधार है वरना कोई आधार नहीं काश तुम भी हम सेे इक़रार करते चाहत की बरसात मूसला-धार करते मैं तुम सेे बेहद करता और तुम बेहद की भी हद पार करते तुम समझो तो इन सब के आसार हैं वरना कोई आसार नहीं अगर तुम कोशिश करते तो पता चलता की तुम हो तो घर-बार है तुम से ही मेरा संसार है वरना कोई संसार नहीं बिन तेरे ज़िन्दगी तो रहेगी काट लेंगे तुम्हारे बिना तुम समझो तो जीने का विचार है वरना कोई विचार नहीं ये दुनिया भले कुछ भी बोले तुम मेरी नहीं तो क्या मैं तुम्हारा तो हूँ ना यही मेरा इज़हार है अगर तुम समझो तो ये प्यार है वरना कोई प्यार नहीं

Divya 'Kumar Sahab'

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"मज़हबी जंग" उधर मज़हबी जंग का शोर है ख़ुदा मेरा घर भी उसी ओर है तबाही का मंज़र है जाएँ जिधर है टूटी इमारत दुकानें सभी है पत्थर ही पत्थर फ़क़त राह पर कहीं चीख़ ने की सदा है कहीं ख़ामुशी का है आलम कहीं खूँ से लथपथ पड़ा है कोई हैं तलवार हाथों में पकड़े कई सितमगर बढ़ाते बग़ावत न दैर-ओ-हरम है सलामत ज़मीं पर है उतरी क़यामत है बिगड़े से हालात अब शहर में हुई हैं मियाँ कई ज़िंदगी ख़त्म इस बैर में फ़ज़ा में मिली है हवा ख़ौफ़ की समुंदर लबा-लब है लाशों से ही न महफ़ूज़ कोई यहाँ ठौर है ये उठता धुआँ और जलता मकाँ बताते हैं नफ़रत का ये दौर है

MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का

BR SUDHAKAR

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बीवी मुझ से कहती है सारा दिन लेटे रहने और नज़्में लिखने से घर कैसे चलेगा नज़्में रोटियाँ तो नहीं कि बच्चों का पेट भर सकें तुम तो अपना पेट शाएरी की तलवार से काट कर मुस्तक़बिल की खूँटी से लटका चुके हो लेकिन हमारे पेट इतने शाइराना नहीं सोचता हूँ बीवी ठीक कहती है नज़्में तो ग़ैब से उतर आती हैं लेकिन रोटियाँ ग़ैब के तन्नूर में नहीं पकतीं वैसे भी शाएरी को ज़िंदा रखने के लिए पेट पर रोटी बाँधनी ज़रूरी है लेकिन मैं उसे दरख़्वास्त करूँँगा वो मुझे एक नज़्म और लिख लेने दे आख़िरी नज़्म जिस में आने वाली कल के लिए कोई ता'रीफ़ नहीं होगी जिस में गुज़र जाने वाली कल के लिए कोई पछतावा नहीं होगा जिस में आज के किसी दुख का मातम नहीं होगा हर लिहाज़ से मुकम्मल नज़्म

Javed Shaheen

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हवा मेरी बात नहीं समझती हवा तुम्हारी बात नहीं समझती हवा हम दोनों से हमारी बात नहीं करती हमारे लफ़्ज़ उस की समा'अत से फिसल जाते हैं वो बे-म'अनी आँखों से हमें देखती रहती है मैं उन का हाल कैसे जानूँ उन्हें अपना हाल कैसे बताऊँ जिन के घर वीरान हैं जिन की सुब्हें रंग से ख़ाली और रातें चाँदनी से महरूम हैं जिन की खिड़कियों पर भारी पर्दे पड़े हैं और दरवाज़ों पर ताले लेकिन हवा ये बातें नहीं समझती वो तो ख़ाली हाथ आती जाती है और ख़ाली हाथ आने और ख़ाली हाथ जाने वालों से हमें क्या लेना

Javed Shaheen

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एक रौशनी बे-हद शफ़्फ़ाफ़ बीमार रौशनियों के बोझ-तले दबी हुई रिहाई की कोशिश में मसरूफ़ उम्मीद के ज़ीने पर खड़ी मुझे देखती है मेरी तरफ़ सरकती है अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाती है लेकिन फिसल कर अँधेरों में गिर जाती है अंधी रौशनी मेरे मफ़्लूज हाथ देखने से मा'ज़ूर रौशनी

Javed Shaheen

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शाम होते ही मैं पसीने में भीगा हुआ बदन खूँटी से लटका देता हूँ दिन भर की कमाई देखने के लिए जेबें टटोलता हूँ तो ख़ाली हाथ जेबों से बाहर गिर पड़ते हैं सोचता हूँ पचास से ऊपर का हो चुका हूँ मेरा मुस्तक़बिल क्या होगा आने वाली नस्ल को क्या मुँह दिखाऊँगा पसीने में भीगा हुआ बदन धोने से डरता हूँ कि आने वाले मेरी मेहनत की निशानी माँगेंगे तो क्या दिखाऊँगा खूँटी पर लटका हुआ बदन सारी रात मुझे घूरता रहता है ख़ाली हाथ चारपाई के नीचे पड़े रहते हैं सुब्ह होने पर बदन खूँटी से उतारता हूँ हाथ चारपाई के नीचे से उठाता हूँ दरवाज़ा खोलता हूँ दिन अपनी पूरी सफ़्फ़ाकी के साथ एक बार फिर मेरे मुक़ाबिल खड़ा होता है

Javed Shaheen

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बड़ी मुश्किलों से दर्द-ए-ज़ेह में मुब्तला चुप ने एक आवाज़ को जनम दिया मैं ने उसे गोद ले लिया पाल-पोस कर बड़ा किया और उस की ज़बान पर एक लफ़्ज़ रखा मगर वो गूँगी निकली मैं ने मायूसी में उसे क़त्ल कर दिया और पकड़ा गया लाश ठिकाने लगाते वक़्त मुझ पर मुक़द्दमा चला क़त्ल के इल्ज़ाम में मगर मुझे फाँसी की सज़ा हुई एक लफ़्ज़ किसी ज़बान पर रखने के जुर्म में

Javed Shaheen

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