nazmKuch Alfaaz

"कोशिश" मैं तो लिखता जा रहा हूँ लगातार मन में जो आ रहा है अच्छा या अनर्गल क्योंकि वक़्त की छन्नी पर मुझे पूरा भरोसा है छाँट लेगी अगर कुछ बचाने लाइक़ है

Related Nazm

वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

160 likes

"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

111 likes

तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

117 likes

मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

107 likes

"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

70 likes

More from Aatish Indori

कविता उत्तर बदलते रहते हैं जैसे मौसम जैसे नींद में देखे गए सपने कभी लगता था मैं शरीर हूँ अब लगता है मैं कोई छाया हूँ या कोई धीमा प्रकाश और इस समय मेरा उत्तर है लम्हे को शब्दों में विस्तारित करना कविता है

Aatish Indori

0 likes

“ज़ोल्पिडेम” नींद की गोलियाँ डिब्बे से ऐसे ग़ाएब थीं जैसे किसी कहानी से अंत चुप-चाप उठकर चला गया हो मैं रात भर एक आदमी चलित रिक्शा खींच रहा था और एक ख़याल भारी सवारी बन कर बैठा हुआ था

Aatish Indori

0 likes

“कोशिश” मैं लिख रहा हूँ अच्छा या बुरा ये सोचे बिना वरना लिख नहीं पाऊँगा और रह जाएगी ख़ाली काग़ज़ की सफ़ेदी मुझे ये विश्वास है वक़्त की पुरानी छन्नी धीरे-धीरे छानती जाएगी और कविता बच जाएगी

Aatish Indori

0 likes

“भूख और रोटी” इस पिस्तौल को कफ़न पहनाकर जलते अलाव में डालकर अब चलूॅंगा ढाबे से पनीर की कोई सब्ज़ी दाल फ़्राई और ढेर सारी रोटियाँ ले कर कहीं रुकूॅंगा क्यूँ मारा एक अपरिचित इंसान को सिर्फ़ चंद रुपयों की ख़ातिर अब नहीं सोचूॅंगा एक भूखे इंसान के लिए रोटी कितनी ज़रूरी है जब भूख और रोटी में हो विलोमानुपात मैं किसी को नहीं बताऊॅंगा

Aatish Indori

0 likes

"बरहना कर लो" लिखा होता है बाग़ीचों में कि फूल तोड़ना मना है इस लिए लोग फूल नहीं तोड़ते फिर भी लोग फूल के क़रीब जाते हैं ताकि ख़ूबसूरती को और अच्छे से निहार सकें पर फूल को लिबास में ढक देंगे तो बहुत दिक़्क़त होगी वे जो फूल को नहीं तोड़ते वे भी फूल से कहेंगे कि लिबास को हटा लो जो अधीर होंगे वे लिबास को ख़ुद हटा देंगे मैं तुम्हारे मन की आवाज़ सुन रही हूँ पर अक्रिय हूँ अब तुम्हारा मन तुम से कह रहा है कि नंगा कर लो

Aatish Indori

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Aatish Indori.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Aatish Indori's nazm.