nazmKuch Alfaaz

“ज़ोल्पिडेम” नींद की गोलियाँ डिब्बे से ऐसे ग़ाएब थीं जैसे किसी कहानी से अंत चुप-चाप उठकर चला गया हो मैं रात भर एक आदमी चलित रिक्शा खींच रहा था और एक ख़याल भारी सवारी बन कर बैठा हुआ था

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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना

Rishabh Sharma

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रात सुनसान थी बोझल थीं फ़ज़ा की साँसें रूह पर छाए थे बे-नाम ग़मों के साए दिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देने मेरी कोशिश थी कि कम्बख़्त को नींद आ जाए देर तक आँखों में चुभती रही तारों की चमक देर तक ज़ेहन सुलगता रहा तन्हाई में अपने ठुकराए हुए दोस्त की पुर्सिश के लिए तो न आई मगर उस रात की पहनाई में यूँँ अचानक तिरी आवाज़ कहीं से आई जैसे पर्बत का जिगर चीर के झरना फूटे या ज़मीनों की मोहब्बत में तड़प कर नागाह आसमानों से कोई शोख़ सितारा टूटे शहद सा घुल गया तल्ख़ाबा-ए-तन्हाई में रंग सा फैल गया दिल के सियह-ख़ाने में देर तक यूँँ तिरी मस्ताना सदाएँ गूँजीं जिस तरह फूल चटकने लगें वीराने में तू बहुत दूर किसी अंजुमन-ए-नाज़ में थी फिर भी महसूस किया मैं ने कि तू आई है और नग़्मों में छुपा कर मिरे खोए हुए ख़्वाब मेरी रूठी हुई नींदों को मना लाई है रात की सतह पर उभरे तिरे चेहरे के नुक़ूश वही चुप-चाप सी आँखें वही सादा सी नज़र वही ढलका हुआ आँचल वही रफ़्तार का ख़म वही रह रह के लचकता हुआ नाज़ुक पैकर तू मिरे पास न थी फिर भी सहर होने तक तेरा हर साँस मिरे जिस्म को छू कर गुज़रा क़तरा क़तरा तिरे दीदार की शबनम टपकी लम्हा लम्हा तिरी ख़ुश्बू से मोअत्तर गुज़रा अब यही है तुझे मंज़ूर तो ऐ जान-ए-क़रार मैं तिरी राह न देखूँगा सियह रातों में ढूँढ़ लेंगी मिरी तरसी हुई नज़रें तुझ को नग़्मा ओ शे'र की उमडी हुई बरसातों में अब तिरा प्यार सताएगा तो मेरी हस्ती तिरी मस्ती भरी आवाज़ में ढल जाएगी और ये रूह जो तेरे लिए बेचैन सी है गीत बन कर तिरे होंटों पे मचल जाएगी तेरे नग़्मात तिरे हुस्न की ठंडक ले कर मेरे तपते हुए माहौल में आ जाएँगे चंद घड़ियों के लिए हूँ कि हमेशा के लिए मिरी जागी हुई रातों को सुला जाएँगे

Sahir Ludhianvi

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"हिज्र" न जाने कैसे लोग थे वो जो उन के दिल को भा गए मैं ने मोहब्बत चाही तो वो यादें मुझ को थमा गए प्रेम जितना दिल में था ज़बाँ पर आ कर लफ़्ज़ हुआ जब तुम ने उन को सुना नहीं नम बनकर नयन में समा गए दिल में थी एक आस बची तेरी बे-रुख़ी से हार गई वो मोहब्बत थी मेरी जो तुम हँसी में उड़ा गए तुम ने आँखें जो फेरी हैं अब ऐसा शाम सवेरा है सूरज है जैसे बुझा हुआ चँदा तुम जैसे जला गए कानों को थे जो तीर लगे वो दिल पर आ कर ज़ख़्म हुए अब दर्द आँखों में रहता है ये क्या तुम मुझ को सुना गए सागर जो बादल बनकर साहिल से था जुदा हुआ पर्वत ने पूछा हाल ज़रा सारा मंज़र वो बहा गए नींद हटा कर आँखों से ये ख़्वाब तुम्हारे बैठे हैं याद उठी जब आँखों में तो ख़्वाब ये सारे नहा गए बस पैदल ही चल कर के कोई भव-सागर पार हुआ और इस ज़मीं पर डूब कर ये जान कितने गँवा गए अब बस अकेला रहता है और बात तुम्हारी करता है बस खोया सा रहता है क्या तुम दिल को सिखा गए जब साथ तुम्हारा छूटा तो सब ख़्वाब ये मेरे टूटे हैं जब ख़्वाब को पाना चाहा तो सब ज़िम्मेदारी बता गए

Divya 'Kumar Sahab'

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हवा का एक झोंका ऐसे गुज़रा कि अपने साथ उस सूनी सड़क पर पड़े बेजान पीले हो चुके उन आम के इमली के गुलमोहर के पत्तों को जिन्हें हम रोज़ अपने पाँव से बाइक के टायर से कुचलते देते थे और इग्नोर कर के आगे बढ़ जाते थे.. अपने साथ सड़कों के किनारों पर बने उन छोटे सूखे नालों में सरका के फेंक आया ये पत्ते याद दिलवाते हैं उन बीते पलों की कि जब हम अपनी धुन में कान में वो लीड ठूँसे अपनी मस्ती से गुज़रते थे किसी जाती हुई स्कूटी पर शहरीली परी को उस के शानों से लटकते बेहया आँचल को बेहद ध्यान से तकते हुए और पास आ कर बोल कर कि "देखिए ये ख़ुश-नसीब आँचल कहीं ग़लती से टायर में न फँस जाए" ओवर टेक करते थे ज़रा सा तेज़ चल कर और आगे बाईं जानिब वो चचा जो 10 की सिगरेट हम को अक्सर 9 में देते थे और उन की ये मुहब्बत पाँव की ज़ंजीर होती थी जो हम को रोक देती थी इन्हें इग्नोर करने से कि ऑफ़िस लेट पहुँचो.. डोंट केयर मगर याँ एक कश तो खींच ही लो क़सम से लॉकडाउन क्या हुआ है ये सब कुछ एक पुरानी फ़िल्म का एक सीन सा मालूम होता है कि जिस में हीरो ग़लती से बहुत पीछे चला आया जहाँ पर दूर तक इंसान क्या हैवान भी ढूँढ़े नहीं मिलते दुआ करता हूँ हम सब इस बला से जीत जाएँ हमारे पाँव चलती ज़िन्दगी के ब्रेक से हट कर दुबारा एक्सेलेटर को दबाएँ !!

Shadab Javed

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"सफ़र के वक़्त" तुम्हारी याद मिरे दिल का दाग़ है लेकिन सफ़र के वक़्त तो बे-तरह याद आती हो बरस बरस की हो आदत का जब हिसाब तो फिर बहुत सताती हो जानम बहुत सताती हो मैं भूल जाऊँ मगर कैसे भूल जाऊँ भला अज़ाब-ए-जाँ की हक़ीक़त का अपनी अफ़्साना मिरे सफ़र के वो लम्हे तुम्हारी पुर-हाली वो बात बात मुझे बार बार समझाना ये पाँच कुर्ते हैं देखो ये पाँच पाजा में डले हुए हैं क़मर-बंद इन में और देखो ये शेव-बॉक्स है और ये है ओलड असपाइस नहीं हुज़ूर की झोंजल का अब कोई बाइ'से ये डाइरी है और इस में पते हैं और नंबर इसे ख़याल से बक्से की जेब में रखना है अर्ज़ ''हज़रत-ए-ग़ाएब-दिमाग़'' बंदी की कि अपने ऐब की हालत को ग़ैब में रखना ये तीन कोट हैं पतलून हैं ये टाइयाँ हैं बंधी हुई हैं ये सब तुम को कुछ नहीं करना ये 'वेलियम' है 'ओनटल' है और 'टरपटी-नाल' तुम इन के साथ मिरी जाँ ड्रिंक से डरना बहुत ज़ियादा न पीना कि कुछ न याद आए जो लखनऊ में हुआ था वो अब दोबारा न हो हो तुम सुख़न की अना और तमकनत जानम मज़ाक़ का किसी 'इंशा' को तुम से यारा न हो वो 'जौन' जो नज़र आता है उस का ज़िक्र नहीं तुम अपने 'जौन' का जो तुम में है भरम रखना अजीब बात है जो तुम से कह रही हूँ मैं ख़याल मेरा ज़ियादा और अपना कम रखना हो तुम बला के बग़ावत-पसंद तल्ख़-कलाम ख़ुद अपने हक़ में इक आज़ार हो गए हो तुम तुम्हारे सारे सहाबा ने तुम को छोड़ दिया मुझे क़लक़ है कि बे-यार हो गए हो तुम ये बैंक-कार मैनेजर ये अपने टेक्नोक्रेट कोई भी शुबह नहीं हैं ये एक अबस का ढिढोल मैं ख़ुद भी इन को क्रो-मैग्नन समझती हूँ ये शानदार जनावर हैं दफ़्तरों का मख़ौल मैं जानती हूँ कि तुम सुन नहीं रहे मिरी बात समाज झूट सही फिर भी उस का पास करो है तुम को तैश है बालिशतियों की ये दुनिया तो फिर क़रीने से तुम उन को बे-लिबास करो तुम एक सादा ओ बरजस्ता आदमी ठहरे मिज़ाज-ए-वक़्त को तुम आज तक नहीं समझे जो चीज़ सब से ज़रूरी है वो मैं भूल गई ये पासपोर्ट है इस को सँभाल के रखना जो ये न हो तो ख़ुदा भी बशर तक आ न सके सो तुम शुऊ'र का अपने कमाल कर रखना मिरी शिकस्त के ज़ख़्मों की सोज़िश-ए-जावेद नहीं रहा मिरे ज़ख़्मों का अब हिसाब कोई है अब जो हाल मिरा वो अजब तमाशा है मिरा अज़ाब नहीं अब मिरा अज़ाब कोई नहीं कोई मिरी मंज़िल पे है सफ़र दरपेश है गर्द गर्द अबस मुझ को दर-ब-दर पेश

Jaun Elia

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कविता उत्तर बदलते रहते हैं जैसे मौसम जैसे नींद में देखे गए सपने कभी लगता था मैं शरीर हूँ अब लगता है मैं कोई छाया हूँ या कोई धीमा प्रकाश और इस समय मेरा उत्तर है लम्हे को शब्दों में विस्तारित करना कविता है

Aatish Indori

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“भूख और रोटी” इस पिस्तौल को कफ़न पहनाकर जलते अलाव में डालकर अब चलूॅंगा ढाबे से पनीर की कोई सब्ज़ी दाल फ़्राई और ढेर सारी रोटियाँ ले कर कहीं रुकूॅंगा क्यूँ मारा एक अपरिचित इंसान को सिर्फ़ चंद रुपयों की ख़ातिर अब नहीं सोचूॅंगा एक भूखे इंसान के लिए रोटी कितनी ज़रूरी है जब भूख और रोटी में हो विलोमानुपात मैं किसी को नहीं बताऊॅंगा

Aatish Indori

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"बरहना कर लो" लिखा होता है बाग़ीचों में कि फूल तोड़ना मना है इस लिए लोग फूल नहीं तोड़ते फिर भी लोग फूल के क़रीब जाते हैं ताकि ख़ूबसूरती को और अच्छे से निहार सकें पर फूल को लिबास में ढक देंगे तो बहुत दिक़्क़त होगी वे जो फूल को नहीं तोड़ते वे भी फूल से कहेंगे कि लिबास को हटा लो जो अधीर होंगे वे लिबास को ख़ुद हटा देंगे मैं तुम्हारे मन की आवाज़ सुन रही हूँ पर अक्रिय हूँ अब तुम्हारा मन तुम से कह रहा है कि नंगा कर लो

Aatish Indori

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केमिलिओन उस का भी प्यार कहीं गिर गया था और मेरा भी जैसे ओस की बूंद पत्ते से उड़ गई हो चुप-चाप हम मिले तो पुराना कुछ लौट आया था बिना कहे दोनों ने काफ़्का पढ़ रखा था इस लिए समझ पाए कि प्यार लौट सकता है थोड़ा बदल कर

Aatish Indori

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“सफ़ाई-कर्मी” अँधेरा चीर कर देखो उजाला ला रहा है मुहल्ले में हमारे इक फ़रिश्ता आ रहा है हमारे आने से पहले सदा वो आ रहा है हमारे वास्ते महका के आलम जा रहा है रोज़ निभाता है जो रिश्ते को हम ने देखा है उस फ़रिश्ते को मेरे भाई सलाम तुझ को मेरे भाई प्रणाम तुझ को

Aatish Indori

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