हादसे ज़िंदगी की अलामत हैं लेकिन वो इक हादसा हम जिसे मौत कहते हैं कब और कैसे कहाँ रू-नुमा हो कोई जानता है बिला-रैब कोई नहीं जानता मैं ख़ुद सोचता हूँ मुझे एक मुद्दत से क्या हो गया है मेरे फैले हुए जागते ज़िंदा हाथों की सब उँगलियाँ सो चुकी हैं मेरे लर्ज़ां लबों पर जमी पपड़ियाँ बर्क़ से राख होते हुए अब्र पर रो चुकी हैं इल्म ओ इरफ़ान की राह में जैसे मेरी दुआएँ असर खो चुकी हैं मैं क्या जानता हूँ फ़ना के तसलसुल में कोई गिरह डालने के लिए हर्फ़-ए-कुन की ज़रूरत है जो माँगने पर भी कोई न देगा कि अब वो ज़मानों से बहते हुए ख़ून का ख़ूँ-बहा तो नहीं है वो जिस के तसर्रुफ़ में सब कुछ है हुस्न-ए-तलब की मुझे दाद दे कर अगर ये कहे ख़ूब हो तुम मगर जानते हो कि तुम कौन हो तुम रह-ए-रफ़्तगाँ की मसाफ़त का इक और आग़ाज़ हो इंतिहा तो नहीं हो अदम और मौजूद के दरमियाँ इक कड़ी हो ख़ुदा तो नहीं हो तो मैं क्या कहूँगा मैं ख़ुद सोचता हूँ
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वे डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ? वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और ग़रीब लोग उन सेे डरना बंद कर देंगे
Gorakh Pandey
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"ख़ुदा नाराज़" कमाल है कमाल है मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है बेहाल है बेहाल है सब मकड़ियों के जाल है दुनिया में रहना भी अब बहुत बड़ा जंजाल है बवाल है बवाल है गुज़र रही जो ज़िंदगी ये दिन है या कोई साल है मुझे आज की फ़िक्र तो है मुझे कल का भी ख़याल है नक़ाब है नक़ाब है हर चेहरे पर नक़ाब है जो शख़्स की ये ज़ात है वो साँप का भी बाप है जो दो-रुख़ा किरदार है ग़ज़ब है बे-मिसाल है दलाल है दलाल है सब सोच के दलाल है गुनाह भी उस का माफ़ है सब पैसे की ये चाल है क्या काल है क्या काल है ख़ुदा भी जो नाराज़ है 'इबादतों में मिल रहे जल्दबाज़ी के आ'माल है ख़ुद सोचना अब तो तू ज़रा मज़हब की बात पर क्यूँँ उठ रहे सवाल है कमाल है कमाल है
ZafarAli Memon
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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ
Varun Anand
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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है
Tehzeeb Hafi
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नज़्म - बेबसी तेरे साथ गुज़रे दिनों की कोई एक धुँदली सी तस्वीर जब भी कभी सामने आएगी तो हमें एक दुआ थामने आएगी, बुढ़ापे की गहराइयों में उतरते हुए तेरी बे-लौस बाँहों के घेरे नहीं भूल पाएँगे हम हम को तेरे तवस्सुत से हँसते हुए जो मिले थे वो चेहरे नहीं भूल पाएँगे हम तेरे पहलू में लेटे हुओं का अजब क़र्ब है जो रात भर अपनी वीरान आँखों से तुझे तकते थे और तेरे शादाब शानों पे सिर रख के मरने की ख़्वाहिश में जीते रहे पर तेरे लम्स का कोई इशारा मुयस्सर नहीं था मगर इस जहाँ का कोई एक हिस्सा उन्हें तेरे बिस्तर से बेहतर नहीं था पर मोहब्बत को इस सब से कोई इलाका नहीं था एक दुख तो हम बहरहाल हम अपने सीनों में ले के मरेंगे कि हम ने मोहब्बत के दावे किए तेरे माथे पर सिंदूर टाँका नहीं इस सेे क्या फ़र्क पड़ता है दूर हैं तुझ सेे या पास हैं हम को कोई आदमी तो नहीं, हम तो एहसास हैं जो रहे तो हमेशा रहेंगे और गए तो मुड़ कर वापिस नहीं आएँगे
Tehzeeb Hafi
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रंगों और ख़ुशबुओं की तख़्लीक़ से पहले मरने वाले लम्हे की नम आँखों से आइंदा के ख़्वाबों की उर्यानी का दुख झाँक रहा था ख़त-ए-शुऊर से आज अगर हम उस लम्हे की सम्त कभी देखें तो रूह में जागती गीली मिट्टी की आवाज़ सुनाई देती है ये दुनिया तो मिटे हुए उस दाएरे की सूरत का अक्स है जिस में सोचों आँखों और हर्फ़ों के लाखों दाएरे लर्ज़ां हैं चारों जानिब ख़ुशबुओं के आँगन में जलते हुए रंगों की लहरें हवा की डोर से बंधी हुई ऐसी कठ-पुतलियाँ हैं जो अपने जनम की साअत से इस पल तक चुप की लय पर नाच रही हैं जाने कब से उर्यां ख़्वाबों का पैराहन पहने आते जाते लम्हों पर चिल्लाती हैं देखो ग़ौर से देखो ये उर्यानी मख़्फ़ी और ज़ाहिर में ज़िंदा राब्ते की ख़ातिर अपनी अस्ल की जानिब झुकते इंसानों के वस्ल-तलब-जज़्बों की तरह सवाली हैं बाक़ी दाएरे ख़ाली हैं
Jameel ur Rahman
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ख़ौफ़ अभी जुड़ा न था सिलसिला-ए-कलाम से हर्फ़ अभी बुझे न थे दहशत-ए-कम-ख़िराम से संग-ए-मलाल के लिए दिल आस्ताँ हुआ न था इक़्लीम-ए-ख़्वाब में कहीं कोई ज़ियाँ हुआ न था निकहत-ए-अब्र-ओ-बाद की मस्ती में डोलते थे घर साफ़ दिखाई देते थे उस की गली के सब शजर गर्द मिसाल-ए-दस्तकें दर पे अभी जमी न थीं रंग-ए-फ़िराक़-ओ-वस्ल की परतें अभी खुली न थीं ऐसे में थी किसे ख़बर जब साअत-ए-माहताब हो यूँँ भी तो है कि और ही नक़्शा-ए-ख़ाक-ओ-आब हो
Jameel ur Rahman
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परिंदों से सबक़ सीखा शजर से गुफ़्तुगू की है सवाद-ए-जाँ की ख़ामोशी में ठहरे अब्र-ए-तन्हाई की ऊदी ज़र्द चादर पर शुआ-ए-याद के हाथों लिखी हर बे-नवा लम्हे की पूरी दास्ताँ मैं ने पढ़ी है नशात-अंगेज़ रातों और ख़्वाबों के शफ़क़-आलूद चेहरे को झुलसते दिन की ख़ीरा-कुन फ़ज़ा में एक उम्र-ए-राएगाँ के आइने में महव हो कर कब नहीं देखा बरस गुज़रे रुतें बीती वतन से बे-वतन होने की सारी बेबसी झेली मैं बर्फ़ानी इलाक़ों मर्ग़-ज़ारों वादियों और रेगज़ारों से निशान-ए-कारवाँ चुनता सदा-ए-रफ़्तगाँ सुनता हुआ गुज़रा कहाँ मुमकिन था लेकिन मैं ने जो देखा सुना वो याद रक्खा अजब ये है नहीं गर हाफ़िज़े में कुछ तो वो इक नाम है तेरा ख़बर कब थी कि बहती उम्र की सरकश रवानी में मुझे जो याद रहना चाहिए था मैं वही इक नाम भूलूँगा परिंदों और पेड़ों से जहाँ भी गुफ़्तुगू होगी तुम्हारा ज़िक्र आते ही धुँदलके ज़ेहन में इक मौजा-ए-तारीक बन कर फैलते जाएँगे और ये हाफ़िज़ा मफ़्लूज आँखों से मुझे घूरेगा चिल्लाएगा ख़ौफ़-ए-ख़ुद-फ़रामोशी से तुम डरते थे लेकिन अब मआल-ए-ख़ुद-फ़रामोशी से तुम कैसे निभाओगे ग़ुबार अंदर ग़ुबार अंगड़ाइयाँ लेते हुए रस्ते में जो कुछ खो चुके हो उस को कैसे ढूँड पाओगे ये लाज़िम तो नहीं है, एक अन-बूझी पहेली जब अचानक याद आ जाए उसे हर हाल में हर बार बूझोगे तुम अपने आप से कब तक किसी का नाम पूछोगे
Jameel ur Rahman
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दोज़ख़ी साअ'तों के सभी ख़्वाब आसेब बन कर मिरे दिल से लिपटे हुए हैं मिरी रूह अनजाने हाथों में जकड़ी हुई है मुझे, मुझ से ले लो कि ये ज़िंदगी उन अज़ाबों की मीरास है लम्हा लम्हा जो मेरा लहू पी रहे हैं ज़मानों से मैं मर चुका हूँ मगर अन-गिनत वहशी इफ़रीत मेरे लहू की तवानाई पर आज भी पल रहे हैं
Jameel ur Rahman
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नुज़ूल-ए-कश्फ़ की रह में सफ़ेद दरवाज़े क़दम-बुरीदा-मुसाफ़िर से पूछते ही रहे तिरे सफ़र में तो उजले दिनों की बारिश थी तिरी निगाहों में ख़ुफ़्ता धनक ने करवट ली बला की नींद में भी हाथ जागते थे तिरे तमाम पहलू मसाफ़त के सामने थे तिरे तिरी गवाही पे तो फूल फलने लगते थे तिरे ही साथ वो मंज़र भी चलने लगते थे ठहर गए थे जो बाम-ए-ज़वाल पर इक दिन हँसे थे खुल के जो अहद-ए-कमाल पर इक दिन तिरे जुनूँ पे क़यामत गुज़र गई कैसे रियाज़तों की वो रुत बे-समर गई कैसे
Jameel ur Rahman
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