nazmKuch Alfaaz

नुज़ूल-ए-कश्फ़ की रह में सफ़ेद दरवाज़े क़दम-बुरीदा-मुसाफ़िर से पूछते ही रहे तिरे सफ़र में तो उजले दिनों की बारिश थी तिरी निगाहों में ख़ुफ़्ता धनक ने करवट ली बला की नींद में भी हाथ जागते थे तिरे तमाम पहलू मसाफ़त के सामने थे तिरे तिरी गवाही पे तो फूल फलने लगते थे तिरे ही साथ वो मंज़र भी चलने लगते थे ठहर गए थे जो बाम-ए-ज़वाल पर इक दिन हँसे थे खुल के जो अहद-ए-कमाल पर इक दिन तिरे जुनूँ पे क़यामत गुज़र गई कैसे रियाज़तों की वो रुत बे-समर गई कैसे

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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"महबूबा के नाम" तू अपनी चिट्ठियों में मीर के अश'आर लिखती है मोहब्बत के बिना है ज़िंदगी बेकार लिखती है तेरे ख़त तो इबारत हैं वफ़ादारी की क़समों से जिन्हें मैं पढ़ते डरता हूँ वही हर बार लिखती है तू पैरोकार लैला की है शीरीं की पुजारन है मगर तू जिस पे बैठी है वो सोने का सिंहासन है तेरी पलकों के मस्कारे तेरे होंठों की ये लाली ये तेरे रेशमी कपड़े ये तेरे कान की बाली गले का ये चमकता हार हाथों के तेरे कंगन ये सब के सब है मेरे दिल मेरे एहसास के दुश्मन कि इन के सामने कुछ भी नहीं है प्यार की क़ीमत वफ़ा का मोल क्या क्या है ऐतिबार की क़ीमत शिकस्ता कश्तियों टूटी हुई पतवार की क़ीमत है मेरी जीत से बढ़कर तो तेरी हार की क़ीमत हक़ीक़त ख़ून के आँसू तुझे रुलवाएगी जानाँ तू अपने फ़ैसले पर बा'द में पछताएगी जानाँ मेरे काँधे पे छोटे भाइयों की ज़िम्मेदारी है मेरे माँ बाप बूढ़े है बहन भी तो कुँवारी है बरहना मौसमों के वार को तू सह न पाएगी हवेली छोड़ कर तू झोपड़ी में रह न पाएगी अमीरी तेरी मेरी मुफ़्लिसी को छल नहीं सकती तू नंगे पाँव तो कालीन पर चल नहीं सकती

Abrar Kashif

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ख़ौफ़ अभी जुड़ा न था सिलसिला-ए-कलाम से हर्फ़ अभी बुझे न थे दहशत-ए-कम-ख़िराम से संग-ए-मलाल के लिए दिल आस्ताँ हुआ न था इक़्लीम-ए-ख़्वाब में कहीं कोई ज़ियाँ हुआ न था निकहत-ए-अब्र-ओ-बाद की मस्ती में डोलते थे घर साफ़ दिखाई देते थे उस की गली के सब शजर गर्द मिसाल-ए-दस्तकें दर पे अभी जमी न थीं रंग-ए-फ़िराक़-ओ-वस्ल की परतें अभी खुली न थीं ऐसे में थी किसे ख़बर जब साअत-ए-माहताब हो यूँँ भी तो है कि और ही नक़्शा-ए-ख़ाक-ओ-आब हो

Jameel ur Rahman

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परिंदों से सबक़ सीखा शजर से गुफ़्तुगू की है सवाद-ए-जाँ की ख़ामोशी में ठहरे अब्र-ए-तन्हाई की ऊदी ज़र्द चादर पर शुआ-ए-याद के हाथों लिखी हर बे-नवा लम्हे की पूरी दास्ताँ मैं ने पढ़ी है नशात-अंगेज़ रातों और ख़्वाबों के शफ़क़-आलूद चेहरे को झुलसते दिन की ख़ीरा-कुन फ़ज़ा में एक उम्र-ए-राएगाँ के आइने में महव हो कर कब नहीं देखा बरस गुज़रे रुतें बीती वतन से बे-वतन होने की सारी बेबसी झेली मैं बर्फ़ानी इलाक़ों मर्ग़-ज़ारों वादियों और रेगज़ारों से निशान-ए-कारवाँ चुनता सदा-ए-रफ़्तगाँ सुनता हुआ गुज़रा कहाँ मुमकिन था लेकिन मैं ने जो देखा सुना वो याद रक्खा अजब ये है नहीं गर हाफ़िज़े में कुछ तो वो इक नाम है तेरा ख़बर कब थी कि बहती उम्र की सरकश रवानी में मुझे जो याद रहना चाहिए था मैं वही इक नाम भूलूँगा परिंदों और पेड़ों से जहाँ भी गुफ़्तुगू होगी तुम्हारा ज़िक्र आते ही धुँदलके ज़ेहन में इक मौजा-ए-तारीक बन कर फैलते जाएँगे और ये हाफ़िज़ा मफ़्लूज आँखों से मुझे घूरेगा चिल्लाएगा ख़ौफ़-ए-ख़ुद-फ़रामोशी से तुम डरते थे लेकिन अब मआल-ए-ख़ुद-फ़रामोशी से तुम कैसे निभाओगे ग़ुबार अंदर ग़ुबार अंगड़ाइयाँ लेते हुए रस्ते में जो कुछ खो चुके हो उस को कैसे ढूँड पाओगे ये लाज़िम तो नहीं है, एक अन-बूझी पहेली जब अचानक याद आ जाए उसे हर हाल में हर बार बूझोगे तुम अपने आप से कब तक किसी का नाम पूछोगे

Jameel ur Rahman

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रंगों और ख़ुशबुओं की तख़्लीक़ से पहले मरने वाले लम्हे की नम आँखों से आइंदा के ख़्वाबों की उर्यानी का दुख झाँक रहा था ख़त-ए-शुऊर से आज अगर हम उस लम्हे की सम्त कभी देखें तो रूह में जागती गीली मिट्टी की आवाज़ सुनाई देती है ये दुनिया तो मिटे हुए उस दाएरे की सूरत का अक्स है जिस में सोचों आँखों और हर्फ़ों के लाखों दाएरे लर्ज़ां हैं चारों जानिब ख़ुशबुओं के आँगन में जलते हुए रंगों की लहरें हवा की डोर से बंधी हुई ऐसी कठ-पुतलियाँ हैं जो अपने जनम की साअत से इस पल तक चुप की लय पर नाच रही हैं जाने कब से उर्यां ख़्वाबों का पैराहन पहने आते जाते लम्हों पर चिल्लाती हैं देखो ग़ौर से देखो ये उर्यानी मख़्फ़ी और ज़ाहिर में ज़िंदा राब्ते की ख़ातिर अपनी अस्ल की जानिब झुकते इंसानों के वस्ल-तलब-जज़्बों की तरह सवाली हैं बाक़ी दाएरे ख़ाली हैं

Jameel ur Rahman

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हादसे ज़िंदगी की अलामत हैं लेकिन वो इक हादसा हम जिसे मौत कहते हैं कब और कैसे कहाँ रू-नुमा हो कोई जानता है बिला-रैब कोई नहीं जानता मैं ख़ुद सोचता हूँ मुझे एक मुद्दत से क्या हो गया है मेरे फैले हुए जागते ज़िंदा हाथों की सब उँगलियाँ सो चुकी हैं मेरे लर्ज़ां लबों पर जमी पपड़ियाँ बर्क़ से राख होते हुए अब्र पर रो चुकी हैं इल्म ओ इरफ़ान की राह में जैसे मेरी दुआएँ असर खो चुकी हैं मैं क्या जानता हूँ फ़ना के तसलसुल में कोई गिरह डालने के लिए हर्फ़-ए-कुन की ज़रूरत है जो माँगने पर भी कोई न देगा कि अब वो ज़मानों से बहते हुए ख़ून का ख़ूँ-बहा तो नहीं है वो जिस के तसर्रुफ़ में सब कुछ है हुस्न-ए-तलब की मुझे दाद दे कर अगर ये कहे ख़ूब हो तुम मगर जानते हो कि तुम कौन हो तुम रह-ए-रफ़्तगाँ की मसाफ़त का इक और आग़ाज़ हो इंतिहा तो नहीं हो अदम और मौजूद के दरमियाँ इक कड़ी हो ख़ुदा तो नहीं हो तो मैं क्या कहूँगा मैं ख़ुद सोचता हूँ

Jameel ur Rahman

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दोज़ख़ी साअ'तों के सभी ख़्वाब आसेब बन कर मिरे दिल से लिपटे हुए हैं मिरी रूह अनजाने हाथों में जकड़ी हुई है मुझे, मुझ से ले लो कि ये ज़िंदगी उन अज़ाबों की मीरास है लम्हा लम्हा जो मेरा लहू पी रहे हैं ज़मानों से मैं मर चुका हूँ मगर अन-गिनत वहशी इफ़रीत मेरे लहू की तवानाई पर आज भी पल रहे हैं

Jameel ur Rahman

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