nazmKuch Alfaaz

रंगों और ख़ुशबुओं की तख़्लीक़ से पहले मरने वाले लम्हे की नम आँखों से आइंदा के ख़्वाबों की उर्यानी का दुख झाँक रहा था ख़त-ए-शुऊर से आज अगर हम उस लम्हे की सम्त कभी देखें तो रूह में जागती गीली मिट्टी की आवाज़ सुनाई देती है ये दुनिया तो मिटे हुए उस दाएरे की सूरत का अक्स है जिस में सोचों आँखों और हर्फ़ों के लाखों दाएरे लर्ज़ां हैं चारों जानिब ख़ुशबुओं के आँगन में जलते हुए रंगों की लहरें हवा की डोर से बंधी हुई ऐसी कठ-पुतलियाँ हैं जो अपने जनम की साअत से इस पल तक चुप की लय पर नाच रही हैं जाने कब से उर्यां ख़्वाबों का पैराहन पहने आते जाते लम्हों पर चिल्लाती हैं देखो ग़ौर से देखो ये उर्यानी मख़्फ़ी और ज़ाहिर में ज़िंदा राब्ते की ख़ातिर अपनी अस्ल की जानिब झुकते इंसानों के वस्ल-तलब-जज़्बों की तरह सवाली हैं बाक़ी दाएरे ख़ाली हैं

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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रात रात बड़ी ख़राब है हर रात ख़राब कर देती है रात भर जाग कर हर सुब्ह, सुब्ह को दे देती है कुछ ऊंघते हुए ख़्वाब कुछ गुज़री रातों के क़िस्से कुछ बुझी हुए यादों की ख़ाक और सिरहाने पर माज़ी के खारे धब्बे रात बड़ी ख़राब है दिन भर के मुरझाए ज़ख़्मों को फिर हरा कर देती है और महकने देती है रात भर किसी रात रानी की तरह मौका देती है कि सम्भल जाऊँ मैं और फिर ले जाती है अपने साथ पहले से ज़्यादा फिसलन वाली जगह पर रात.. बड़ी ख़राब है पर, एक रात ही तो है जो साथ होती है रात भर ख़ामोशी से सुनती है मेरी हर ख़ामोशी को समझती है मेरी हर बात को मेरी हर रात को रात

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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"कब तक ख़ैर मनाते हम" उल्फ़त के कूचों से साबित कैसे बचकर आते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम बड़ी बड़ी बातें कर दी थीं उन पर जान लुटाएंगे हुक़्म करें वो, आसमान से तारे भी ले आएँगे पर क़िस्मत और क़ुदरत इक थाली के चट्टे बट्टे थे कोशिश अपनी पूरी रहती पर अंगूर तो खट्टे थे बिगड़ा स्वाद जो उन के मुँह का उन को चटनी खानी थी बेचारा दिल, बेवकूफ़ था कुछ अपनी नादानी थी अदने से दिल की ख़ातिर क्या मूसल से डर जाते हम? हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम हम ने पूरी जुगत लगाई मगर सफलता ना मिल पाई फिर हम ने उम्मीद छोड़ दी ख़ुदस छेड़ी एक लड़ाई अब बातों में ना आएँगे उन जैसे ही बन जाएँगे उन की जानिब ना देखेंगे नाम 'नयनसुख' कह लाएँगे लेकिन हम थे सावन वाले और ऊपर से दिल के छाले छोड़ रेवड़ी उन की ख़ातिर हम ने रूखी सूखी खाई ऊँट सो गया उलटी करवट जमके ली उस ने जम्हाई पड़ते ओलों में अब देखो अपना सर मुंडवाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम इधर प्रिये मधु है, और हम हैं तुम उस पार नज़र आते हो कैसे बीन बजाएँ हिय की तुम तो ऐसे पगुराते हो कान पे जूँ रेंगाने ख़ातिर हम प्रयत्न करते रहते हैं तिस पर तुम क्रोधित होते हो हम तुम सेे डरते रहते हैं ख़ैर, हुआ सो बिसरा देते तुम थोड़ा सा इतरा लेते हम थोड़ी मनुहार लगाकर कोप तुम्हारा छितरा देते किन्तु अतिप्रिय तुम्हें क्रोध था और ना इस का कोई बोध था हम सेे तुम कटते जाते थे यथा दुग्ध, फटते जाते थे इतने फटे हुए में कैसे अपनी टांग अड़ाते हम हम ठहरे बकरे की अम्मा, कब तक ख़ैर मनाते हम

Saurabh Mehta 'Alfaaz'

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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परिंदों से सबक़ सीखा शजर से गुफ़्तुगू की है सवाद-ए-जाँ की ख़ामोशी में ठहरे अब्र-ए-तन्हाई की ऊदी ज़र्द चादर पर शुआ-ए-याद के हाथों लिखी हर बे-नवा लम्हे की पूरी दास्ताँ मैं ने पढ़ी है नशात-अंगेज़ रातों और ख़्वाबों के शफ़क़-आलूद चेहरे को झुलसते दिन की ख़ीरा-कुन फ़ज़ा में एक उम्र-ए-राएगाँ के आइने में महव हो कर कब नहीं देखा बरस गुज़रे रुतें बीती वतन से बे-वतन होने की सारी बेबसी झेली मैं बर्फ़ानी इलाक़ों मर्ग़-ज़ारों वादियों और रेगज़ारों से निशान-ए-कारवाँ चुनता सदा-ए-रफ़्तगाँ सुनता हुआ गुज़रा कहाँ मुमकिन था लेकिन मैं ने जो देखा सुना वो याद रक्खा अजब ये है नहीं गर हाफ़िज़े में कुछ तो वो इक नाम है तेरा ख़बर कब थी कि बहती उम्र की सरकश रवानी में मुझे जो याद रहना चाहिए था मैं वही इक नाम भूलूँगा परिंदों और पेड़ों से जहाँ भी गुफ़्तुगू होगी तुम्हारा ज़िक्र आते ही धुँदलके ज़ेहन में इक मौजा-ए-तारीक बन कर फैलते जाएँगे और ये हाफ़िज़ा मफ़्लूज आँखों से मुझे घूरेगा चिल्लाएगा ख़ौफ़-ए-ख़ुद-फ़रामोशी से तुम डरते थे लेकिन अब मआल-ए-ख़ुद-फ़रामोशी से तुम कैसे निभाओगे ग़ुबार अंदर ग़ुबार अंगड़ाइयाँ लेते हुए रस्ते में जो कुछ खो चुके हो उस को कैसे ढूँड पाओगे ये लाज़िम तो नहीं है, एक अन-बूझी पहेली जब अचानक याद आ जाए उसे हर हाल में हर बार बूझोगे तुम अपने आप से कब तक किसी का नाम पूछोगे

Jameel ur Rahman

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ख़ौफ़ अभी जुड़ा न था सिलसिला-ए-कलाम से हर्फ़ अभी बुझे न थे दहशत-ए-कम-ख़िराम से संग-ए-मलाल के लिए दिल आस्ताँ हुआ न था इक़्लीम-ए-ख़्वाब में कहीं कोई ज़ियाँ हुआ न था निकहत-ए-अब्र-ओ-बाद की मस्ती में डोलते थे घर साफ़ दिखाई देते थे उस की गली के सब शजर गर्द मिसाल-ए-दस्तकें दर पे अभी जमी न थीं रंग-ए-फ़िराक़-ओ-वस्ल की परतें अभी खुली न थीं ऐसे में थी किसे ख़बर जब साअत-ए-माहताब हो यूँँ भी तो है कि और ही नक़्शा-ए-ख़ाक-ओ-आब हो

Jameel ur Rahman

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नुज़ूल-ए-कश्फ़ की रह में सफ़ेद दरवाज़े क़दम-बुरीदा-मुसाफ़िर से पूछते ही रहे तिरे सफ़र में तो उजले दिनों की बारिश थी तिरी निगाहों में ख़ुफ़्ता धनक ने करवट ली बला की नींद में भी हाथ जागते थे तिरे तमाम पहलू मसाफ़त के सामने थे तिरे तिरी गवाही पे तो फूल फलने लगते थे तिरे ही साथ वो मंज़र भी चलने लगते थे ठहर गए थे जो बाम-ए-ज़वाल पर इक दिन हँसे थे खुल के जो अहद-ए-कमाल पर इक दिन तिरे जुनूँ पे क़यामत गुज़र गई कैसे रियाज़तों की वो रुत बे-समर गई कैसे

Jameel ur Rahman

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हादसे ज़िंदगी की अलामत हैं लेकिन वो इक हादसा हम जिसे मौत कहते हैं कब और कैसे कहाँ रू-नुमा हो कोई जानता है बिला-रैब कोई नहीं जानता मैं ख़ुद सोचता हूँ मुझे एक मुद्दत से क्या हो गया है मेरे फैले हुए जागते ज़िंदा हाथों की सब उँगलियाँ सो चुकी हैं मेरे लर्ज़ां लबों पर जमी पपड़ियाँ बर्क़ से राख होते हुए अब्र पर रो चुकी हैं इल्म ओ इरफ़ान की राह में जैसे मेरी दुआएँ असर खो चुकी हैं मैं क्या जानता हूँ फ़ना के तसलसुल में कोई गिरह डालने के लिए हर्फ़-ए-कुन की ज़रूरत है जो माँगने पर भी कोई न देगा कि अब वो ज़मानों से बहते हुए ख़ून का ख़ूँ-बहा तो नहीं है वो जिस के तसर्रुफ़ में सब कुछ है हुस्न-ए-तलब की मुझे दाद दे कर अगर ये कहे ख़ूब हो तुम मगर जानते हो कि तुम कौन हो तुम रह-ए-रफ़्तगाँ की मसाफ़त का इक और आग़ाज़ हो इंतिहा तो नहीं हो अदम और मौजूद के दरमियाँ इक कड़ी हो ख़ुदा तो नहीं हो तो मैं क्या कहूँगा मैं ख़ुद सोचता हूँ

Jameel ur Rahman

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दोज़ख़ी साअ'तों के सभी ख़्वाब आसेब बन कर मिरे दिल से लिपटे हुए हैं मिरी रूह अनजाने हाथों में जकड़ी हुई है मुझे, मुझ से ले लो कि ये ज़िंदगी उन अज़ाबों की मीरास है लम्हा लम्हा जो मेरा लहू पी रहे हैं ज़मानों से मैं मर चुका हूँ मगर अन-गिनत वहशी इफ़रीत मेरे लहू की तवानाई पर आज भी पल रहे हैं

Jameel ur Rahman

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