nazmKuch Alfaaz

दोज़ख़ी साअ'तों के सभी ख़्वाब आसेब बन कर मिरे दिल से लिपटे हुए हैं मिरी रूह अनजाने हाथों में जकड़ी हुई है मुझे, मुझ से ले लो कि ये ज़िंदगी उन अज़ाबों की मीरास है लम्हा लम्हा जो मेरा लहू पी रहे हैं ज़मानों से मैं मर चुका हूँ मगर अन-गिनत वहशी इफ़रीत मेरे लहू की तवानाई पर आज भी पल रहे हैं

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता

Jaun Elia

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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो

Kaifi Azmi

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"मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं" मेरा रंग उड़ रहा है मेरे बाल झड़ रहे हैं मेरे पेच खुल चुके हैं मेरे ख़म बिगड़ रहे हैं कहीं चुपके चुपके चुपके मेरी बात चल रही है कहीं कुछ अज़ीज़ मेरे, मेरे पावँ पड़ रहे हैं मेरा काम कर चुका है, मेरा ख़्वाब मर चुका है मेरी ख़ुश्क ख़ुश्क आँखों में सराब गड़ रहे हैं मेरी पसलियाँ चटक कर मेरे मुँह को आ गई हैं ग़म-ए-तिश्नगी के मारे मेरे दाँत झड़ रहे हैं मेरी आस्तीं फटी है मुझे चोट लग रही है मेरी धज्जियाँ उड़ी हैं, मेरे तार उधड़ रहे हैं मेरे ख़ून की सफ़ेदी तुम्हें क्या बता रही है ये मुझे जता रही है, मेरे ज़ख़्म सड़ रहे हैें मेरे सर पे चढ़ के अब तक वही ख़ौफ़ नाचता है कि तू कब का जा चुका है कि तू कब का जा चुका है

Ammar Iqbal

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रंगों और ख़ुशबुओं की तख़्लीक़ से पहले मरने वाले लम्हे की नम आँखों से आइंदा के ख़्वाबों की उर्यानी का दुख झाँक रहा था ख़त-ए-शुऊर से आज अगर हम उस लम्हे की सम्त कभी देखें तो रूह में जागती गीली मिट्टी की आवाज़ सुनाई देती है ये दुनिया तो मिटे हुए उस दाएरे की सूरत का अक्स है जिस में सोचों आँखों और हर्फ़ों के लाखों दाएरे लर्ज़ां हैं चारों जानिब ख़ुशबुओं के आँगन में जलते हुए रंगों की लहरें हवा की डोर से बंधी हुई ऐसी कठ-पुतलियाँ हैं जो अपने जनम की साअत से इस पल तक चुप की लय पर नाच रही हैं जाने कब से उर्यां ख़्वाबों का पैराहन पहने आते जाते लम्हों पर चिल्लाती हैं देखो ग़ौर से देखो ये उर्यानी मख़्फ़ी और ज़ाहिर में ज़िंदा राब्ते की ख़ातिर अपनी अस्ल की जानिब झुकते इंसानों के वस्ल-तलब-जज़्बों की तरह सवाली हैं बाक़ी दाएरे ख़ाली हैं

Jameel ur Rahman

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परिंदों से सबक़ सीखा शजर से गुफ़्तुगू की है सवाद-ए-जाँ की ख़ामोशी में ठहरे अब्र-ए-तन्हाई की ऊदी ज़र्द चादर पर शुआ-ए-याद के हाथों लिखी हर बे-नवा लम्हे की पूरी दास्ताँ मैं ने पढ़ी है नशात-अंगेज़ रातों और ख़्वाबों के शफ़क़-आलूद चेहरे को झुलसते दिन की ख़ीरा-कुन फ़ज़ा में एक उम्र-ए-राएगाँ के आइने में महव हो कर कब नहीं देखा बरस गुज़रे रुतें बीती वतन से बे-वतन होने की सारी बेबसी झेली मैं बर्फ़ानी इलाक़ों मर्ग़-ज़ारों वादियों और रेगज़ारों से निशान-ए-कारवाँ चुनता सदा-ए-रफ़्तगाँ सुनता हुआ गुज़रा कहाँ मुमकिन था लेकिन मैं ने जो देखा सुना वो याद रक्खा अजब ये है नहीं गर हाफ़िज़े में कुछ तो वो इक नाम है तेरा ख़बर कब थी कि बहती उम्र की सरकश रवानी में मुझे जो याद रहना चाहिए था मैं वही इक नाम भूलूँगा परिंदों और पेड़ों से जहाँ भी गुफ़्तुगू होगी तुम्हारा ज़िक्र आते ही धुँदलके ज़ेहन में इक मौजा-ए-तारीक बन कर फैलते जाएँगे और ये हाफ़िज़ा मफ़्लूज आँखों से मुझे घूरेगा चिल्लाएगा ख़ौफ़-ए-ख़ुद-फ़रामोशी से तुम डरते थे लेकिन अब मआल-ए-ख़ुद-फ़रामोशी से तुम कैसे निभाओगे ग़ुबार अंदर ग़ुबार अंगड़ाइयाँ लेते हुए रस्ते में जो कुछ खो चुके हो उस को कैसे ढूँड पाओगे ये लाज़िम तो नहीं है, एक अन-बूझी पहेली जब अचानक याद आ जाए उसे हर हाल में हर बार बूझोगे तुम अपने आप से कब तक किसी का नाम पूछोगे

Jameel ur Rahman

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ख़ौफ़ अभी जुड़ा न था सिलसिला-ए-कलाम से हर्फ़ अभी बुझे न थे दहशत-ए-कम-ख़िराम से संग-ए-मलाल के लिए दिल आस्ताँ हुआ न था इक़्लीम-ए-ख़्वाब में कहीं कोई ज़ियाँ हुआ न था निकहत-ए-अब्र-ओ-बाद की मस्ती में डोलते थे घर साफ़ दिखाई देते थे उस की गली के सब शजर गर्द मिसाल-ए-दस्तकें दर पे अभी जमी न थीं रंग-ए-फ़िराक़-ओ-वस्ल की परतें अभी खुली न थीं ऐसे में थी किसे ख़बर जब साअत-ए-माहताब हो यूँँ भी तो है कि और ही नक़्शा-ए-ख़ाक-ओ-आब हो

Jameel ur Rahman

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नुज़ूल-ए-कश्फ़ की रह में सफ़ेद दरवाज़े क़दम-बुरीदा-मुसाफ़िर से पूछते ही रहे तिरे सफ़र में तो उजले दिनों की बारिश थी तिरी निगाहों में ख़ुफ़्ता धनक ने करवट ली बला की नींद में भी हाथ जागते थे तिरे तमाम पहलू मसाफ़त के सामने थे तिरे तिरी गवाही पे तो फूल फलने लगते थे तिरे ही साथ वो मंज़र भी चलने लगते थे ठहर गए थे जो बाम-ए-ज़वाल पर इक दिन हँसे थे खुल के जो अहद-ए-कमाल पर इक दिन तिरे जुनूँ पे क़यामत गुज़र गई कैसे रियाज़तों की वो रुत बे-समर गई कैसे

Jameel ur Rahman

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हादसे ज़िंदगी की अलामत हैं लेकिन वो इक हादसा हम जिसे मौत कहते हैं कब और कैसे कहाँ रू-नुमा हो कोई जानता है बिला-रैब कोई नहीं जानता मैं ख़ुद सोचता हूँ मुझे एक मुद्दत से क्या हो गया है मेरे फैले हुए जागते ज़िंदा हाथों की सब उँगलियाँ सो चुकी हैं मेरे लर्ज़ां लबों पर जमी पपड़ियाँ बर्क़ से राख होते हुए अब्र पर रो चुकी हैं इल्म ओ इरफ़ान की राह में जैसे मेरी दुआएँ असर खो चुकी हैं मैं क्या जानता हूँ फ़ना के तसलसुल में कोई गिरह डालने के लिए हर्फ़-ए-कुन की ज़रूरत है जो माँगने पर भी कोई न देगा कि अब वो ज़मानों से बहते हुए ख़ून का ख़ूँ-बहा तो नहीं है वो जिस के तसर्रुफ़ में सब कुछ है हुस्न-ए-तलब की मुझे दाद दे कर अगर ये कहे ख़ूब हो तुम मगर जानते हो कि तुम कौन हो तुम रह-ए-रफ़्तगाँ की मसाफ़त का इक और आग़ाज़ हो इंतिहा तो नहीं हो अदम और मौजूद के दरमियाँ इक कड़ी हो ख़ुदा तो नहीं हो तो मैं क्या कहूँगा मैं ख़ुद सोचता हूँ

Jameel ur Rahman

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