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चौथी बार बंगाल की गाती नदिया के किनारे वो मुझ पर मुन्कशिफ़ होई जहाँ सुनहरी मछलियाँ नीले सुरों को बिलोती थीं और रौशनी बाँटते पेड़ कलाम करते थे उस की सहर फूँकती आँख ने मुझे परिंदा बनने का हुक्म दिया मैं उस के शाने की हरी शाख़ पर बैठ कर अपना लहन ईजाद करने लगा उस के हरे बदन का साया सिवा नेज़े पे था मैं ने उस के बदन के साए से नर्म बिछौना तख़्लीक़ किया और दुनिया के चेहरे पर थूक दिया एक तवील नींद के बा'द मैं ने ब्रह्मा की तरह आँख खोली उस का घना साया मेरे वजूद पर सिमट रहा था उस के लज़ीज़ फलों में मेरे लिए कड़वाहट रेंगने लगी मैं ने अपना रेज़ा रेज़ा वजूद समेट कर गठड़ी में बाँधा क़ुतुब-नुमा को ख़लीज बंगाल के ख़त पर रख कर पाँव से ठोकर मारी और हवा पर पाँव रखता हुआ पाँचवें सम्त में आगे बढ़ गया मैं ने अपने दिल को यक़ीन दिलाया कि उस की सिसकियों का मुख़ातब मैं नहीं था

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हम घूम चुके बस्ती बन में इक आस की फाँस लिए मन में कोई साजन हो कोई प्यारा हो कोई दीपक हो, कोई तारा हो जब जीवन रात अँधेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो जब सावन बादल छाए हों जब फागुन फूल खिलाए हों जब चंदा रूप लुटाता हो जब सूरज धूप नहाता हो या शाम ने बस्ती घेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो हाँ दिल का दामन फैला है क्यूँँंगोरी का दिल मैला है हम कब तक पीत के धोके में तुम कब तक दूर झरोके में कब दीद से दिल को सेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो क्या झगड़ा सूद ख़सारे का ये काज नहीं बंजारे का सब सोना रूपा ले जाए सब दुनिया, दुनिया ले जाए तुम एक मुझे बहुतेरी हो इक बार कहो तुम मेरी हो

Ibn E Insha

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मर्द-ए-मोहब्बत उस की डिक्शनरी में मर्द का मतलब "ना-मर्द" लिखा हुआ है ख़ुश-क़िस्मत मर्द और औरतें एक दूसरे के दिल की पसंद होते हैं उस की बद-क़िस्मती की पोशाक पर सब से बड़ा दाग़ यही है के वो कुछ ना-मर्दों के निचले हिस्से को पसंद है! सिवाए एक मर्द के सिवाए एक शख़्स के उसे किसी मर्द के दिल ने नहीं चाहा जिस ने उसे उस लम्हें भी सिर्फ़ देखा जो लम्हा मर्द और ना-मर्द होने का फ़ैसला कर दिया करता है मर्द अपनी मोहब्बत के लिए बे-शुमार नज़्में लिख सकता है मगर एक बार भी अपनी मोहब्बत को गाली नहीं दे सकता भले उस की महबूबा जिस्म-फ़रोश ही क्यूँ ना हो मर्द के लिए देवी होती है अज़ीम लड़कियों और इज़्ज़त मंद मर्दों के दिल सलामत रहें जो धोके की तलवारों से काट दिए गए मगर अपनी मोहब्बत की बे-हुर्मती पर तैयार न हुआ एक मर्द का लहू-लुहान दिल जिसे बद-दुआ की पूरी इजाज़त है वो फिर भी दुआ में यही कहता है मौला उसे उस के नाम का साया नसीब कर वो समझ सके कि मोहब्बत और मर्द की "मीम" एक ही मिट्टी से बनी है मोहब्बत और मर्द के सात हुरूफ़ मिल कर "साथ" बनाते हैं लेकिन उसे ये रम्ज़ कोई मर्द ही बता सकता है उस की डिक्शनरी और ज़िन्दगी में कोई मर्द नहीं है

Ali Zaryoun

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"अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है" गुज़रती उम्र ढ़लती जा रही है ज़मीं पाँव निगलती जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है परी आगे निकलती जा रही है सितारे बारी-बारी बुझ रहे हैं हवा मोअत्तर होती जा रही है चमकती जा रही है कोई मछली समुंदर बर्फ़ करती जा रही है मैं अपनी नाव में बेकस पड़ा हूँ उफकती नब्ज़ डूबी जा रही है अँधेरा सर पे चढ़ता जा रहा है अँधेरा ही समुंदर का ख़ुदा है ख़ुदा मछली पकड़ना चाहता है

Ammar Iqbal

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लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं रूह मर जाते हैं तो ये जिस्म है चलती हुई लाश इस हक़ीक़त को न समझते हैं न पहचानते हैं कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें ये अमल हम में है बे-इल्म परिंदों में नहीं हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं हम सा वहशी कोई जंगल के दरिंदों में नहीं इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढांचे में लिए सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूं मैं न ज़िंदा हूँ कि मरने का सहारा ढूंढ़ूं और न मुर्दा हूँ कि जीने के ग़मों से छूटूं कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ ज़िंदगी क़हर के सांचों में ढलेगी कब तक कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में ये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों में औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़ता मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार किया जिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार किया जिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार किया संसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती है चकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती है मर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती है औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी है अवतार पयम्बर जनती है फिर भी शैतान की बेटी है ये वो बद-क़िस्मत मां है जो बेटों की सेज पे लेटी है औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

Sahir Ludhianvi

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'उदासी' इबारत जो उदासी ने लिखी है बदन उस का ग़ज़ल सा रेशमी है किसी की पास आती आहटों से उदासी और गहरी हो चली है उछल पड़ती हैं लहरें चाँद तक जब समुंदर की उदासी टूटती है उदासी के परिंदों तुम कहाँ हो मिरी तन्हाई तुम को ढूँढती है मिरे घर की घनी तारीकियों में उदासी बल्ब सी जलती रही है उदासी ओढ़े वो बूढ़ी हवेली न जाने किस का रस्ता देखती है उदासी सुब्ह का मासूम झरना उदासी शाम की बहती नदी है

Sandeep Thakur

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अशतार ऐ आसमानों की मलिका बादशाह तेरी दहलीज़ का दरबान है लगाश और और अर्ज में तेरे नाम का सिक्का ढलता है तेरी ज़ुल्फ़ें ज़फ़र-मंद लश्कर का फरेरा हैं और चेहरा सुब्ह के मशरिक़ का आसमान फ़ुरात का चमकता पानी तेरा आईना है कुँवारियाँ तेरे मुक़द्दस अहाते में अपनी इस्मत का सुनहरा सिक्का भेंट करने आती हैं तो मीनारा-ए-बाबुल की बुलंदी से बाँझ ज़मीन के नाम बार-आवरी का संदेसा लिखती है ऐ बहुत से नामों वाली तेरी हथेलियाँ तेरे तमव्वुज़ के हाथों की गर्मी से दहकती हैं जिस के सफ़ेद मा'बद के सुनहरी कलस मेरी आँखों को ख़ीरा करते हैं तेरे मातम-दारों के आज़ा-ए-तनासुल तेरी बारगाह का चढ़ावा हैं अज़दहा तेरे पाँव के तवाज़ुन पे मरता है सफ़ेद शे'र तेरे सुनहरे रथ के घोड़े हैं तेरे सर पर पर-दार बेल का साया है ऐ बार-आवरी की देवी तेरे क़दमों की आहट से मुर्दा ज़मीन नाफ़ तक धड़क उठती है

Jawaz Jafri

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मैं ने दजला-ओ-फ़ुरात के मशरिक़ में एक क़दीम और रौशन पेड़ के नीचे सज्दों का ख़िराज वसूल किया और फलदार दरख़्तों से ढके बाग़ में मुक़ीम हवा जिसे मेरे और उस औरत के लिए आरास्ता किया गया था जिस की जन्म-भूमि मेरी दाईं पस्ली थी मैं ने पहली बार उसे ज़िंदगी के पेड़ की सुनहरी शाख़ों के दरमियान रेंगते देखा वो पेड़ की हिफ़ाज़त पे मामूर था उस की कासनी आँखों में क़ाइल कर लेने वाली चमक थी मैं ने अपनी भूक इम्तिनाअ के फल पे तस्तीर की तो मेरी आँखें उस औरत के जिस्म के आर-पार देखने लगीं और बाग़ के सब्ज़ पेड़ मेरे सर से अपने साए की छतरियाँ समेटने लगे मैं ने ज़िंदगी के पेड़ से लिपटे अज़दहे को तीन बराबर हिस्सों में तक़्सीम किया एक हिस्से से अपने सर के लिए शिमला ईजाद किया दूसरे हिस्से को इज़ार-बंद बना कर कमर के गिर्द लपेटा जो बच रहा उसे अपनी साथी औरत के बालों में गूँधा और बाग़ की जानिब पीठ कर ली मेरी औरत ने मुझ से छुप कर उस की सियाह जल्द से अपनी नीली आँखों के लिए सुर्मा ईजाद किया और रात के पिछले पहर अपने दूध से उस की ज़ियाफ़त करने लगी मैं ने मुक़द्दस पहाड़ की सब से बुलंद चोटी उसे दान की और अपनी पेशानी ख़ाक पे रख दी

Jawaz Jafri

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छटी बार वो दजला-ओ-फ़ुरात के दरमियान मीनारा-ए-बाबुल के साए में मुझ पर मुन्कशिफ़ होई वो मुक़द्दस मीनार की सातवीं मंज़िल पर बैठी आयत-दर-आयत बिखरे सितारों की तिलावत पर मामूर थी वो अशतार के मा'बद के शुमाल में साए बाँटते बाग़ात-ए-मुअ'ल्लक़ा को बार-आवरी की दुआ देने आई थी उस का बे-नियाज़ जिस्म उन हाथों की ना-रसाई को पहचानता था जो उसे छूने की तमन्ना में ज़ेर-ए-क़बा जल रहे थे मैं ने दो लश्करों के दरमियान अपने दादा के रजज़ में कलाम किया जिस की मुट्ठी में क़बीले की आबरू थी मेरे अक़ब में हरे जिस्मों वाली औरतें आसमानी दफ़ की लय पर मौत का तराना गाने लगीं मेरा नजीबुत-तरफ़ैन घोड़ा जिस का शजरा मेरी उँगलियों की पोरों पर रक़म था और जिसे मैं अपनी औलाद से भी अज़ीज़ जानता था मैं ने उस की ज़ीन में बैठने से इनकार किया और हवा पर पाँव रखता हुआ दुश्मन के क़ल्ब-ए-लश्कर तक जा पहुँचा मुझे देख कर सूरमाओं की आँखें नाफ़ तक फैल गईं मैं ज़ेर-ए-लब अपना शजरा-ए-नसब दोहरा रहा था मैं ने अपने पाँव में भागते ख़ून को महमेज़ दी और अपनी ज़हर में बुझी तलवार मैदान-ए-जंग के दरमियान गाड़ दी जिस के मुरस्सा दस्ते पर ज़ैतून का अख़ुवा फूट पड़ा मैं अपनी गुज़िश्ता ज़िंदगी पर कफ़-ए-अफ़्सोस मलने लगा

Jawaz Jafri

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रात के आख़िरी पहर मैं ने मुक़द्दस फ़्लाई की सरहद पे पाँव रखा उस के सब्ज़ पैरहन की ख़ुश्बू मेरे इस्तिक़बाल के लिए मौजूद थी मेरे ख़ाक-आलूद घुटनों ने ज़मीन की खुशबू-दार नाफ़ को छुआ तो मैं ने अपना मल्बूस चाक कर डाला वो पेपर्स के जंगलों के शुमाली किनारे पे बैठी नील के पानियों को कात रही थी उस ने मेरे ख़ाक-आलूद चेहरे को नील का आईना दिखाया हम मुतबर्रिक तेल के नमकीन चराग़ हथेलियों पे रखे शहर-ए-पनाह की तरफ़ चल दिए जहाँ देवता बारयाबी के मुंतज़िर थे हमारे क़दमों की आहट पा कर मुक़द्दस फाटक के सुनहरे किवाड़ ज़मीन के आख़िरी किनारों तक खुल गए और शहर की इत्र-बेज़ गलियाँ हमारे तलवे चूमने लगीं हमारे सुरों पे फैले आसमान के सफ़ेद वरक़ पर परिंदों के लिए हर्फ़ इम्तिनाअ लिखा था हम ख़ुदावंद असर की ज़ियारत-गाह के नवाह में पहुँचे तो देवता अपना मरक़द छोड़ कर दहलीज़ से आ लगा उस ने अपने दिल के छेद नरसले की शाख़ पे कुंदा किए और अपने ख़ूब-सूरत लहन की सीढ़ी लगा कर दिलों में उतर गया सियाह मा'बद के सुनहरे कलस के साए में ज़ाएरीन का मातमी जुलूस दर-ओ-दीवार पे नौहे तसतीर कर रहा था मेरे पहलू में खड़ी सब्ज़-फ़ाम औरत ने मुझे देवताई मल्बूस हदिया किया तो मैं हातिफ़ की बारगाह की दहलीज़ से लग कर अपना क़सीदा भेंट करने लगा मुक़द्दस फ़्लाई की तारीक गलियाँ नमकीन चराग़ों से भर गईं मैं ने आख़िरी मिस्रा हातिफ़ को दान किया और सब्ज़ औरत की नीली आँखों में तहसीन की नक़दी तलाश करने लगा उस ने फ़स्लों पे करम करते हाथ से हवा में तराज़ू बनाया एक पलड़े में मेरा हर्फ़-ए-हुनर रखा और दूसरे में अपने जमाल की नक़दी उस के जमाल का सब्ज़ दरिया मेरे दामन में बहने लगा

Jawaz Jafri

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सातवीं बार असकंदरिया के नीले साहिल पर उस ने अपनी दीद का सुनहरा सिक्का मेरे कानों के कश्कोल में दान किया असकंदरिया जिसे एक बहादुर जंग-जू ने आबाद किया था जो हँसते बस्ते शहरों के नाम बर्बादी के संदेसे लिखता था उस का नसीब बूढे मल्लाह की बोसीदा कश्ती से बँधा हचकोले ले रहा था दुनिया का नसीब लिखने वाले उस के साँवले हाथों में शुमाली मिस्र के सरसब्ज़ बाग़ों के अव्वलीन फल थे जिसे वो बोटो शहर के सब से क़दीम दारुल-इस्तिख़ारा को भेंट करने आई थी

Jawaz Jafri

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