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रात के आख़िरी पहर मैं ने मुक़द्दस फ़्लाई की सरहद पे पाँव रखा उस के सब्ज़ पैरहन की ख़ुश्बू मेरे इस्तिक़बाल के लिए मौजूद थी मेरे ख़ाक-आलूद घुटनों ने ज़मीन की खुशबू-दार नाफ़ को छुआ तो मैं ने अपना मल्बूस चाक कर डाला वो पेपर्स के जंगलों के शुमाली किनारे पे बैठी नील के पानियों को कात रही थी उस ने मेरे ख़ाक-आलूद चेहरे को नील का आईना दिखाया हम मुतबर्रिक तेल के नमकीन चराग़ हथेलियों पे रखे शहर-ए-पनाह की तरफ़ चल दिए जहाँ देवता बारयाबी के मुंतज़िर थे हमारे क़दमों की आहट पा कर मुक़द्दस फाटक के सुनहरे किवाड़ ज़मीन के आख़िरी किनारों तक खुल गए और शहर की इत्र-बेज़ गलियाँ हमारे तलवे चूमने लगीं हमारे सुरों पे फैले आसमान के सफ़ेद वरक़ पर परिंदों के लिए हर्फ़ इम्तिनाअ लिखा था हम ख़ुदावंद असर की ज़ियारत-गाह के नवाह में पहुँचे तो देवता अपना मरक़द छोड़ कर दहलीज़ से आ लगा उस ने अपने दिल के छेद नरसले की शाख़ पे कुंदा किए और अपने ख़ूब-सूरत लहन की सीढ़ी लगा कर दिलों में उतर गया सियाह मा'बद के सुनहरे कलस के साए में ज़ाएरीन का मातमी जुलूस दर-ओ-दीवार पे नौहे तसतीर कर रहा था मेरे पहलू में खड़ी सब्ज़-फ़ाम औरत ने मुझे देवताई मल्बूस हदिया किया तो मैं हातिफ़ की बारगाह की दहलीज़ से लग कर अपना क़सीदा भेंट करने लगा मुक़द्दस फ़्लाई की तारीक गलियाँ नमकीन चराग़ों से भर गईं मैं ने आख़िरी मिस्रा हातिफ़ को दान किया और सब्ज़ औरत की नीली आँखों में तहसीन की नक़दी तलाश करने लगा उस ने फ़स्लों पे करम करते हाथ से हवा में तराज़ू बनाया एक पलड़े में मेरा हर्फ़-ए-हुनर रखा और दूसरे में अपने जमाल की नक़दी उस के जमाल का सब्ज़ दरिया मेरे दामन में बहने लगा

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई

Kaifi Azmi

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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अशतार ऐ आसमानों की मलिका बादशाह तेरी दहलीज़ का दरबान है लगाश और और अर्ज में तेरे नाम का सिक्का ढलता है तेरी ज़ुल्फ़ें ज़फ़र-मंद लश्कर का फरेरा हैं और चेहरा सुब्ह के मशरिक़ का आसमान फ़ुरात का चमकता पानी तेरा आईना है कुँवारियाँ तेरे मुक़द्दस अहाते में अपनी इस्मत का सुनहरा सिक्का भेंट करने आती हैं तो मीनारा-ए-बाबुल की बुलंदी से बाँझ ज़मीन के नाम बार-आवरी का संदेसा लिखती है ऐ बहुत से नामों वाली तेरी हथेलियाँ तेरे तमव्वुज़ के हाथों की गर्मी से दहकती हैं जिस के सफ़ेद मा'बद के सुनहरी कलस मेरी आँखों को ख़ीरा करते हैं तेरे मातम-दारों के आज़ा-ए-तनासुल तेरी बारगाह का चढ़ावा हैं अज़दहा तेरे पाँव के तवाज़ुन पे मरता है सफ़ेद शे'र तेरे सुनहरे रथ के घोड़े हैं तेरे सर पर पर-दार बेल का साया है ऐ बार-आवरी की देवी तेरे क़दमों की आहट से मुर्दा ज़मीन नाफ़ तक धड़क उठती है

Jawaz Jafri

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चौथी बार बंगाल की गाती नदिया के किनारे वो मुझ पर मुन्कशिफ़ होई जहाँ सुनहरी मछलियाँ नीले सुरों को बिलोती थीं और रौशनी बाँटते पेड़ कलाम करते थे उस की सहर फूँकती आँख ने मुझे परिंदा बनने का हुक्म दिया मैं उस के शाने की हरी शाख़ पर बैठ कर अपना लहन ईजाद करने लगा उस के हरे बदन का साया सिवा नेज़े पे था मैं ने उस के बदन के साए से नर्म बिछौना तख़्लीक़ किया और दुनिया के चेहरे पर थूक दिया एक तवील नींद के बा'द मैं ने ब्रह्मा की तरह आँख खोली उस का घना साया मेरे वजूद पर सिमट रहा था उस के लज़ीज़ फलों में मेरे लिए कड़वाहट रेंगने लगी मैं ने अपना रेज़ा रेज़ा वजूद समेट कर गठड़ी में बाँधा क़ुतुब-नुमा को ख़लीज बंगाल के ख़त पर रख कर पाँव से ठोकर मारी और हवा पर पाँव रखता हुआ पाँचवें सम्त में आगे बढ़ गया मैं ने अपने दिल को यक़ीन दिलाया कि उस की सिसकियों का मुख़ातब मैं नहीं था

Jawaz Jafri

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छटी बार वो दजला-ओ-फ़ुरात के दरमियान मीनारा-ए-बाबुल के साए में मुझ पर मुन्कशिफ़ होई वो मुक़द्दस मीनार की सातवीं मंज़िल पर बैठी आयत-दर-आयत बिखरे सितारों की तिलावत पर मामूर थी वो अशतार के मा'बद के शुमाल में साए बाँटते बाग़ात-ए-मुअ'ल्लक़ा को बार-आवरी की दुआ देने आई थी उस का बे-नियाज़ जिस्म उन हाथों की ना-रसाई को पहचानता था जो उसे छूने की तमन्ना में ज़ेर-ए-क़बा जल रहे थे मैं ने दो लश्करों के दरमियान अपने दादा के रजज़ में कलाम किया जिस की मुट्ठी में क़बीले की आबरू थी मेरे अक़ब में हरे जिस्मों वाली औरतें आसमानी दफ़ की लय पर मौत का तराना गाने लगीं मेरा नजीबुत-तरफ़ैन घोड़ा जिस का शजरा मेरी उँगलियों की पोरों पर रक़म था और जिसे मैं अपनी औलाद से भी अज़ीज़ जानता था मैं ने उस की ज़ीन में बैठने से इनकार किया और हवा पर पाँव रखता हुआ दुश्मन के क़ल्ब-ए-लश्कर तक जा पहुँचा मुझे देख कर सूरमाओं की आँखें नाफ़ तक फैल गईं मैं ज़ेर-ए-लब अपना शजरा-ए-नसब दोहरा रहा था मैं ने अपने पाँव में भागते ख़ून को महमेज़ दी और अपनी ज़हर में बुझी तलवार मैदान-ए-जंग के दरमियान गाड़ दी जिस के मुरस्सा दस्ते पर ज़ैतून का अख़ुवा फूट पड़ा मैं अपनी गुज़िश्ता ज़िंदगी पर कफ़-ए-अफ़्सोस मलने लगा

Jawaz Jafri

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मैं ने दजला-ओ-फ़ुरात के मशरिक़ में एक क़दीम और रौशन पेड़ के नीचे सज्दों का ख़िराज वसूल किया और फलदार दरख़्तों से ढके बाग़ में मुक़ीम हवा जिसे मेरे और उस औरत के लिए आरास्ता किया गया था जिस की जन्म-भूमि मेरी दाईं पस्ली थी मैं ने पहली बार उसे ज़िंदगी के पेड़ की सुनहरी शाख़ों के दरमियान रेंगते देखा वो पेड़ की हिफ़ाज़त पे मामूर था उस की कासनी आँखों में क़ाइल कर लेने वाली चमक थी मैं ने अपनी भूक इम्तिनाअ के फल पे तस्तीर की तो मेरी आँखें उस औरत के जिस्म के आर-पार देखने लगीं और बाग़ के सब्ज़ पेड़ मेरे सर से अपने साए की छतरियाँ समेटने लगे मैं ने ज़िंदगी के पेड़ से लिपटे अज़दहे को तीन बराबर हिस्सों में तक़्सीम किया एक हिस्से से अपने सर के लिए शिमला ईजाद किया दूसरे हिस्से को इज़ार-बंद बना कर कमर के गिर्द लपेटा जो बच रहा उसे अपनी साथी औरत के बालों में गूँधा और बाग़ की जानिब पीठ कर ली मेरी औरत ने मुझ से छुप कर उस की सियाह जल्द से अपनी नीली आँखों के लिए सुर्मा ईजाद किया और रात के पिछले पहर अपने दूध से उस की ज़ियाफ़त करने लगी मैं ने मुक़द्दस पहाड़ की सब से बुलंद चोटी उसे दान की और अपनी पेशानी ख़ाक पे रख दी

Jawaz Jafri

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ऐ तीन चेहरों में रौशन पेशानी वाले तेरा नक़्श पाएदार और क़दीम है तू ने सफ़ेद बैज़वी ज़िंदाँ से बाहर पाँव रखा तो ज़मीन तेरे इस्तिक़बाल के लिए मौजूद न थी तू ने नर्म लहजे में नापैद सम्तों को आवाज़ दी और अपने चारों और फैलने लगा तू ने कँवल की पत्तियों से बिछौना तख़्लीक़ किया और अपनी ज़िंदगी का अव्वलीन ख़्वाब देखने लगा एक अज़ीम दुनिया की तख़्लीक़ का ख़्वाब तू ने हवाओं को कात कर आसमानों की चादर बनाई और खौलते समुंदरों की गहराई से ज़मीन को बाहर निकाल लाया तू ने चुटकी-भर रौनक़ ज़मीन के चेहरे पे मिल दी तू ने मेरे लिए सुरमई रंग का घोड़ा तख़्लीक़ किया और अपने लिए सफ़ेद बतख़ ज़मीन सिमट कर मेरे तलवे से आ लगी तो समुंदरों की सियाहत पर रवाना हो गया ऐ अज़ीम बाप तेरे तीरथ के मुक़द्दस पानियों में ताज़ा जिस्मों के गुलाब महकते हैं तू ने अपने ढाक के सब्ज़ पत्तों से ज़मीन के लिए साया बनाया और तन्हाई का सिक्का समुंदर में बहा दिया तू ने अपने लिए सरस्वती तख़्लीक़ की और उस के पहलू से लिपट कर दुनिया की मिस्मारी का ख़्वाब देखने लगा

Jawaz Jafri

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