ऐ तीन चेहरों में रौशन पेशानी वाले तेरा नक़्श पाएदार और क़दीम है तू ने सफ़ेद बैज़वी ज़िंदाँ से बाहर पाँव रखा तो ज़मीन तेरे इस्तिक़बाल के लिए मौजूद न थी तू ने नर्म लहजे में नापैद सम्तों को आवाज़ दी और अपने चारों और फैलने लगा तू ने कँवल की पत्तियों से बिछौना तख़्लीक़ किया और अपनी ज़िंदगी का अव्वलीन ख़्वाब देखने लगा एक अज़ीम दुनिया की तख़्लीक़ का ख़्वाब तू ने हवाओं को कात कर आसमानों की चादर बनाई और खौलते समुंदरों की गहराई से ज़मीन को बाहर निकाल लाया तू ने चुटकी-भर रौनक़ ज़मीन के चेहरे पे मिल दी तू ने मेरे लिए सुरमई रंग का घोड़ा तख़्लीक़ किया और अपने लिए सफ़ेद बतख़ ज़मीन सिमट कर मेरे तलवे से आ लगी तो समुंदरों की सियाहत पर रवाना हो गया ऐ अज़ीम बाप तेरे तीरथ के मुक़द्दस पानियों में ताज़ा जिस्मों के गुलाब महकते हैं तू ने अपने ढाक के सब्ज़ पत्तों से ज़मीन के लिए साया बनाया और तन्हाई का सिक्का समुंदर में बहा दिया तू ने अपने लिए सरस्वती तख़्लीक़ की और उस के पहलू से लिपट कर दुनिया की मिस्मारी का ख़्वाब देखने लगा
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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है
Tehzeeb Hafi
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मैं ने दजला-ओ-फ़ुरात के मशरिक़ में एक क़दीम और रौशन पेड़ के नीचे सज्दों का ख़िराज वसूल किया और फलदार दरख़्तों से ढके बाग़ में मुक़ीम हवा जिसे मेरे और उस औरत के लिए आरास्ता किया गया था जिस की जन्म-भूमि मेरी दाईं पस्ली थी मैं ने पहली बार उसे ज़िंदगी के पेड़ की सुनहरी शाख़ों के दरमियान रेंगते देखा वो पेड़ की हिफ़ाज़त पे मामूर था उस की कासनी आँखों में क़ाइल कर लेने वाली चमक थी मैं ने अपनी भूक इम्तिनाअ के फल पे तस्तीर की तो मेरी आँखें उस औरत के जिस्म के आर-पार देखने लगीं और बाग़ के सब्ज़ पेड़ मेरे सर से अपने साए की छतरियाँ समेटने लगे मैं ने ज़िंदगी के पेड़ से लिपटे अज़दहे को तीन बराबर हिस्सों में तक़्सीम किया एक हिस्से से अपने सर के लिए शिमला ईजाद किया दूसरे हिस्से को इज़ार-बंद बना कर कमर के गिर्द लपेटा जो बच रहा उसे अपनी साथी औरत के बालों में गूँधा और बाग़ की जानिब पीठ कर ली मेरी औरत ने मुझ से छुप कर उस की सियाह जल्द से अपनी नीली आँखों के लिए सुर्मा ईजाद किया और रात के पिछले पहर अपने दूध से उस की ज़ियाफ़त करने लगी मैं ने मुक़द्दस पहाड़ की सब से बुलंद चोटी उसे दान की और अपनी पेशानी ख़ाक पे रख दी
Jawaz Jafri
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सातवीं बार असकंदरिया के नीले साहिल पर उस ने अपनी दीद का सुनहरा सिक्का मेरे कानों के कश्कोल में दान किया असकंदरिया जिसे एक बहादुर जंग-जू ने आबाद किया था जो हँसते बस्ते शहरों के नाम बर्बादी के संदेसे लिखता था उस का नसीब बूढे मल्लाह की बोसीदा कश्ती से बँधा हचकोले ले रहा था दुनिया का नसीब लिखने वाले उस के साँवले हाथों में शुमाली मिस्र के सरसब्ज़ बाग़ों के अव्वलीन फल थे जिसे वो बोटो शहर के सब से क़दीम दारुल-इस्तिख़ारा को भेंट करने आई थी
Jawaz Jafri
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अशतार ऐ आसमानों की मलिका बादशाह तेरी दहलीज़ का दरबान है लगाश और और अर्ज में तेरे नाम का सिक्का ढलता है तेरी ज़ुल्फ़ें ज़फ़र-मंद लश्कर का फरेरा हैं और चेहरा सुब्ह के मशरिक़ का आसमान फ़ुरात का चमकता पानी तेरा आईना है कुँवारियाँ तेरे मुक़द्दस अहाते में अपनी इस्मत का सुनहरा सिक्का भेंट करने आती हैं तो मीनारा-ए-बाबुल की बुलंदी से बाँझ ज़मीन के नाम बार-आवरी का संदेसा लिखती है ऐ बहुत से नामों वाली तेरी हथेलियाँ तेरे तमव्वुज़ के हाथों की गर्मी से दहकती हैं जिस के सफ़ेद मा'बद के सुनहरी कलस मेरी आँखों को ख़ीरा करते हैं तेरे मातम-दारों के आज़ा-ए-तनासुल तेरी बारगाह का चढ़ावा हैं अज़दहा तेरे पाँव के तवाज़ुन पे मरता है सफ़ेद शे'र तेरे सुनहरे रथ के घोड़े हैं तेरे सर पर पर-दार बेल का साया है ऐ बार-आवरी की देवी तेरे क़दमों की आहट से मुर्दा ज़मीन नाफ़ तक धड़क उठती है
Jawaz Jafri
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चौथी बार बंगाल की गाती नदिया के किनारे वो मुझ पर मुन्कशिफ़ होई जहाँ सुनहरी मछलियाँ नीले सुरों को बिलोती थीं और रौशनी बाँटते पेड़ कलाम करते थे उस की सहर फूँकती आँख ने मुझे परिंदा बनने का हुक्म दिया मैं उस के शाने की हरी शाख़ पर बैठ कर अपना लहन ईजाद करने लगा उस के हरे बदन का साया सिवा नेज़े पे था मैं ने उस के बदन के साए से नर्म बिछौना तख़्लीक़ किया और दुनिया के चेहरे पर थूक दिया एक तवील नींद के बा'द मैं ने ब्रह्मा की तरह आँख खोली उस का घना साया मेरे वजूद पर सिमट रहा था उस के लज़ीज़ फलों में मेरे लिए कड़वाहट रेंगने लगी मैं ने अपना रेज़ा रेज़ा वजूद समेट कर गठड़ी में बाँधा क़ुतुब-नुमा को ख़लीज बंगाल के ख़त पर रख कर पाँव से ठोकर मारी और हवा पर पाँव रखता हुआ पाँचवें सम्त में आगे बढ़ गया मैं ने अपने दिल को यक़ीन दिलाया कि उस की सिसकियों का मुख़ातब मैं नहीं था
Jawaz Jafri
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छटी बार वो दजला-ओ-फ़ुरात के दरमियान मीनारा-ए-बाबुल के साए में मुझ पर मुन्कशिफ़ होई वो मुक़द्दस मीनार की सातवीं मंज़िल पर बैठी आयत-दर-आयत बिखरे सितारों की तिलावत पर मामूर थी वो अशतार के मा'बद के शुमाल में साए बाँटते बाग़ात-ए-मुअ'ल्लक़ा को बार-आवरी की दुआ देने आई थी उस का बे-नियाज़ जिस्म उन हाथों की ना-रसाई को पहचानता था जो उसे छूने की तमन्ना में ज़ेर-ए-क़बा जल रहे थे मैं ने दो लश्करों के दरमियान अपने दादा के रजज़ में कलाम किया जिस की मुट्ठी में क़बीले की आबरू थी मेरे अक़ब में हरे जिस्मों वाली औरतें आसमानी दफ़ की लय पर मौत का तराना गाने लगीं मेरा नजीबुत-तरफ़ैन घोड़ा जिस का शजरा मेरी उँगलियों की पोरों पर रक़म था और जिसे मैं अपनी औलाद से भी अज़ीज़ जानता था मैं ने उस की ज़ीन में बैठने से इनकार किया और हवा पर पाँव रखता हुआ दुश्मन के क़ल्ब-ए-लश्कर तक जा पहुँचा मुझे देख कर सूरमाओं की आँखें नाफ़ तक फैल गईं मैं ज़ेर-ए-लब अपना शजरा-ए-नसब दोहरा रहा था मैं ने अपने पाँव में भागते ख़ून को महमेज़ दी और अपनी ज़हर में बुझी तलवार मैदान-ए-जंग के दरमियान गाड़ दी जिस के मुरस्सा दस्ते पर ज़ैतून का अख़ुवा फूट पड़ा मैं अपनी गुज़िश्ता ज़िंदगी पर कफ़-ए-अफ़्सोस मलने लगा
Jawaz Jafri
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