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सातवीं बार असकंदरिया के नीले साहिल पर उस ने अपनी दीद का सुनहरा सिक्का मेरे कानों के कश्कोल में दान किया असकंदरिया जिसे एक बहादुर जंग-जू ने आबाद किया था जो हँसते बस्ते शहरों के नाम बर्बादी के संदेसे लिखता था उस का नसीब बूढे मल्लाह की बोसीदा कश्ती से बँधा हचकोले ले रहा था दुनिया का नसीब लिखने वाले उस के साँवले हाथों में शुमाली मिस्र के सरसब्ज़ बाग़ों के अव्वलीन फल थे जिसे वो बोटो शहर के सब से क़दीम दारुल-इस्तिख़ारा को भेंट करने आई थी

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम

Tehzeeb Hafi

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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अशतार ऐ आसमानों की मलिका बादशाह तेरी दहलीज़ का दरबान है लगाश और और अर्ज में तेरे नाम का सिक्का ढलता है तेरी ज़ुल्फ़ें ज़फ़र-मंद लश्कर का फरेरा हैं और चेहरा सुब्ह के मशरिक़ का आसमान फ़ुरात का चमकता पानी तेरा आईना है कुँवारियाँ तेरे मुक़द्दस अहाते में अपनी इस्मत का सुनहरा सिक्का भेंट करने आती हैं तो मीनारा-ए-बाबुल की बुलंदी से बाँझ ज़मीन के नाम बार-आवरी का संदेसा लिखती है ऐ बहुत से नामों वाली तेरी हथेलियाँ तेरे तमव्वुज़ के हाथों की गर्मी से दहकती हैं जिस के सफ़ेद मा'बद के सुनहरी कलस मेरी आँखों को ख़ीरा करते हैं तेरे मातम-दारों के आज़ा-ए-तनासुल तेरी बारगाह का चढ़ावा हैं अज़दहा तेरे पाँव के तवाज़ुन पे मरता है सफ़ेद शे'र तेरे सुनहरे रथ के घोड़े हैं तेरे सर पर पर-दार बेल का साया है ऐ बार-आवरी की देवी तेरे क़दमों की आहट से मुर्दा ज़मीन नाफ़ तक धड़क उठती है

Jawaz Jafri

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मैं ने दजला-ओ-फ़ुरात के मशरिक़ में एक क़दीम और रौशन पेड़ के नीचे सज्दों का ख़िराज वसूल किया और फलदार दरख़्तों से ढके बाग़ में मुक़ीम हवा जिसे मेरे और उस औरत के लिए आरास्ता किया गया था जिस की जन्म-भूमि मेरी दाईं पस्ली थी मैं ने पहली बार उसे ज़िंदगी के पेड़ की सुनहरी शाख़ों के दरमियान रेंगते देखा वो पेड़ की हिफ़ाज़त पे मामूर था उस की कासनी आँखों में क़ाइल कर लेने वाली चमक थी मैं ने अपनी भूक इम्तिनाअ के फल पे तस्तीर की तो मेरी आँखें उस औरत के जिस्म के आर-पार देखने लगीं और बाग़ के सब्ज़ पेड़ मेरे सर से अपने साए की छतरियाँ समेटने लगे मैं ने ज़िंदगी के पेड़ से लिपटे अज़दहे को तीन बराबर हिस्सों में तक़्सीम किया एक हिस्से से अपने सर के लिए शिमला ईजाद किया दूसरे हिस्से को इज़ार-बंद बना कर कमर के गिर्द लपेटा जो बच रहा उसे अपनी साथी औरत के बालों में गूँधा और बाग़ की जानिब पीठ कर ली मेरी औरत ने मुझ से छुप कर उस की सियाह जल्द से अपनी नीली आँखों के लिए सुर्मा ईजाद किया और रात के पिछले पहर अपने दूध से उस की ज़ियाफ़त करने लगी मैं ने मुक़द्दस पहाड़ की सब से बुलंद चोटी उसे दान की और अपनी पेशानी ख़ाक पे रख दी

Jawaz Jafri

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छटी बार वो दजला-ओ-फ़ुरात के दरमियान मीनारा-ए-बाबुल के साए में मुझ पर मुन्कशिफ़ होई वो मुक़द्दस मीनार की सातवीं मंज़िल पर बैठी आयत-दर-आयत बिखरे सितारों की तिलावत पर मामूर थी वो अशतार के मा'बद के शुमाल में साए बाँटते बाग़ात-ए-मुअ'ल्लक़ा को बार-आवरी की दुआ देने आई थी उस का बे-नियाज़ जिस्म उन हाथों की ना-रसाई को पहचानता था जो उसे छूने की तमन्ना में ज़ेर-ए-क़बा जल रहे थे मैं ने दो लश्करों के दरमियान अपने दादा के रजज़ में कलाम किया जिस की मुट्ठी में क़बीले की आबरू थी मेरे अक़ब में हरे जिस्मों वाली औरतें आसमानी दफ़ की लय पर मौत का तराना गाने लगीं मेरा नजीबुत-तरफ़ैन घोड़ा जिस का शजरा मेरी उँगलियों की पोरों पर रक़म था और जिसे मैं अपनी औलाद से भी अज़ीज़ जानता था मैं ने उस की ज़ीन में बैठने से इनकार किया और हवा पर पाँव रखता हुआ दुश्मन के क़ल्ब-ए-लश्कर तक जा पहुँचा मुझे देख कर सूरमाओं की आँखें नाफ़ तक फैल गईं मैं ज़ेर-ए-लब अपना शजरा-ए-नसब दोहरा रहा था मैं ने अपने पाँव में भागते ख़ून को महमेज़ दी और अपनी ज़हर में बुझी तलवार मैदान-ए-जंग के दरमियान गाड़ दी जिस के मुरस्सा दस्ते पर ज़ैतून का अख़ुवा फूट पड़ा मैं अपनी गुज़िश्ता ज़िंदगी पर कफ़-ए-अफ़्सोस मलने लगा

Jawaz Jafri

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रात के आख़िरी पहर मैं ने मुक़द्दस फ़्लाई की सरहद पे पाँव रखा उस के सब्ज़ पैरहन की ख़ुश्बू मेरे इस्तिक़बाल के लिए मौजूद थी मेरे ख़ाक-आलूद घुटनों ने ज़मीन की खुशबू-दार नाफ़ को छुआ तो मैं ने अपना मल्बूस चाक कर डाला वो पेपर्स के जंगलों के शुमाली किनारे पे बैठी नील के पानियों को कात रही थी उस ने मेरे ख़ाक-आलूद चेहरे को नील का आईना दिखाया हम मुतबर्रिक तेल के नमकीन चराग़ हथेलियों पे रखे शहर-ए-पनाह की तरफ़ चल दिए जहाँ देवता बारयाबी के मुंतज़िर थे हमारे क़दमों की आहट पा कर मुक़द्दस फाटक के सुनहरे किवाड़ ज़मीन के आख़िरी किनारों तक खुल गए और शहर की इत्र-बेज़ गलियाँ हमारे तलवे चूमने लगीं हमारे सुरों पे फैले आसमान के सफ़ेद वरक़ पर परिंदों के लिए हर्फ़ इम्तिनाअ लिखा था हम ख़ुदावंद असर की ज़ियारत-गाह के नवाह में पहुँचे तो देवता अपना मरक़द छोड़ कर दहलीज़ से आ लगा उस ने अपने दिल के छेद नरसले की शाख़ पे कुंदा किए और अपने ख़ूब-सूरत लहन की सीढ़ी लगा कर दिलों में उतर गया सियाह मा'बद के सुनहरे कलस के साए में ज़ाएरीन का मातमी जुलूस दर-ओ-दीवार पे नौहे तसतीर कर रहा था मेरे पहलू में खड़ी सब्ज़-फ़ाम औरत ने मुझे देवताई मल्बूस हदिया किया तो मैं हातिफ़ की बारगाह की दहलीज़ से लग कर अपना क़सीदा भेंट करने लगा मुक़द्दस फ़्लाई की तारीक गलियाँ नमकीन चराग़ों से भर गईं मैं ने आख़िरी मिस्रा हातिफ़ को दान किया और सब्ज़ औरत की नीली आँखों में तहसीन की नक़दी तलाश करने लगा उस ने फ़स्लों पे करम करते हाथ से हवा में तराज़ू बनाया एक पलड़े में मेरा हर्फ़-ए-हुनर रखा और दूसरे में अपने जमाल की नक़दी उस के जमाल का सब्ज़ दरिया मेरे दामन में बहने लगा

Jawaz Jafri

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चौथी बार बंगाल की गाती नदिया के किनारे वो मुझ पर मुन्कशिफ़ होई जहाँ सुनहरी मछलियाँ नीले सुरों को बिलोती थीं और रौशनी बाँटते पेड़ कलाम करते थे उस की सहर फूँकती आँख ने मुझे परिंदा बनने का हुक्म दिया मैं उस के शाने की हरी शाख़ पर बैठ कर अपना लहन ईजाद करने लगा उस के हरे बदन का साया सिवा नेज़े पे था मैं ने उस के बदन के साए से नर्म बिछौना तख़्लीक़ किया और दुनिया के चेहरे पर थूक दिया एक तवील नींद के बा'द मैं ने ब्रह्मा की तरह आँख खोली उस का घना साया मेरे वजूद पर सिमट रहा था उस के लज़ीज़ फलों में मेरे लिए कड़वाहट रेंगने लगी मैं ने अपना रेज़ा रेज़ा वजूद समेट कर गठड़ी में बाँधा क़ुतुब-नुमा को ख़लीज बंगाल के ख़त पर रख कर पाँव से ठोकर मारी और हवा पर पाँव रखता हुआ पाँचवें सम्त में आगे बढ़ गया मैं ने अपने दिल को यक़ीन दिलाया कि उस की सिसकियों का मुख़ातब मैं नहीं था

Jawaz Jafri

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