nazmKuch Alfaaz

ये घर बहुत अज़ीम था ये घर बहुत हसीन था कि उस के इर्द-गिर्द दूर दूर तक कोई मकान उस से बढ़ के था नहीं मगर यहाँ का चख अजब रिवाज था थे बिन-बुलाए अजनबी कि जिन का घर पे राज था सजे सजाए कमरे उन के शब-कदे वो सब्ज़ लॉन फूल की कियारियाँ वसीअ' सहन-ओ-साइबाँ थे उन के वास्ते मगर ख़ुद अपने घर में अजनबी मकीन चौखटों पे रातें अपनी काटते रहे सड़क गली की ख़ाक छानते रहे वो बिन-बुलाए अजनबी गदेले बिस्तरों पे लज़्ज़त-ए-शब-ओ-सहर में मस्त मस्त थे उसी तरह न जाने कितनी उम्र काटने के बा'द रफ़्ता रफ़्ता सख़्त-ओ-सर्द चौखटों ने नर्म-ओ-गर्म बिस्तरों की गुदगुदी का ज़ाइक़ा समझ लिया दिमाग़-ओ-दिल की ख़ुश्क वादियों में आरज़ू के आबशार गुनगुना उठे सियाह-बख़्त रात शुऊर के जुनून-ए-शौक़ के चराग़ जल गए चराग़ से कई चराग़ जल गए ब-यक ज़बान चौखटों से ये मुतालबा हुआ कि अजनबी हमारे घर को छोड़ दें ये घर हमारे ख़ून और हमारी हड्डियों से है ये बात सुन के शब-कदे लरज़ गए थी चौंकने की बात ही कि साल-ख़ूर्दा अंधी चौखटों पे रौशनी कहाँ से आ गई गली की ख़ाक आसमाँ पे अब्र बन के छा गई कहाँ से ज़ेहन-ए-ना-रसा में बात ऐसी आ गई वो अजनबी नवाज़िशों इनायतों से उन का जोश सर्द जब न कर सके तो नित-नई सज़ाओं और धमकीयों गली गली लहू लहू सड़क सड़क धुआँ धुआँ मगर जुनून-ए-शौक़ की सदा ज़मीं से आसमाँ सज़ाएँ सख़्त थीं मगर मुतालबा अज़ीज़ था नवाज़िशें इनायतें सज़ाएँ और धमकियाँ सदा-ए-हक़ जुनून-ए-शौक़ दामनों की धज्जियाँ मुक़ाबला भी ख़ूब था कहाँ ज़मीन-ए-हिर्स और कहाँ जुनूँ का आसमाँ मआल-ए-कश्मकश वही हुआ जो होना चाहिए वो अजनबी चले गए मकीन अपने घर को पा के अपने घर को पा के अपने घर में आ गए वो घर के जिस के वास्ते लगा दी अपनी जान भी जो मिल गया तो यूँँ हुआ कि जैसे कुछ नहीं हुआ अजीब माजरा है अब जुनून-ए-इश्क़ ने चराग़-ए-आरज़ू जलाए थे उसी की तेज़ लौ से ये मकीन अपने घर को शौक़ से जला रहे हैं सब्ज़ लॉन में क्यारियों के फूल अपने पाँव से कुछ रहे हैं साएबान के सुतून ढा रहे हैं अल-ग़रज़ जो आज घर का हाल है हमारे पास लफ़्ज़ ही नहीं कि हम बयाँ करें जो सच कहो तो आज भी ये घर बहुत हसीन है मकीन ही अजीब हैं बड़े ही बद-नसीब हैं

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं

Divya 'Kumar Sahab'

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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वैसे उस तारीक जंगल के सफ़र के क़ब्ल भी हाथ में उस के यही इक टिमटिमाता काँपता नन्हा दिया था कुछ तो शोहरत की हवस ने और कुछ अहमक़ बही-ख़्वाहों ने इस की सादा-लौही को सज़ा दी उस के तिफ़्लाना इरादा को हवा दी ला के सरहद पर ख़ुदा-हाफ़िज़ कहा उस के ख़िज़ाब-आलूदा सर को ये सआ'दत दी धुआँ खाई हुई बद-रंग दस्तार-ए-क़यादत दी तो वो सीना फुलाए अपनी दस्तार-ए-क़यामत को सँभाले काँपते नन्हे दिए को एक मशअ'ल की तरह ऊँचा उठाए चल पड़ा था ग़ालिबन वो दो-क़दम ही जा सका होगा कि पीली आँधियों ने दस्त-ए-लर्ज़ां में लरज़ते उस दिए को नज़्अ' की हिचकी अता की उस पे तेरा छीन ली दस्तार उस की उस ने आग़ाज़-ए-सफ़र की सारी ख़ुश-फ़हमी बिखरती देख कर जब लौटना चाहा तो ये मुमकिन नहीं था हर तरफ़ तारीकियाँ थीं दफ़्अ'तन कुछ दूर पीछे उस ने देखा आसमाँ से बात करती धूल की दीवार बढ़ती आ रही है और कुछ क़ुर्बत हुई तो उस ने देखा वो कई थे उन के हाथों में भड़कती मिशअलें थीं कासा-ए-नमनाक से उस ने ग़रज़ की गंदगी जो उस को फ़ितरत में मिली थी पोंछ डाली और फ़ौरन ग़ाज़ा-ए-मासूम ये उस की आदत बन चुकी थी अपने चेहरे पर चढ़ाया एक ही मक़्सद था या'नी धूल उड़ाते क़ाफ़िले से एक मशअ'ल ले सके वो ग़ाज़ा-ए-मासूमियत फिर काम आया क़ाफ़िला वालों ने उस को एक मशअ'ल दे के अपने साथ चलने को कहा लेकिन कहाँ तक वो निहायत तेज़-रौ और यक-क़दम थे उस के नाज़ पावँ सूखी हड्डियों के ज़ोर पर क्या साथ देते एक क़दम या दो-क़दम फिर थक गया वो रफ़्ता रफ़्ता उस की वो माँगी हुई मशअ'ल ख़ुद अपने रंग-ओ-रोग़न खा रही थी अब फ़क़त भेंची हुई मोहतात मुट्ठी में अँधेरे की छड़ी थी बाद-ओ-बाराँ तेज़ तूफ़ाँ ज़ेहन-ए-तिफ़्लक में सफ़र के क़ब्ल उन दुश्वारियों का एक हल्का सा तसव्वुर भी नहीं था अब जो ये बर-अक्स सूरत हो गई थी रो पड़ा वो उस की पस्पाई में लेकिन हौसला था दामन-ए-उम्मीद अब भी हाथ में था दफ़्अ'तन उस ने ये देखा धुँदली गहरी रौशनियों के कई हालों में कुछ बढ़ते क़दम नज़दीक होते जा रहे थे उन के होंटों से ख़मोशी छिन रही थी सुस्त-रौ थे फिर भी उन की चाल में इक तमकनत थी उस ने सोचा उन नए लोगों की तरह तेज़ नहीं है उन की हमराही में क़दमों की नक़ाहत बे-असर है और मंज़िल एक सई-ए-मुख़्तसर है इक नई उम्मीद ले कर पुश्त पर मुर्दा दिए तारीक मशअ'ल को छुपा कर गुफ़्तुगू में मस्लहत आमेज़ नर्मी घोल कर उस ने नए लोगों से इक मशअ'ल तलब की उफ़ वो कैसा क़ाफ़िला था किस तिलस्माती जहाँ के लोग थे वो इस क़दर तारीक राहों में बड़ी ही तमकनत से चल रहे थे और हाथों में कोई मशअ'ल नहीं थी रौशनी थी उन की आँखों के दरीचों से उतर कर अपने क़दमों से लिपट कर चलने वाली अपनी अपनी रौशनी थी उस ने सोचा उन के क़दमों से लिपट कर चलने वाली धीमी धीमी रौशनी के अक्स क्या उस के लिए काफ़ी नहीं हैं आज भी वो पुश्त पर मुर्दा दिया तारीक मशअ'ल को छुपाए उन नए लोगों के पीछे उन के क़दमों में लरज़ती रौशनियों के सहारे ठोकरें खाता सँभलता सोचता है रौशनी तो ख़ारिजी शय है दिया है या भड़कती मिशअलें हैं आख़िरश ये रौशनी उन अजनबी लोगों की आँखों से उतर कर उन के क़दमों से लिपट कर चलने वाली रौशनी कैसी है कैसी रौशनी है

Zaheer Siddiqui

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अल्लामा-इक़बाल के हुज़ूर फ़ितरत का कारोबार तो चलता है आज भी महताब बर्ग-ए-गुल पे फिसलता है आज भी क़ुदरत ने हम को दौलत-ए-दुनिया भी कम न दी सय्याल ज़र-ए-ज़मीं से उबलता है आज भी दुनिया में रौशनी भी हमारे ही दम से है मशरिक़ से आफ़्ताब निकलता है आज भी पर मंज़र-ए-ग़ुरूब बहुत दिल-नशीं है क्यूँँ मग़रिब की शाम अपनी सहरस हसीं है क्यूँँ इस कश्मकश में दौलत-ए-उक़्बा भी छिन गई ज़ौक़-ए-जुनूँ से वुसअ'त-ए-सहरा भी छिन गई सहरा-ए-आरज़ू में तग-ओ-दौ नहीं रही पा-ए-तलब से वादी-ए-सीना भी छिन गई तू ने तो क़र्तबा में नमाज़ें भी कीं अदा अपनी जबीं से मस्जिद-ए-अक़्सा भी छिन गई कोहसार रौंद डाले गए खेत हो गए चट्टान हम ज़रूर थे अब रेत हो गए मंज़िल पे आ के लुट गए हम रहबरों के साथ बीमार भी पड़े हैं तो चारागरों के साथ ग़ुर्बत-कदे में काश उतर आए कहकशाँ आँखें फ़लक की सम्त हैं बोझल सरों के साथ उड़ना मुहाल लौट के आना भी है वबाल ज़ख़्मी दुआ ख़ला में है टूटे परों के साथ इस रज़्म-ए-ख़ैर-ओ-शर में हुआ कौन सुरख़-रू ज़र्ब-ए-कलीम कुंद है फ़िरऔन सुर्ख़-रू

Zaheer Siddiqui

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और जब उन के अज्दाद की सर ज़मीं जिस की आग़ोश में वो पले तंग होने लगी जब उसूलों की पाकीज़गी और गंदा रिवायात में जंग होने लगी तो उन्हें आसमाँ से हिदायत मिली नेक बंद तुम्हारे लिए ये ज़मीं एक है उस सफ़र में तुम्हें रिज़्क़ की फ़िक्र है क्या अनाजों की गठरी उठाए चरिन्दों परिंदों को देखा कभी ज़ाद-ए-रह नेक आ'माल हैं मेरे अहकाम हैं मौत का ख़ौफ़ बे-कार है आख़िरी साँस के बा'द सब को पलटना है मेरी तरफ़ तुम फ़क़त जिस्म ही तो नहीं अपने अंदर सुलगती हुई रौशनी के सहारे बढ़ो एक ही जस्त में दस्त-ओ-दरिया की फैली हुई वुसअ'तें नाप लो चप्पे चप्पे पे अपने नुक़ूश-ए-क़दम इस तरह सब्त कर दो कि उन अजनबियों की हैरत मिटे और पैहम तआ'क़ुब में दुश्मन जो हैं उन की ख़िफ़्फ़त बढ़े मेरे अहकाम की रौशनी सब के दिल में उतारो कि ऐवान-ए-तसलीस में शम-ए-वहदत जले

Zaheer Siddiqui

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आओ आ जाओ क़रीब आओ कि कुछ बात बने इतनी दूरी है कि आवाज़ पहुँचती ही नहीं मैं किसी ग़ैर ज़बाँ के अल्फ़ाज़ अपने अश'आर में शामिल तो नहीं करता हूँ दुख तो इस बात का है तुम ये समझते ही नहीं मेरे सीने में मचलता है तुम्हारा दुख भी मेरे अल्फ़ाज़ में शामिल है तुम्हारी आवाज़ मेरे जज़्बात में ख़ुफ़्ता हैं तुम्हारे जज़्बात मैं जो अद पर हूँ तो बस एक ही मक़्सद है मिरा फ़र्श से अर्श का कुछ राब्ता बाक़ी तो रहे मैं हूँ जिस ज़ीने पे तुम उस पे नहीं आ सकते और मैं नीचे बहुत नीचे नहीं जा सकता ये तफ़ावुत तो अज़ल ही से है क़ाएम लेकिन तुम कभी इतने गराँ गोश न थे सीढ़ियाँ जितनी भी ऊपर जाएँ पाँव तो उन के ज़मीं से ही लगे रहते हैं इक ज़रा क़ुर्ब-ए-समाअ'त के लिए कितने ही ज़ीने मैं उतरा हूँ तुम्हारी ख़ातिर झाड़ कर अपने बंद की मिट्टी चंद ज़ीने ही सही तुम भी तो ऊपर आओ और नीचे न उतारो मिरे सामेअ' मुझ को

Zaheer Siddiqui

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इसराईल मिस्र जंग में कर्नल नासिर के नारे हम बेटे फ़िरऔन के से मुतअस्सिर हो कर यही वो कोहसार हैं जहाँ मुश्त-ए-ख़ाक नूर-आश्ना हुई थी यही वो ज़र्रात-ए-रेग हैं जो किसी के बेताब वालिहाना क़दम की ठोकर से कहकशाँ कहकशाँ हुए थे यही वो पथरीली वादियाँ हैं कि जिन की आग़ोश-ए-ख़ुश्क में दो धड़कते मा'सूम दिल मिले थे और आज हर-सू है दूद-ए-बारूद की रिदा जिस में हर किरन रौशनी की मादूम हो गई है उजाड़ संगीन वादियों में हवस का इफ़रीत गोसफ़ंदान-ए-अर्ज़-ए-मदयन को खा गया है न कोई बिंत-ए-शुऐब है और न रहरव-ए-तिश्ना ही है कोई कुएँ के पास में जौहरी ज़हर घुल गया है तजल्ली-ए-लम-यज़ल कहाँ की ये तेज़ संगीनों की चमक है कलीम ही जब नहीं है कोई कलाम कैसा मुहीब तोपों की ये धमक है किसी के मा'सूम वालिहाना क़दम की ये कहकशाँ नहीं है ये रेग-हा-ए-ज़मीन ही हैं जो आहनी असलहों की आतिश में तप गए हैं सवाद-ए-साहिल असा-ब-दस्त अब नहीं है कोई तो मो'जिज़ा क्या तिलिस्म कैसा ये सत्ह-ए-दरया-ए-नील गुल-गू जो हो गई है असा का ए'जाज़ तो नहीं ये रिदा-ए-ख़ूँ है रिदा-ए-ख़ूँ है ये ख़ून किस का है ऐ दिल-ए-ज़ूद-रंज तो क्यूँँ उदास है ख़ैर-ओ-शर की ये कश्मकश नहीं है कि दोनों जानिब ही आस्तीन-ए-हवस में फ़िरऔनियत के ज़हरीले अज़दहे हैं सवाद-ए-साहिल असा-ब-दस्त अब नहीं है कोई

Zaheer Siddiqui

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