nazmKuch Alfaaz

इसराईल मिस्र जंग में कर्नल नासिर के नारे हम बेटे फ़िरऔन के से मुतअस्सिर हो कर यही वो कोहसार हैं जहाँ मुश्त-ए-ख़ाक नूर-आश्ना हुई थी यही वो ज़र्रात-ए-रेग हैं जो किसी के बेताब वालिहाना क़दम की ठोकर से कहकशाँ कहकशाँ हुए थे यही वो पथरीली वादियाँ हैं कि जिन की आग़ोश-ए-ख़ुश्क में दो धड़कते मा'सूम दिल मिले थे और आज हर-सू है दूद-ए-बारूद की रिदा जिस में हर किरन रौशनी की मादूम हो गई है उजाड़ संगीन वादियों में हवस का इफ़रीत गोसफ़ंदान-ए-अर्ज़-ए-मदयन को खा गया है न कोई बिंत-ए-शुऐब है और न रहरव-ए-तिश्ना ही है कोई कुएँ के पास में जौहरी ज़हर घुल गया है तजल्ली-ए-लम-यज़ल कहाँ की ये तेज़ संगीनों की चमक है कलीम ही जब नहीं है कोई कलाम कैसा मुहीब तोपों की ये धमक है किसी के मा'सूम वालिहाना क़दम की ये कहकशाँ नहीं है ये रेग-हा-ए-ज़मीन ही हैं जो आहनी असलहों की आतिश में तप गए हैं सवाद-ए-साहिल असा-ब-दस्त अब नहीं है कोई तो मो'जिज़ा क्या तिलिस्म कैसा ये सत्ह-ए-दरया-ए-नील गुल-गू जो हो गई है असा का ए'जाज़ तो नहीं ये रिदा-ए-ख़ूँ है रिदा-ए-ख़ूँ है ये ख़ून किस का है ऐ दिल-ए-ज़ूद-रंज तो क्यूँँ उदास है ख़ैर-ओ-शर की ये कश्मकश नहीं है कि दोनों जानिब ही आस्तीन-ए-हवस में फ़िरऔनियत के ज़हरीले अज़दहे हैं सवाद-ए-साहिल असा-ब-दस्त अब नहीं है कोई

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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो

Gulzar

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है

Sahir Ludhianvi

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ग़ैरत है कि हया नाम उस का न लिया जिस को पुकारा उस ने उस गई रात के सन्नाटे में कौन आया है बंद दरवाज़े के मजस में तो सीता ही है और बाहर कोई रावन तो नहीं कौन है कौन की सहमी सी सदा वो भी कुछ कह न सका मैं के सिवा दस्तकें राम के मख़्सूस ज़बाँ रखती हैं गोश-ए-सीता के लिए मुज़्दा-ए-जाँ रखती हैं बल्ब रौशन हुआ और चाप क़दम की उभरी चूड़ियाँ बोल उठीं उँगलियाँ काठ की मिज़राब पे फिर रेंग गईं दोनों पट ख़्वाब से चौंके तो मअ'न चीख़ उठे एक हंगामा हुआ रात का अफ़्सूँ टूटा मुंतज़र साया-ए-ख़जालत के धुआँ से उभरा रात काफ़ी हुई तुम जाग रही हो अब तक आज फिर देर हुई असल में आज अजब बात हुई ठीक है ठीक कोई बात नहीं मुंतज़िर शाख़ जो लचकी तो कई फूल झड़े आप मुँह हाथ तो धो लें पहले और मिंटों में मैं साल को ज़रा गर्म करूँँ प्यार की आग भी रौशन हुई स्टोव के साथ दश्त-ए-तन्हाई के इफ़रीत बहुत दूर हुए वसवसे जितने थे दिल में सभी काफ़ूर हुए हरकत और हरारत में मगन दोनों बदन ये किराया का मकाँ है कि मोहब्बत का चमन एक एक लुक़्मा पे होती हैं निगाहें दो-चार एक एक जुरए में महलूल तबस्सुम की बहार मुज़्तरिब दिल में मुनव्वर हैं मसर्रत के चराग़ जानी-पहचानी सी ख़ुश्बू में है मसहूर-ए-दिमाग़ आँखों आँखों में सियह रात कटेगी अब तो होंट से होंट की सौग़ात बटेगी अब तो

Zaheer Siddiqui

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वैसे उस तारीक जंगल के सफ़र के क़ब्ल भी हाथ में उस के यही इक टिमटिमाता काँपता नन्हा दिया था कुछ तो शोहरत की हवस ने और कुछ अहमक़ बही-ख़्वाहों ने इस की सादा-लौही को सज़ा दी उस के तिफ़्लाना इरादा को हवा दी ला के सरहद पर ख़ुदा-हाफ़िज़ कहा उस के ख़िज़ाब-आलूदा सर को ये सआ'दत दी धुआँ खाई हुई बद-रंग दस्तार-ए-क़यादत दी तो वो सीना फुलाए अपनी दस्तार-ए-क़यामत को सँभाले काँपते नन्हे दिए को एक मशअ'ल की तरह ऊँचा उठाए चल पड़ा था ग़ालिबन वो दो-क़दम ही जा सका होगा कि पीली आँधियों ने दस्त-ए-लर्ज़ां में लरज़ते उस दिए को नज़्अ' की हिचकी अता की उस पे तेरा छीन ली दस्तार उस की उस ने आग़ाज़-ए-सफ़र की सारी ख़ुश-फ़हमी बिखरती देख कर जब लौटना चाहा तो ये मुमकिन नहीं था हर तरफ़ तारीकियाँ थीं दफ़्अ'तन कुछ दूर पीछे उस ने देखा आसमाँ से बात करती धूल की दीवार बढ़ती आ रही है और कुछ क़ुर्बत हुई तो उस ने देखा वो कई थे उन के हाथों में भड़कती मिशअलें थीं कासा-ए-नमनाक से उस ने ग़रज़ की गंदगी जो उस को फ़ितरत में मिली थी पोंछ डाली और फ़ौरन ग़ाज़ा-ए-मासूम ये उस की आदत बन चुकी थी अपने चेहरे पर चढ़ाया एक ही मक़्सद था या'नी धूल उड़ाते क़ाफ़िले से एक मशअ'ल ले सके वो ग़ाज़ा-ए-मासूमियत फिर काम आया क़ाफ़िला वालों ने उस को एक मशअ'ल दे के अपने साथ चलने को कहा लेकिन कहाँ तक वो निहायत तेज़-रौ और यक-क़दम थे उस के नाज़ पावँ सूखी हड्डियों के ज़ोर पर क्या साथ देते एक क़दम या दो-क़दम फिर थक गया वो रफ़्ता रफ़्ता उस की वो माँगी हुई मशअ'ल ख़ुद अपने रंग-ओ-रोग़न खा रही थी अब फ़क़त भेंची हुई मोहतात मुट्ठी में अँधेरे की छड़ी थी बाद-ओ-बाराँ तेज़ तूफ़ाँ ज़ेहन-ए-तिफ़्लक में सफ़र के क़ब्ल उन दुश्वारियों का एक हल्का सा तसव्वुर भी नहीं था अब जो ये बर-अक्स सूरत हो गई थी रो पड़ा वो उस की पस्पाई में लेकिन हौसला था दामन-ए-उम्मीद अब भी हाथ में था दफ़्अ'तन उस ने ये देखा धुँदली गहरी रौशनियों के कई हालों में कुछ बढ़ते क़दम नज़दीक होते जा रहे थे उन के होंटों से ख़मोशी छिन रही थी सुस्त-रौ थे फिर भी उन की चाल में इक तमकनत थी उस ने सोचा उन नए लोगों की तरह तेज़ नहीं है उन की हमराही में क़दमों की नक़ाहत बे-असर है और मंज़िल एक सई-ए-मुख़्तसर है इक नई उम्मीद ले कर पुश्त पर मुर्दा दिए तारीक मशअ'ल को छुपा कर गुफ़्तुगू में मस्लहत आमेज़ नर्मी घोल कर उस ने नए लोगों से इक मशअ'ल तलब की उफ़ वो कैसा क़ाफ़िला था किस तिलस्माती जहाँ के लोग थे वो इस क़दर तारीक राहों में बड़ी ही तमकनत से चल रहे थे और हाथों में कोई मशअ'ल नहीं थी रौशनी थी उन की आँखों के दरीचों से उतर कर अपने क़दमों से लिपट कर चलने वाली अपनी अपनी रौशनी थी उस ने सोचा उन के क़दमों से लिपट कर चलने वाली धीमी धीमी रौशनी के अक्स क्या उस के लिए काफ़ी नहीं हैं आज भी वो पुश्त पर मुर्दा दिया तारीक मशअ'ल को छुपाए उन नए लोगों के पीछे उन के क़दमों में लरज़ती रौशनियों के सहारे ठोकरें खाता सँभलता सोचता है रौशनी तो ख़ारिजी शय है दिया है या भड़कती मिशअलें हैं आख़िरश ये रौशनी उन अजनबी लोगों की आँखों से उतर कर उन के क़दमों से लिपट कर चलने वाली रौशनी कैसी है कैसी रौशनी है

Zaheer Siddiqui

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अल्लामा-इक़बाल के हुज़ूर फ़ितरत का कारोबार तो चलता है आज भी महताब बर्ग-ए-गुल पे फिसलता है आज भी क़ुदरत ने हम को दौलत-ए-दुनिया भी कम न दी सय्याल ज़र-ए-ज़मीं से उबलता है आज भी दुनिया में रौशनी भी हमारे ही दम से है मशरिक़ से आफ़्ताब निकलता है आज भी पर मंज़र-ए-ग़ुरूब बहुत दिल-नशीं है क्यूँँ मग़रिब की शाम अपनी सहरस हसीं है क्यूँँ इस कश्मकश में दौलत-ए-उक़्बा भी छिन गई ज़ौक़-ए-जुनूँ से वुसअ'त-ए-सहरा भी छिन गई सहरा-ए-आरज़ू में तग-ओ-दौ नहीं रही पा-ए-तलब से वादी-ए-सीना भी छिन गई तू ने तो क़र्तबा में नमाज़ें भी कीं अदा अपनी जबीं से मस्जिद-ए-अक़्सा भी छिन गई कोहसार रौंद डाले गए खेत हो गए चट्टान हम ज़रूर थे अब रेत हो गए मंज़िल पे आ के लुट गए हम रहबरों के साथ बीमार भी पड़े हैं तो चारागरों के साथ ग़ुर्बत-कदे में काश उतर आए कहकशाँ आँखें फ़लक की सम्त हैं बोझल सरों के साथ उड़ना मुहाल लौट के आना भी है वबाल ज़ख़्मी दुआ ख़ला में है टूटे परों के साथ इस रज़्म-ए-ख़ैर-ओ-शर में हुआ कौन सुरख़-रू ज़र्ब-ए-कलीम कुंद है फ़िरऔन सुर्ख़-रू

Zaheer Siddiqui

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टूटती रेज़ा रेज़ा सिमटती हुई साअ'तों की कोई सत्ह-ए-सादा नहीं एक वक़्फ़ा का दामन भी धब्बों से ख़ाली नहीं ये नज़र का नहीं अस्ल में इक तज़ाद-ए-नज़र का करिश्मा है वर्ना ये औराक़-ए-महताब भी जितने लगते हैं उजले नहीं मुँह खुली और लड़की हुई रात से लम्हा लम्हा भबकती हुई रौशनाई बहुत तेज़ है रात के कोएले जब शुरूआ'त तक़रीब के धी में धी में सुलगते अलाव में जलने लगें उस घड़ी और जब बीच के मरहले में दहकने लगें उस घड़ी और जब ख़त्म तक़रीब की राख में आँख मिलने लगें इस घड़ी भी सफ़ेदी का ख़ालिस तसव्वुर नहीं अपनी मर्ज़ी की बे-दाग़ तस्वीर के वास्ते कैनवस कोई सादा नहीं

Zaheer Siddiqui

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और जब उन के अज्दाद की सर ज़मीं जिस की आग़ोश में वो पले तंग होने लगी जब उसूलों की पाकीज़गी और गंदा रिवायात में जंग होने लगी तो उन्हें आसमाँ से हिदायत मिली नेक बंद तुम्हारे लिए ये ज़मीं एक है उस सफ़र में तुम्हें रिज़्क़ की फ़िक्र है क्या अनाजों की गठरी उठाए चरिन्दों परिंदों को देखा कभी ज़ाद-ए-रह नेक आ'माल हैं मेरे अहकाम हैं मौत का ख़ौफ़ बे-कार है आख़िरी साँस के बा'द सब को पलटना है मेरी तरफ़ तुम फ़क़त जिस्म ही तो नहीं अपने अंदर सुलगती हुई रौशनी के सहारे बढ़ो एक ही जस्त में दस्त-ओ-दरिया की फैली हुई वुसअ'तें नाप लो चप्पे चप्पे पे अपने नुक़ूश-ए-क़दम इस तरह सब्त कर दो कि उन अजनबियों की हैरत मिटे और पैहम तआ'क़ुब में दुश्मन जो हैं उन की ख़िफ़्फ़त बढ़े मेरे अहकाम की रौशनी सब के दिल में उतारो कि ऐवान-ए-तसलीस में शम-ए-वहदत जले

Zaheer Siddiqui

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