nazmKuch Alfaaz

और जब उन के अज्दाद की सर ज़मीं जिस की आग़ोश में वो पले तंग होने लगी जब उसूलों की पाकीज़गी और गंदा रिवायात में जंग होने लगी तो उन्हें आसमाँ से हिदायत मिली नेक बंद तुम्हारे लिए ये ज़मीं एक है उस सफ़र में तुम्हें रिज़्क़ की फ़िक्र है क्या अनाजों की गठरी उठाए चरिन्दों परिंदों को देखा कभी ज़ाद-ए-रह नेक आ'माल हैं मेरे अहकाम हैं मौत का ख़ौफ़ बे-कार है आख़िरी साँस के बा'द सब को पलटना है मेरी तरफ़ तुम फ़क़त जिस्म ही तो नहीं अपने अंदर सुलगती हुई रौशनी के सहारे बढ़ो एक ही जस्त में दस्त-ओ-दरिया की फैली हुई वुसअ'तें नाप लो चप्पे चप्पे पे अपने नुक़ूश-ए-क़दम इस तरह सब्त कर दो कि उन अजनबियों की हैरत मिटे और पैहम तआ'क़ुब में दुश्मन जो हैं उन की ख़िफ़्फ़त बढ़े मेरे अहकाम की रौशनी सब के दिल में उतारो कि ऐवान-ए-तसलीस में शम-ए-वहदत जले

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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।

Divya 'Kumar Sahab'

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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अल्लामा-इक़बाल के हुज़ूर फ़ितरत का कारोबार तो चलता है आज भी महताब बर्ग-ए-गुल पे फिसलता है आज भी क़ुदरत ने हम को दौलत-ए-दुनिया भी कम न दी सय्याल ज़र-ए-ज़मीं से उबलता है आज भी दुनिया में रौशनी भी हमारे ही दम से है मशरिक़ से आफ़्ताब निकलता है आज भी पर मंज़र-ए-ग़ुरूब बहुत दिल-नशीं है क्यूँँ मग़रिब की शाम अपनी सहरस हसीं है क्यूँँ इस कश्मकश में दौलत-ए-उक़्बा भी छिन गई ज़ौक़-ए-जुनूँ से वुसअ'त-ए-सहरा भी छिन गई सहरा-ए-आरज़ू में तग-ओ-दौ नहीं रही पा-ए-तलब से वादी-ए-सीना भी छिन गई तू ने तो क़र्तबा में नमाज़ें भी कीं अदा अपनी जबीं से मस्जिद-ए-अक़्सा भी छिन गई कोहसार रौंद डाले गए खेत हो गए चट्टान हम ज़रूर थे अब रेत हो गए मंज़िल पे आ के लुट गए हम रहबरों के साथ बीमार भी पड़े हैं तो चारागरों के साथ ग़ुर्बत-कदे में काश उतर आए कहकशाँ आँखें फ़लक की सम्त हैं बोझल सरों के साथ उड़ना मुहाल लौट के आना भी है वबाल ज़ख़्मी दुआ ख़ला में है टूटे परों के साथ इस रज़्म-ए-ख़ैर-ओ-शर में हुआ कौन सुरख़-रू ज़र्ब-ए-कलीम कुंद है फ़िरऔन सुर्ख़-रू

Zaheer Siddiqui

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ग़ैरत है कि हया नाम उस का न लिया जिस को पुकारा उस ने उस गई रात के सन्नाटे में कौन आया है बंद दरवाज़े के मजस में तो सीता ही है और बाहर कोई रावन तो नहीं कौन है कौन की सहमी सी सदा वो भी कुछ कह न सका मैं के सिवा दस्तकें राम के मख़्सूस ज़बाँ रखती हैं गोश-ए-सीता के लिए मुज़्दा-ए-जाँ रखती हैं बल्ब रौशन हुआ और चाप क़दम की उभरी चूड़ियाँ बोल उठीं उँगलियाँ काठ की मिज़राब पे फिर रेंग गईं दोनों पट ख़्वाब से चौंके तो मअ'न चीख़ उठे एक हंगामा हुआ रात का अफ़्सूँ टूटा मुंतज़र साया-ए-ख़जालत के धुआँ से उभरा रात काफ़ी हुई तुम जाग रही हो अब तक आज फिर देर हुई असल में आज अजब बात हुई ठीक है ठीक कोई बात नहीं मुंतज़िर शाख़ जो लचकी तो कई फूल झड़े आप मुँह हाथ तो धो लें पहले और मिंटों में मैं साल को ज़रा गर्म करूँँ प्यार की आग भी रौशन हुई स्टोव के साथ दश्त-ए-तन्हाई के इफ़रीत बहुत दूर हुए वसवसे जितने थे दिल में सभी काफ़ूर हुए हरकत और हरारत में मगन दोनों बदन ये किराया का मकाँ है कि मोहब्बत का चमन एक एक लुक़्मा पे होती हैं निगाहें दो-चार एक एक जुरए में महलूल तबस्सुम की बहार मुज़्तरिब दिल में मुनव्वर हैं मसर्रत के चराग़ जानी-पहचानी सी ख़ुश्बू में है मसहूर-ए-दिमाग़ आँखों आँखों में सियह रात कटेगी अब तो होंट से होंट की सौग़ात बटेगी अब तो

Zaheer Siddiqui

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ये घर बहुत अज़ीम था ये घर बहुत हसीन था कि उस के इर्द-गिर्द दूर दूर तक कोई मकान उस से बढ़ के था नहीं मगर यहाँ का चख अजब रिवाज था थे बिन-बुलाए अजनबी कि जिन का घर पे राज था सजे सजाए कमरे उन के शब-कदे वो सब्ज़ लॉन फूल की कियारियाँ वसीअ' सहन-ओ-साइबाँ थे उन के वास्ते मगर ख़ुद अपने घर में अजनबी मकीन चौखटों पे रातें अपनी काटते रहे सड़क गली की ख़ाक छानते रहे वो बिन-बुलाए अजनबी गदेले बिस्तरों पे लज़्ज़त-ए-शब-ओ-सहर में मस्त मस्त थे उसी तरह न जाने कितनी उम्र काटने के बा'द रफ़्ता रफ़्ता सख़्त-ओ-सर्द चौखटों ने नर्म-ओ-गर्म बिस्तरों की गुदगुदी का ज़ाइक़ा समझ लिया दिमाग़-ओ-दिल की ख़ुश्क वादियों में आरज़ू के आबशार गुनगुना उठे सियाह-बख़्त रात शुऊर के जुनून-ए-शौक़ के चराग़ जल गए चराग़ से कई चराग़ जल गए ब-यक ज़बान चौखटों से ये मुतालबा हुआ कि अजनबी हमारे घर को छोड़ दें ये घर हमारे ख़ून और हमारी हड्डियों से है ये बात सुन के शब-कदे लरज़ गए थी चौंकने की बात ही कि साल-ख़ूर्दा अंधी चौखटों पे रौशनी कहाँ से आ गई गली की ख़ाक आसमाँ पे अब्र बन के छा गई कहाँ से ज़ेहन-ए-ना-रसा में बात ऐसी आ गई वो अजनबी नवाज़िशों इनायतों से उन का जोश सर्द जब न कर सके तो नित-नई सज़ाओं और धमकीयों गली गली लहू लहू सड़क सड़क धुआँ धुआँ मगर जुनून-ए-शौक़ की सदा ज़मीं से आसमाँ सज़ाएँ सख़्त थीं मगर मुतालबा अज़ीज़ था नवाज़िशें इनायतें सज़ाएँ और धमकियाँ सदा-ए-हक़ जुनून-ए-शौक़ दामनों की धज्जियाँ मुक़ाबला भी ख़ूब था कहाँ ज़मीन-ए-हिर्स और कहाँ जुनूँ का आसमाँ मआल-ए-कश्मकश वही हुआ जो होना चाहिए वो अजनबी चले गए मकीन अपने घर को पा के अपने घर को पा के अपने घर में आ गए वो घर के जिस के वास्ते लगा दी अपनी जान भी जो मिल गया तो यूँँ हुआ कि जैसे कुछ नहीं हुआ अजीब माजरा है अब जुनून-ए-इश्क़ ने चराग़-ए-आरज़ू जलाए थे उसी की तेज़ लौ से ये मकीन अपने घर को शौक़ से जला रहे हैं सब्ज़ लॉन में क्यारियों के फूल अपने पाँव से कुछ रहे हैं साएबान के सुतून ढा रहे हैं अल-ग़रज़ जो आज घर का हाल है हमारे पास लफ़्ज़ ही नहीं कि हम बयाँ करें जो सच कहो तो आज भी ये घर बहुत हसीन है मकीन ही अजीब हैं बड़े ही बद-नसीब हैं

Zaheer Siddiqui

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वैसे उस तारीक जंगल के सफ़र के क़ब्ल भी हाथ में उस के यही इक टिमटिमाता काँपता नन्हा दिया था कुछ तो शोहरत की हवस ने और कुछ अहमक़ बही-ख़्वाहों ने इस की सादा-लौही को सज़ा दी उस के तिफ़्लाना इरादा को हवा दी ला के सरहद पर ख़ुदा-हाफ़िज़ कहा उस के ख़िज़ाब-आलूदा सर को ये सआ'दत दी धुआँ खाई हुई बद-रंग दस्तार-ए-क़यादत दी तो वो सीना फुलाए अपनी दस्तार-ए-क़यामत को सँभाले काँपते नन्हे दिए को एक मशअ'ल की तरह ऊँचा उठाए चल पड़ा था ग़ालिबन वो दो-क़दम ही जा सका होगा कि पीली आँधियों ने दस्त-ए-लर्ज़ां में लरज़ते उस दिए को नज़्अ' की हिचकी अता की उस पे तेरा छीन ली दस्तार उस की उस ने आग़ाज़-ए-सफ़र की सारी ख़ुश-फ़हमी बिखरती देख कर जब लौटना चाहा तो ये मुमकिन नहीं था हर तरफ़ तारीकियाँ थीं दफ़्अ'तन कुछ दूर पीछे उस ने देखा आसमाँ से बात करती धूल की दीवार बढ़ती आ रही है और कुछ क़ुर्बत हुई तो उस ने देखा वो कई थे उन के हाथों में भड़कती मिशअलें थीं कासा-ए-नमनाक से उस ने ग़रज़ की गंदगी जो उस को फ़ितरत में मिली थी पोंछ डाली और फ़ौरन ग़ाज़ा-ए-मासूम ये उस की आदत बन चुकी थी अपने चेहरे पर चढ़ाया एक ही मक़्सद था या'नी धूल उड़ाते क़ाफ़िले से एक मशअ'ल ले सके वो ग़ाज़ा-ए-मासूमियत फिर काम आया क़ाफ़िला वालों ने उस को एक मशअ'ल दे के अपने साथ चलने को कहा लेकिन कहाँ तक वो निहायत तेज़-रौ और यक-क़दम थे उस के नाज़ पावँ सूखी हड्डियों के ज़ोर पर क्या साथ देते एक क़दम या दो-क़दम फिर थक गया वो रफ़्ता रफ़्ता उस की वो माँगी हुई मशअ'ल ख़ुद अपने रंग-ओ-रोग़न खा रही थी अब फ़क़त भेंची हुई मोहतात मुट्ठी में अँधेरे की छड़ी थी बाद-ओ-बाराँ तेज़ तूफ़ाँ ज़ेहन-ए-तिफ़्लक में सफ़र के क़ब्ल उन दुश्वारियों का एक हल्का सा तसव्वुर भी नहीं था अब जो ये बर-अक्स सूरत हो गई थी रो पड़ा वो उस की पस्पाई में लेकिन हौसला था दामन-ए-उम्मीद अब भी हाथ में था दफ़्अ'तन उस ने ये देखा धुँदली गहरी रौशनियों के कई हालों में कुछ बढ़ते क़दम नज़दीक होते जा रहे थे उन के होंटों से ख़मोशी छिन रही थी सुस्त-रौ थे फिर भी उन की चाल में इक तमकनत थी उस ने सोचा उन नए लोगों की तरह तेज़ नहीं है उन की हमराही में क़दमों की नक़ाहत बे-असर है और मंज़िल एक सई-ए-मुख़्तसर है इक नई उम्मीद ले कर पुश्त पर मुर्दा दिए तारीक मशअ'ल को छुपा कर गुफ़्तुगू में मस्लहत आमेज़ नर्मी घोल कर उस ने नए लोगों से इक मशअ'ल तलब की उफ़ वो कैसा क़ाफ़िला था किस तिलस्माती जहाँ के लोग थे वो इस क़दर तारीक राहों में बड़ी ही तमकनत से चल रहे थे और हाथों में कोई मशअ'ल नहीं थी रौशनी थी उन की आँखों के दरीचों से उतर कर अपने क़दमों से लिपट कर चलने वाली अपनी अपनी रौशनी थी उस ने सोचा उन के क़दमों से लिपट कर चलने वाली धीमी धीमी रौशनी के अक्स क्या उस के लिए काफ़ी नहीं हैं आज भी वो पुश्त पर मुर्दा दिया तारीक मशअ'ल को छुपाए उन नए लोगों के पीछे उन के क़दमों में लरज़ती रौशनियों के सहारे ठोकरें खाता सँभलता सोचता है रौशनी तो ख़ारिजी शय है दिया है या भड़कती मिशअलें हैं आख़िरश ये रौशनी उन अजनबी लोगों की आँखों से उतर कर उन के क़दमों से लिपट कर चलने वाली रौशनी कैसी है कैसी रौशनी है

Zaheer Siddiqui

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राह तारीक थी दुश्वार था हर एक क़दम मंज़िल-ए-ज़ीस्त के हर गाम पे ठोकर खाई मशअ'ल-ए-अज़्म लिए फिर भी में बढ़ता ही रहा दर्द-ओ-आलाम की आँधी जो कभी तेज़ हुई दामन-ए-शौक़ में मशअ'ल को छुपाया मैं ने बहर बंदगी-ओ-शो'लगी मशअ'ल-ए-अज़्म मेरी शिरयानों का हर क़तरा-ए-ख़ूँ वाक़िफ़ हुआ दामन-ए-शौक़ भी जल-बुझ के कहीं राख हुआ और फिर धुँदली हुई बुझती गई मशअ'ल-ए-अज़्म राह कुछ और भी तारीक वो सियह होती गई घोर अँधियारे के इफ़रीत मुझे डसते रहे ज़िंदगी अपनी उन ही भूल-भुलय्यों में रही अपनी मंज़िल का मगर मुझ को पता मिल न सका हम-सफ़र और भी कुछ साथ चले थे मेरे उन में वो जोश-ए-जुनूँ और न वो अज़्म-ओ-यक़ीं मस्त-ओ-सरशार रहे बादा-ए-ग़फ़लत पी कर ख़्वाब-ए-ख़रगोश में हर गाम पे मदहोश रहे उन की मंज़िल ने मगर उन के क़दम चूम लिए उन की उस नुसरत-ए-बे-जा पे मुझे रश्क नहीं आज भी मुझ में है वो जोश-ए-जुनूँ अज़्म-ओ-यक़ीं आज भी नाज़ है गो जहद-ओ-अमल पे अपने मस्लहत-कोश नहीं आज भी मासूम-ए-जुनूँ ख़िज़्र की बेजा ख़ुशामद पे नहीं राज़ी हुनूज़ हाँ मगर ज़ेहन के पर्दे पे उभरते हैं सवाल ख़िज़्र की बेजा ख़ुशामद ही मुक़द्दम है यहाँ वस्ल-ए-मंज़िल के लिए पा-ए-जुनूँ शर्त नहीं

Zaheer Siddiqui

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