राह तारीक थी दुश्वार था हर एक क़दम मंज़िल-ए-ज़ीस्त के हर गाम पे ठोकर खाई मशअ'ल-ए-अज़्म लिए फिर भी में बढ़ता ही रहा दर्द-ओ-आलाम की आँधी जो कभी तेज़ हुई दामन-ए-शौक़ में मशअ'ल को छुपाया मैं ने बहर बंदगी-ओ-शो'लगी मशअ'ल-ए-अज़्म मेरी शिरयानों का हर क़तरा-ए-ख़ूँ वाक़िफ़ हुआ दामन-ए-शौक़ भी जल-बुझ के कहीं राख हुआ और फिर धुँदली हुई बुझती गई मशअ'ल-ए-अज़्म राह कुछ और भी तारीक वो सियह होती गई घोर अँधियारे के इफ़रीत मुझे डसते रहे ज़िंदगी अपनी उन ही भूल-भुलय्यों में रही अपनी मंज़िल का मगर मुझ को पता मिल न सका हम-सफ़र और भी कुछ साथ चले थे मेरे उन में वो जोश-ए-जुनूँ और न वो अज़्म-ओ-यक़ीं मस्त-ओ-सरशार रहे बादा-ए-ग़फ़लत पी कर ख़्वाब-ए-ख़रगोश में हर गाम पे मदहोश रहे उन की मंज़िल ने मगर उन के क़दम चूम लिए उन की उस नुसरत-ए-बे-जा पे मुझे रश्क नहीं आज भी मुझ में है वो जोश-ए-जुनूँ अज़्म-ओ-यक़ीं आज भी नाज़ है गो जहद-ओ-अमल पे अपने मस्लहत-कोश नहीं आज भी मासूम-ए-जुनूँ ख़िज़्र की बेजा ख़ुशामद पे नहीं राज़ी हुनूज़ हाँ मगर ज़ेहन के पर्दे पे उभरते हैं सवाल ख़िज़्र की बेजा ख़ुशामद ही मुक़द्दम है यहाँ वस्ल-ए-मंज़िल के लिए पा-ए-जुनूँ शर्त नहीं
Related Nazm
तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
81 likes
"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
ZafarAli Memon
20 likes
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
54 likes
मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
68 likes
उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
475 likes
More from Zaheer Siddiqui
ग़ैरत है कि हया नाम उस का न लिया जिस को पुकारा उस ने उस गई रात के सन्नाटे में कौन आया है बंद दरवाज़े के मजस में तो सीता ही है और बाहर कोई रावन तो नहीं कौन है कौन की सहमी सी सदा वो भी कुछ कह न सका मैं के सिवा दस्तकें राम के मख़्सूस ज़बाँ रखती हैं गोश-ए-सीता के लिए मुज़्दा-ए-जाँ रखती हैं बल्ब रौशन हुआ और चाप क़दम की उभरी चूड़ियाँ बोल उठीं उँगलियाँ काठ की मिज़राब पे फिर रेंग गईं दोनों पट ख़्वाब से चौंके तो मअ'न चीख़ उठे एक हंगामा हुआ रात का अफ़्सूँ टूटा मुंतज़र साया-ए-ख़जालत के धुआँ से उभरा रात काफ़ी हुई तुम जाग रही हो अब तक आज फिर देर हुई असल में आज अजब बात हुई ठीक है ठीक कोई बात नहीं मुंतज़िर शाख़ जो लचकी तो कई फूल झड़े आप मुँह हाथ तो धो लें पहले और मिंटों में मैं साल को ज़रा गर्म करूँँ प्यार की आग भी रौशन हुई स्टोव के साथ दश्त-ए-तन्हाई के इफ़रीत बहुत दूर हुए वसवसे जितने थे दिल में सभी काफ़ूर हुए हरकत और हरारत में मगन दोनों बदन ये किराया का मकाँ है कि मोहब्बत का चमन एक एक लुक़्मा पे होती हैं निगाहें दो-चार एक एक जुरए में महलूल तबस्सुम की बहार मुज़्तरिब दिल में मुनव्वर हैं मसर्रत के चराग़ जानी-पहचानी सी ख़ुश्बू में है मसहूर-ए-दिमाग़ आँखों आँखों में सियह रात कटेगी अब तो होंट से होंट की सौग़ात बटेगी अब तो
Zaheer Siddiqui
0 likes
अल्लामा-इक़बाल के हुज़ूर फ़ितरत का कारोबार तो चलता है आज भी महताब बर्ग-ए-गुल पे फिसलता है आज भी क़ुदरत ने हम को दौलत-ए-दुनिया भी कम न दी सय्याल ज़र-ए-ज़मीं से उबलता है आज भी दुनिया में रौशनी भी हमारे ही दम से है मशरिक़ से आफ़्ताब निकलता है आज भी पर मंज़र-ए-ग़ुरूब बहुत दिल-नशीं है क्यूँँ मग़रिब की शाम अपनी सहरस हसीं है क्यूँँ इस कश्मकश में दौलत-ए-उक़्बा भी छिन गई ज़ौक़-ए-जुनूँ से वुसअ'त-ए-सहरा भी छिन गई सहरा-ए-आरज़ू में तग-ओ-दौ नहीं रही पा-ए-तलब से वादी-ए-सीना भी छिन गई तू ने तो क़र्तबा में नमाज़ें भी कीं अदा अपनी जबीं से मस्जिद-ए-अक़्सा भी छिन गई कोहसार रौंद डाले गए खेत हो गए चट्टान हम ज़रूर थे अब रेत हो गए मंज़िल पे आ के लुट गए हम रहबरों के साथ बीमार भी पड़े हैं तो चारागरों के साथ ग़ुर्बत-कदे में काश उतर आए कहकशाँ आँखें फ़लक की सम्त हैं बोझल सरों के साथ उड़ना मुहाल लौट के आना भी है वबाल ज़ख़्मी दुआ ख़ला में है टूटे परों के साथ इस रज़्म-ए-ख़ैर-ओ-शर में हुआ कौन सुरख़-रू ज़र्ब-ए-कलीम कुंद है फ़िरऔन सुर्ख़-रू
Zaheer Siddiqui
0 likes
इसराईल मिस्र जंग में कर्नल नासिर के नारे हम बेटे फ़िरऔन के से मुतअस्सिर हो कर यही वो कोहसार हैं जहाँ मुश्त-ए-ख़ाक नूर-आश्ना हुई थी यही वो ज़र्रात-ए-रेग हैं जो किसी के बेताब वालिहाना क़दम की ठोकर से कहकशाँ कहकशाँ हुए थे यही वो पथरीली वादियाँ हैं कि जिन की आग़ोश-ए-ख़ुश्क में दो धड़कते मा'सूम दिल मिले थे और आज हर-सू है दूद-ए-बारूद की रिदा जिस में हर किरन रौशनी की मादूम हो गई है उजाड़ संगीन वादियों में हवस का इफ़रीत गोसफ़ंदान-ए-अर्ज़-ए-मदयन को खा गया है न कोई बिंत-ए-शुऐब है और न रहरव-ए-तिश्ना ही है कोई कुएँ के पास में जौहरी ज़हर घुल गया है तजल्ली-ए-लम-यज़ल कहाँ की ये तेज़ संगीनों की चमक है कलीम ही जब नहीं है कोई कलाम कैसा मुहीब तोपों की ये धमक है किसी के मा'सूम वालिहाना क़दम की ये कहकशाँ नहीं है ये रेग-हा-ए-ज़मीन ही हैं जो आहनी असलहों की आतिश में तप गए हैं सवाद-ए-साहिल असा-ब-दस्त अब नहीं है कोई तो मो'जिज़ा क्या तिलिस्म कैसा ये सत्ह-ए-दरया-ए-नील गुल-गू जो हो गई है असा का ए'जाज़ तो नहीं ये रिदा-ए-ख़ूँ है रिदा-ए-ख़ूँ है ये ख़ून किस का है ऐ दिल-ए-ज़ूद-रंज तो क्यूँँ उदास है ख़ैर-ओ-शर की ये कश्मकश नहीं है कि दोनों जानिब ही आस्तीन-ए-हवस में फ़िरऔनियत के ज़हरीले अज़दहे हैं सवाद-ए-साहिल असा-ब-दस्त अब नहीं है कोई
Zaheer Siddiqui
0 likes
और जब उन के अज्दाद की सर ज़मीं जिस की आग़ोश में वो पले तंग होने लगी जब उसूलों की पाकीज़गी और गंदा रिवायात में जंग होने लगी तो उन्हें आसमाँ से हिदायत मिली नेक बंद तुम्हारे लिए ये ज़मीं एक है उस सफ़र में तुम्हें रिज़्क़ की फ़िक्र है क्या अनाजों की गठरी उठाए चरिन्दों परिंदों को देखा कभी ज़ाद-ए-रह नेक आ'माल हैं मेरे अहकाम हैं मौत का ख़ौफ़ बे-कार है आख़िरी साँस के बा'द सब को पलटना है मेरी तरफ़ तुम फ़क़त जिस्म ही तो नहीं अपने अंदर सुलगती हुई रौशनी के सहारे बढ़ो एक ही जस्त में दस्त-ओ-दरिया की फैली हुई वुसअ'तें नाप लो चप्पे चप्पे पे अपने नुक़ूश-ए-क़दम इस तरह सब्त कर दो कि उन अजनबियों की हैरत मिटे और पैहम तआ'क़ुब में दुश्मन जो हैं उन की ख़िफ़्फ़त बढ़े मेरे अहकाम की रौशनी सब के दिल में उतारो कि ऐवान-ए-तसलीस में शम-ए-वहदत जले
Zaheer Siddiqui
0 likes
टूटती रेज़ा रेज़ा सिमटती हुई साअ'तों की कोई सत्ह-ए-सादा नहीं एक वक़्फ़ा का दामन भी धब्बों से ख़ाली नहीं ये नज़र का नहीं अस्ल में इक तज़ाद-ए-नज़र का करिश्मा है वर्ना ये औराक़-ए-महताब भी जितने लगते हैं उजले नहीं मुँह खुली और लड़की हुई रात से लम्हा लम्हा भबकती हुई रौशनाई बहुत तेज़ है रात के कोएले जब शुरूआ'त तक़रीब के धी में धी में सुलगते अलाव में जलने लगें उस घड़ी और जब बीच के मरहले में दहकने लगें उस घड़ी और जब ख़त्म तक़रीब की राख में आँख मिलने लगें इस घड़ी भी सफ़ेदी का ख़ालिस तसव्वुर नहीं अपनी मर्ज़ी की बे-दाग़ तस्वीर के वास्ते कैनवस कोई सादा नहीं
Zaheer Siddiqui
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Zaheer Siddiqui.
Similar Moods
More moods that pair well with Zaheer Siddiqui's nazm.







