अल्लामा-इक़बाल के हुज़ूर फ़ितरत का कारोबार तो चलता है आज भी महताब बर्ग-ए-गुल पे फिसलता है आज भी क़ुदरत ने हम को दौलत-ए-दुनिया भी कम न दी सय्याल ज़र-ए-ज़मीं से उबलता है आज भी दुनिया में रौशनी भी हमारे ही दम से है मशरिक़ से आफ़्ताब निकलता है आज भी पर मंज़र-ए-ग़ुरूब बहुत दिल-नशीं है क्यूँँ मग़रिब की शाम अपनी सहरस हसीं है क्यूँँ इस कश्मकश में दौलत-ए-उक़्बा भी छिन गई ज़ौक़-ए-जुनूँ से वुसअ'त-ए-सहरा भी छिन गई सहरा-ए-आरज़ू में तग-ओ-दौ नहीं रही पा-ए-तलब से वादी-ए-सीना भी छिन गई तू ने तो क़र्तबा में नमाज़ें भी कीं अदा अपनी जबीं से मस्जिद-ए-अक़्सा भी छिन गई कोहसार रौंद डाले गए खेत हो गए चट्टान हम ज़रूर थे अब रेत हो गए मंज़िल पे आ के लुट गए हम रहबरों के साथ बीमार भी पड़े हैं तो चारागरों के साथ ग़ुर्बत-कदे में काश उतर आए कहकशाँ आँखें फ़लक की सम्त हैं बोझल सरों के साथ उड़ना मुहाल लौट के आना भी है वबाल ज़ख़्मी दुआ ख़ला में है टूटे परों के साथ इस रज़्म-ए-ख़ैर-ओ-शर में हुआ कौन सुरख़-रू ज़र्ब-ए-कलीम कुंद है फ़िरऔन सुर्ख़-रू
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"नसरी नज़्म" नस्र अब्बा नज़्म अमाँ दोनों को इनकार है ये जो नसरी नज़्म है ये किस की पैदा-वार है सिर्फ़ लफ्फ़ाज़ी पे मब्नी है ये तजरीदी कलाम जिस में अन्क़ा हैं मआ'नी लफ़्ज़ पर्दा-दार है नस्र है गर नस्र तो वो नज़्म हो सकती नहीं नज़्म जो हो नस्र की मानिंद वो बे-कार है क़ाफ़िए की कोई पाबंदी न है क़ैद-ए-रदीफ़ बे-दर-ओ-दीवार का ये घर भी क्या पुरकार है बहरस आज़ाद क़ैद-ए-वज़न से है बे-नियाज़ वाह क्या मदर पिदर आज़ाद ये दिलदार है मर्तबे में 'मीर' ओ 'मोमिन' से है हर कोई बुलंद इन में हर बे-बहर ग़ालिब से बड़ा फ़नकार है जिस के चमचे जितने ज़्यादा हों वो उतना ही अज़ीम आज कल मिसरा उठाना एक कारोबार है दाद सिर्फ़ अपनों को देते हैं गिरोह-अंदर-गिरोह उन के टोले से जो बाहर हो गया मुरदार है बन गया उस्ताद-ओ-अल्लामा यहाँ हर बे-शुऊर कोर-चश्म अहल-ए-नज़र होने का दावेदार है शा'इरी जुज़-शाइरी है है ज़रा मेहनत-तलब और मेहनत ही वो शय है जिस से उन को आर है पाप-म्यूज़िक के लिए मौज़ूँ है नसरी शा'इरी हर रिवायत से बग़ावत की ये दावेदार है तब्अ-ए-मौज़ूँ गर न बख़्शी हो ख़ुदा ने आप को शा'इरी क्यूँँ कीजे आख़िर क्या ख़ुदा की मार है दाद देना ऐसी नज़्मों को बड़ी बे-दाद है जो न समझा और कहे समझा बड़ा मक्कार है
Aasi Rizvi
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"बातें" मैं और मेरी क़लम अक्सर बात करते हैं ये चाँद सूरज क्या लगते हैं ये दोनों उस की आँखें हैं तो फिर ये तारे क्या हैं सब तारे उस की बाली हैं तो बादल क्या लगते हैं फिर ये बादल उस की ज़ुल्फ़ें हैं तो इंद्रधनुष क्या लगता है ये इंद्रधनुष है नथ उस की ये मौसम क्या लगते हैं फिर सब मौसम उस के नखरे हैं तो फिर हवा क्या लगती है हवा तो उस का आँचल है ये नदियाँ तो फिर रह गईं ये नदियाँ उस का कंगन हैं तो फिर समुंदर क्या हुआ ये समुंदर पायल है उस की फिर प्रकृति क्या लगती है ये प्रकृति उस की साड़ी है ये पूरी धरती रह गई ये धरती उस की गोद है इन सब में फिर तुम क्या हो मुझ को उस का दिल समझ लो तुम्हारा दिल फिर क्या हुआ उस के दिल में फूल समझ लो उस के दिल में उगता है उस के दिल में खिलता है उस में ही फिर मिलता है रोज़ सुब्ह से रात तक देखने मुझ को आता है साथ वो हर पल चलता है कंगन पायल खनकाता है छटक कर अपनी ज़ुल्फ़ें वो जल मुझ पर बरसाता है नथ पहनता है वो ख़ुद काजल वो मुझे लगाता है गोद में रख कर सिर मेरा आँचल से लाड़ लड़ाता है बात नहीं करता है वो पर रोज़ मिलने आता है उस का मेरा जो भी है बहुत पुराना नाता है पास वो हर-पल रहता है पर याद बहुत वो आता है बस याद बहुत वो आता है मैं और मेरी क़लम अक्सर ये बात करते हैं
Divya 'Kumar Sahab'
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"फुटपाथ" चल सकता नहीं जिस्म, मचलता है जज़्बात बीते दिन यहीं बीते रात, है घर मेरा ये फुटपाथ सुख की घटा नहीं छाती, हँसी के बादल नहीं आते बाबा, देखो ना मेरे हिस्से में ख़ुशी के पल नहीं आते अब हर पल इन आँखों से होती ग़मों की बरसात बीते दिन यहीं बीते रात, है घर मेरा ये फुटपाथ
Vikas Sangam
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"ज़िन्दगी की हक़ीक़त" तमाम उम्र चलता रहा, ये सिलसिला जीने के लिए। मौत की दहलीज़ पर आ कर जाना, ज़िन्दगी को कैसे जिए आए मौत की कगार पर, तो दुआएँ तमाम रात की। ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में, मौत से मुलाक़ात की बचपन से रुख़सत होते ही, ज़िम्मेदारियों से घिर गए हम चाँद पाने की ख़्वाहिश में, अपने ही क़दमों में गिर गए हम ख़ुद की महफ़िल सूना छोड़कर, सब महफ़िलें आबाद की। ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में, मौत से मुलाक़ात की तुम को क्या लगता हैं, ये ज़िन्दगी बहुत आसान हैं? अगर तुम बे-ईमान हो, तो फिर ये भी बहुत बे-ईमान हैं इक तेरे ही सिलसिले में तो, मैं ने तुझ सेे बात की। ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में, मौत से मुलाक़ात की यहाँ चाँद की नींद अधूरी है, सूरज को पसीना भरपूर है। जो किसी काम के नहीं हैं, ऐसे सितारों को भी ग़ुरूर हैं इक आसमाँ छूने की ख़ातिर, सब ख़्वाहिशें बर्बाद की ज़िन्दगी जीने के सिलसिले में, मौत से मुलाक़ात की
"Nadeem khan' Kaavish"
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"ज़माना और उन के रंग" ज़माना मेरे ख़िलाफ़ जहर उगल सकता है इस में कौन कहाँ किसी को रोक सकता है अब इन ज़ेहनी बीमार लोगों की फ़ितरत से कैसे कोई अपनी मंज़िल को भूल सकता है हर दफ़ा मेरी फिर से उठने की शिद्दत को हर बार यहाँ कोई न कोई तोड़ सकता है और क्या उस टूटने और गिरने के डर से कैसे कोई कोशिश करना छोड़ सकता है ये ज़माना है जनाब यहाँ अक्सर ये सब यहाँ दिल हर रोज़ दुखाया जा सकता है आसमाँ में उड़ते आज़ाद हर उस परिंदे के यहाँ कोई भी उस के परों को काट सकता है कामयाबी के शिखर में पहुँचे हुए लोगों को कोई कभी भी उन्हें शिखर से उतार सकता है
Lalit Mohan Joshi
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ग़ैरत है कि हया नाम उस का न लिया जिस को पुकारा उस ने उस गई रात के सन्नाटे में कौन आया है बंद दरवाज़े के मजस में तो सीता ही है और बाहर कोई रावन तो नहीं कौन है कौन की सहमी सी सदा वो भी कुछ कह न सका मैं के सिवा दस्तकें राम के मख़्सूस ज़बाँ रखती हैं गोश-ए-सीता के लिए मुज़्दा-ए-जाँ रखती हैं बल्ब रौशन हुआ और चाप क़दम की उभरी चूड़ियाँ बोल उठीं उँगलियाँ काठ की मिज़राब पे फिर रेंग गईं दोनों पट ख़्वाब से चौंके तो मअ'न चीख़ उठे एक हंगामा हुआ रात का अफ़्सूँ टूटा मुंतज़र साया-ए-ख़जालत के धुआँ से उभरा रात काफ़ी हुई तुम जाग रही हो अब तक आज फिर देर हुई असल में आज अजब बात हुई ठीक है ठीक कोई बात नहीं मुंतज़िर शाख़ जो लचकी तो कई फूल झड़े आप मुँह हाथ तो धो लें पहले और मिंटों में मैं साल को ज़रा गर्म करूँँ प्यार की आग भी रौशन हुई स्टोव के साथ दश्त-ए-तन्हाई के इफ़रीत बहुत दूर हुए वसवसे जितने थे दिल में सभी काफ़ूर हुए हरकत और हरारत में मगन दोनों बदन ये किराया का मकाँ है कि मोहब्बत का चमन एक एक लुक़्मा पे होती हैं निगाहें दो-चार एक एक जुरए में महलूल तबस्सुम की बहार मुज़्तरिब दिल में मुनव्वर हैं मसर्रत के चराग़ जानी-पहचानी सी ख़ुश्बू में है मसहूर-ए-दिमाग़ आँखों आँखों में सियह रात कटेगी अब तो होंट से होंट की सौग़ात बटेगी अब तो
Zaheer Siddiqui
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वैसे उस तारीक जंगल के सफ़र के क़ब्ल भी हाथ में उस के यही इक टिमटिमाता काँपता नन्हा दिया था कुछ तो शोहरत की हवस ने और कुछ अहमक़ बही-ख़्वाहों ने इस की सादा-लौही को सज़ा दी उस के तिफ़्लाना इरादा को हवा दी ला के सरहद पर ख़ुदा-हाफ़िज़ कहा उस के ख़िज़ाब-आलूदा सर को ये सआ'दत दी धुआँ खाई हुई बद-रंग दस्तार-ए-क़यादत दी तो वो सीना फुलाए अपनी दस्तार-ए-क़यामत को सँभाले काँपते नन्हे दिए को एक मशअ'ल की तरह ऊँचा उठाए चल पड़ा था ग़ालिबन वो दो-क़दम ही जा सका होगा कि पीली आँधियों ने दस्त-ए-लर्ज़ां में लरज़ते उस दिए को नज़्अ' की हिचकी अता की उस पे तेरा छीन ली दस्तार उस की उस ने आग़ाज़-ए-सफ़र की सारी ख़ुश-फ़हमी बिखरती देख कर जब लौटना चाहा तो ये मुमकिन नहीं था हर तरफ़ तारीकियाँ थीं दफ़्अ'तन कुछ दूर पीछे उस ने देखा आसमाँ से बात करती धूल की दीवार बढ़ती आ रही है और कुछ क़ुर्बत हुई तो उस ने देखा वो कई थे उन के हाथों में भड़कती मिशअलें थीं कासा-ए-नमनाक से उस ने ग़रज़ की गंदगी जो उस को फ़ितरत में मिली थी पोंछ डाली और फ़ौरन ग़ाज़ा-ए-मासूम ये उस की आदत बन चुकी थी अपने चेहरे पर चढ़ाया एक ही मक़्सद था या'नी धूल उड़ाते क़ाफ़िले से एक मशअ'ल ले सके वो ग़ाज़ा-ए-मासूमियत फिर काम आया क़ाफ़िला वालों ने उस को एक मशअ'ल दे के अपने साथ चलने को कहा लेकिन कहाँ तक वो निहायत तेज़-रौ और यक-क़दम थे उस के नाज़ पावँ सूखी हड्डियों के ज़ोर पर क्या साथ देते एक क़दम या दो-क़दम फिर थक गया वो रफ़्ता रफ़्ता उस की वो माँगी हुई मशअ'ल ख़ुद अपने रंग-ओ-रोग़न खा रही थी अब फ़क़त भेंची हुई मोहतात मुट्ठी में अँधेरे की छड़ी थी बाद-ओ-बाराँ तेज़ तूफ़ाँ ज़ेहन-ए-तिफ़्लक में सफ़र के क़ब्ल उन दुश्वारियों का एक हल्का सा तसव्वुर भी नहीं था अब जो ये बर-अक्स सूरत हो गई थी रो पड़ा वो उस की पस्पाई में लेकिन हौसला था दामन-ए-उम्मीद अब भी हाथ में था दफ़्अ'तन उस ने ये देखा धुँदली गहरी रौशनियों के कई हालों में कुछ बढ़ते क़दम नज़दीक होते जा रहे थे उन के होंटों से ख़मोशी छिन रही थी सुस्त-रौ थे फिर भी उन की चाल में इक तमकनत थी उस ने सोचा उन नए लोगों की तरह तेज़ नहीं है उन की हमराही में क़दमों की नक़ाहत बे-असर है और मंज़िल एक सई-ए-मुख़्तसर है इक नई उम्मीद ले कर पुश्त पर मुर्दा दिए तारीक मशअ'ल को छुपा कर गुफ़्तुगू में मस्लहत आमेज़ नर्मी घोल कर उस ने नए लोगों से इक मशअ'ल तलब की उफ़ वो कैसा क़ाफ़िला था किस तिलस्माती जहाँ के लोग थे वो इस क़दर तारीक राहों में बड़ी ही तमकनत से चल रहे थे और हाथों में कोई मशअ'ल नहीं थी रौशनी थी उन की आँखों के दरीचों से उतर कर अपने क़दमों से लिपट कर चलने वाली अपनी अपनी रौशनी थी उस ने सोचा उन के क़दमों से लिपट कर चलने वाली धीमी धीमी रौशनी के अक्स क्या उस के लिए काफ़ी नहीं हैं आज भी वो पुश्त पर मुर्दा दिया तारीक मशअ'ल को छुपाए उन नए लोगों के पीछे उन के क़दमों में लरज़ती रौशनियों के सहारे ठोकरें खाता सँभलता सोचता है रौशनी तो ख़ारिजी शय है दिया है या भड़कती मिशअलें हैं आख़िरश ये रौशनी उन अजनबी लोगों की आँखों से उतर कर उन के क़दमों से लिपट कर चलने वाली रौशनी कैसी है कैसी रौशनी है
Zaheer Siddiqui
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और जब उन के अज्दाद की सर ज़मीं जिस की आग़ोश में वो पले तंग होने लगी जब उसूलों की पाकीज़गी और गंदा रिवायात में जंग होने लगी तो उन्हें आसमाँ से हिदायत मिली नेक बंद तुम्हारे लिए ये ज़मीं एक है उस सफ़र में तुम्हें रिज़्क़ की फ़िक्र है क्या अनाजों की गठरी उठाए चरिन्दों परिंदों को देखा कभी ज़ाद-ए-रह नेक आ'माल हैं मेरे अहकाम हैं मौत का ख़ौफ़ बे-कार है आख़िरी साँस के बा'द सब को पलटना है मेरी तरफ़ तुम फ़क़त जिस्म ही तो नहीं अपने अंदर सुलगती हुई रौशनी के सहारे बढ़ो एक ही जस्त में दस्त-ओ-दरिया की फैली हुई वुसअ'तें नाप लो चप्पे चप्पे पे अपने नुक़ूश-ए-क़दम इस तरह सब्त कर दो कि उन अजनबियों की हैरत मिटे और पैहम तआ'क़ुब में दुश्मन जो हैं उन की ख़िफ़्फ़त बढ़े मेरे अहकाम की रौशनी सब के दिल में उतारो कि ऐवान-ए-तसलीस में शम-ए-वहदत जले
Zaheer Siddiqui
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टूटती रेज़ा रेज़ा सिमटती हुई साअ'तों की कोई सत्ह-ए-सादा नहीं एक वक़्फ़ा का दामन भी धब्बों से ख़ाली नहीं ये नज़र का नहीं अस्ल में इक तज़ाद-ए-नज़र का करिश्मा है वर्ना ये औराक़-ए-महताब भी जितने लगते हैं उजले नहीं मुँह खुली और लड़की हुई रात से लम्हा लम्हा भबकती हुई रौशनाई बहुत तेज़ है रात के कोएले जब शुरूआ'त तक़रीब के धी में धी में सुलगते अलाव में जलने लगें उस घड़ी और जब बीच के मरहले में दहकने लगें उस घड़ी और जब ख़त्म तक़रीब की राख में आँख मिलने लगें इस घड़ी भी सफ़ेदी का ख़ालिस तसव्वुर नहीं अपनी मर्ज़ी की बे-दाग़ तस्वीर के वास्ते कैनवस कोई सादा नहीं
Zaheer Siddiqui
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अभी फ़क़त तीन ही बजे हैं अभी तो उस की रगों की कुछ और रौशनाई तनी हुई मेज़ पर पड़े फ़ाइलों के काग़ज़ में जज़्ब होगी ज़रूरतें उस के रेग-ज़ार-ए-हयात के नन्हे नन्हे पौदों की आबियारी किसी के नाज़ुक उदास होंटों पे मुस्कुराहट की लाला-कारी गुदाज़ बाँहों के नर्म हल्क़े में गर्म साँसों की शब-गुज़ारी ज़रूरतों का वो इक पुजारी जो अपने सारे लहू के ग़ुंचे मसाफ़त आफ़्ताब के दस से पाँच तक के क़बीह लम्हों के देवता के क़दम पे क़ुर्बान कर रहा है वो देवता जिस ने साल-हा-साल की रियाज़त और उस के इल्म-ओ-सलाहियत के गवाह इन डिग्रियों के अल्फ़ाज़ को जो इस से लिबास-ए-मफ़्हूम चाहते थे बरहनगी दी ज़रूरतें इस की नन्हे पौदों उदास होंटों गुदाज़ बाँहों की रोज़ की हैं ज़रूरतों का वो इक पुजारी लहू के ग़ुंचों का ये चढ़ावा तो रोज़ का है अभी फ़क़त तीन ही बजे हैं
Zaheer Siddiqui
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