''मशवरा'' तुम हम सेे मोहब्बत क्यूँ कर बैठी हो तुम्हें इल्म है हम किसी और से मोहब्बत करते हैं मगर तुम्हारे दिल में क्या आया कि तुम हम सेे मोहब्बत कर के बैठी हो देखो अब ये हमारा दिल किसी का नहीं हो सकता देखो तुम मासूम हो अभी कमसिन उम्र हो अभी तुम मोहब्बत के जाल में पड़ी नहीं हो अभी तुम्हारे ख़ुश रहने के दिन हैं मोहब्बत कर के तुम बर्बाद हो जाओगी याद बहुत करोगी लेकिन रोटी कम खाओगी फूल जैसे चेहरे को क्यूँ मुरझाना चाहती हो सच बताओ क्यूँ हमारे क़रीब आना चाहती हो हम किसी की फ़ुर्क़त में रोज़-ओ-शब रोते हैं धीरे धीरे उस की सारी यादों को धोते हैं तुम्हारे गेसू काली घटाएँ तुम्हारे लब और तुम्हारी अदाएँ अपने दिल को कैसे भी समझाओ जान-ए-मन तुम हम को भूल जाओ
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
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"मरियम" मैं आईनों से गुरेज़ करते हुए पहाड़ों की कोख में साँस लेने वाली उदास झीलों में अपने चेहरे का अक्स देखूँ तो सोचता हूँ कि मुझ में ऐसा भी क्या है मरियम तुम्हारी बे-साख़्ता मोहब्बत ज़मीं पे फैले हुए समुंदर की वुसअतों से भी मावरा है मोहब्बतों के समंदरों में बस एक बहिरा-ए-हिज्र है जो बुरा है मरियम ख़ला-नवर्दों को जो सितारे मुआवज़े में मिले थे वो उन की रौशनी में ये सोचते हैं कि वक़्त ही तो ख़ुदा है मरियम और इस तअल्लुक़ की गठरियों में रुकी हुई सआतों से हटकर मेरे लिए और क्या है मरियम अभी बहुत वक़्त है कि हम वक़्त दे ज़रा इक दूसरे को मगर हम इक साथ रह कर भी ख़ुश न रह सके तो मुआ'फ़ करना कि मैं ने बचपन ही दुख की दहलीज़ पर गुज़ारा मैं उन चराग़ों का दुख हूँ जिन की लवे शब-ए-इंतज़ार में बुझ गई मगर उन सेे उठने वाला धुआँ ज़मान-ओ-मकाँ में फैला हुआ है अब तक मैं कोहसारों और उन के जिस्मों से बहने वाली उन आबशारों का दुख हूँ जिन को ज़मीं के चेहरों पर रेंगते रेंगते ज़माने गुज़र गए हैं जो लोग दिल से उतर गए हैं किताबें आँखों पे रख के सोए थे मर गए हैं मैं उन का दुख हूँ जो जिस्म ख़ुद-लज़्जती से उकता के आईनों की तसल्लिओं में पले बढ़े हैं मैं उन का दुख हूँ मैं घर से भागे हुओ का दुख हूँ मैं रात जागे हुओ का दुख हूँ मैं साहिलों से बँधी हुई कश्तियों का दुख हूँ मैं लापता लड़कियों का दुख हूँ खुली हुए खिड़कियों का दुख हूँ मिटी हुई तख़्तियों का दुख हूँ थके हुए बादलों का दुख हूँ जले हुए जंगलों का दुख हूँ जो खुल कर बरसी नहीं है, मैं उस घटा का दुख हूँ ज़मीं का दुख हूँ ख़ुदा का दुख हूँ बला का दुख हूँ जो शाख सावन में फूटती है वो शाख तुम हो जो पींग बारिश के बा'द बन बन के टूटती है वो पींग तुम हो तुम्हारे होंठों से सआतों ने समाअतों का सबक़ लिया है तुम्हारी ही शाख-ए-संदली से समंदरों ने नमक लिया है तुम्हारा मेरा मुआमला ही जुदा है मरियम तुम्हें तो सब कुछ पता है मरियम
Tehzeeb Hafi
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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'तुम्हारी याद' बहुत दिन हो गए हैं तुम ने मुझ सेे बात नहीं की क्या तुम्हें मेरे बिना रहना आ गया है मगर मुझे तो आज तक रहना नहीं आया तुम्हारी याद बहुत सताती है तुम्हारी याद बहुत आती है मगर ये सब तुम सेे अब कहूँगा नहीं और ज़ुल्म तुम्हारे अब सहूँगा नहीं अब तुम सेे कोई शिकायत नहीं करेगा इक लड़का तुम्हारे बिन रह लेगा किस पर तुम ने ज़ुल्फ़ों से बिजली गिराई होगी क्या जान-ए-जाँ तुम को मेरी याद आई होगी मगर तुम बात करने से कतराती हो सो मैं तुम्हारे लायक़ तो बिल्कुल भी नहीं तुम दूर से ही मुझ सेे इतराती हो जाओ मैं तुम को अब भूलने लगा हूँ तुम्हारी नज़र में तो मैं बरसों से मरा हूँ
Vaseem 'Haidar'
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“निशानी” एक भी तुम्हारी तस्वीर पुरानी नहीं मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं तुम ने हर बार मुझे झूठे दिलासे दिए मैं वो सब हक़ीक़त समझता रहा अब ये बात किसी को सुनानी नहीं मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं अब तो तुम्हें कोई और पसंद आ गया होगा अब तो तुम उसे ही सोचती रहती होगी मुझे ख़बर है तुम मेरी दिवानी नहीं मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं गर मुझे छोड़ना ही था तो मुझे ख़्वाब क्यूँ दिखाए बुझते हुए दिए को इक उम्मीद क्यूँ दी मैं तो अपनी सुद्द-बुद में खोया था तुम्हें क्या ख़बर मैं तुम्हारी ख़ातिर कितना रोया था आग दिल में जो है वो बुझानी नहीं मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं जाते-जाते तुम ने इक बार भी मेरी ख़बर न ली बरसों पहले तुम ने मुझ सेे किनारा कर लिया अब यादों की मय्यत उठानी नहीं मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं
Vaseem 'Haidar'
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"तसव्वुर" तुम ने तो कितने वादे किए थे कि मैं शादी तुम सेे करूँँगी तुम्हारी बाहों में जिऊँगी मरूँगी और कितनी बार मैं ने भी कहा था तुम मुझे छोड़ना मत लेकिन तुम ने मेरी एक न सुनी अब तो तुम्हारे तसव्वुर की महफ़िल सजाता हूँ तुम्हारी यादों को अपने हुजरे में बुलाता हूँ और अब तो तुम मेरे ख़्वाबों में हर रोज़ आने लगी हो हक़ीक़त में तो न सही लेकिन ख़्वाबों में सताने लगी हो लेकिन तुम सेे एक गिला है तुम तो चली गई मगर यादों को न ले गई तुम्हारी याद मुझे धीरे-धीरे खा रही है तुम्हारी बे-वफ़ाई से मेरी जान जा रही है आख़िर तुम किस की बातों में आ गई मेरी मोहब्बत को तुम ठुकरा गई ये तो मैं ने सोचा भी नहीं था कि ऐसा मोड़ आएगा चाहता हूँ जिस को वही दिल तोड़ जाएगा मैं ने तो अपने दिल को मशवरा दे दिया मगर मेरी जाँ तुम ने किस को दिल में दाख़िला दे दिया सुनो तुम सेे ये उम्मीद बिल्कुल नहीं की थी मैं ने लेकिन तुम ने वो भी कर दिखाया अब मोहब्बत मुझे अच्छी नहीं लग रही जाने क्यूँ जब कोई मोहब्बत की बात करता है तो मुझे तुम्हारे वो वादे याद आ जाते हैं तुम को इतना ध्यान रहे तुम ख़ुदा नहीं हो लोग पूछते हैं तो कह देता हूँ कि तुम बे-वफ़ा नहीं हो
Vaseem 'Haidar'
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