'तुम्हारी याद' बहुत दिन हो गए हैं तुम ने मुझ सेे बात नहीं की क्या तुम्हें मेरे बिना रहना आ गया है मगर मुझे तो आज तक रहना नहीं आया तुम्हारी याद बहुत सताती है तुम्हारी याद बहुत आती है मगर ये सब तुम सेे अब कहूँगा नहीं और ज़ुल्म तुम्हारे अब सहूँगा नहीं अब तुम सेे कोई शिकायत नहीं करेगा इक लड़का तुम्हारे बिन रह लेगा किस पर तुम ने ज़ुल्फ़ों से बिजली गिराई होगी क्या जान-ए-जाँ तुम को मेरी याद आई होगी मगर तुम बात करने से कतराती हो सो मैं तुम्हारे लायक़ तो बिल्कुल भी नहीं तुम दूर से ही मुझ सेे इतराती हो जाओ मैं तुम को अब भूलने लगा हूँ तुम्हारी नज़र में तो मैं बरसों से मरा हूँ
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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''मशवरा'' तुम हम सेे मोहब्बत क्यूँ कर बैठी हो तुम्हें इल्म है हम किसी और से मोहब्बत करते हैं मगर तुम्हारे दिल में क्या आया कि तुम हम सेे मोहब्बत कर के बैठी हो देखो अब ये हमारा दिल किसी का नहीं हो सकता देखो तुम मासूम हो अभी कमसिन उम्र हो अभी तुम मोहब्बत के जाल में पड़ी नहीं हो अभी तुम्हारे ख़ुश रहने के दिन हैं मोहब्बत कर के तुम बर्बाद हो जाओगी याद बहुत करोगी लेकिन रोटी कम खाओगी फूल जैसे चेहरे को क्यूँ मुरझाना चाहती हो सच बताओ क्यूँ हमारे क़रीब आना चाहती हो हम किसी की फ़ुर्क़त में रोज़-ओ-शब रोते हैं धीरे धीरे उस की सारी यादों को धोते हैं तुम्हारे गेसू काली घटाएँ तुम्हारे लब और तुम्हारी अदाएँ अपने दिल को कैसे भी समझाओ जान-ए-मन तुम हम को भूल जाओ
Vaseem 'Haidar'
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“निशानी” एक भी तुम्हारी तस्वीर पुरानी नहीं मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं तुम ने हर बार मुझे झूठे दिलासे दिए मैं वो सब हक़ीक़त समझता रहा अब ये बात किसी को सुनानी नहीं मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं अब तो तुम्हें कोई और पसंद आ गया होगा अब तो तुम उसे ही सोचती रहती होगी मुझे ख़बर है तुम मेरी दिवानी नहीं मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं गर मुझे छोड़ना ही था तो मुझे ख़्वाब क्यूँ दिखाए बुझते हुए दिए को इक उम्मीद क्यूँ दी मैं तो अपनी सुद्द-बुद में खोया था तुम्हें क्या ख़बर मैं तुम्हारी ख़ातिर कितना रोया था आग दिल में जो है वो बुझानी नहीं मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं जाते-जाते तुम ने इक बार भी मेरी ख़बर न ली बरसों पहले तुम ने मुझ सेे किनारा कर लिया अब यादों की मय्यत उठानी नहीं मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं
Vaseem 'Haidar'
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"तसव्वुर" तुम ने तो कितने वादे किए थे कि मैं शादी तुम सेे करूँँगी तुम्हारी बाहों में जिऊँगी मरूँगी और कितनी बार मैं ने भी कहा था तुम मुझे छोड़ना मत लेकिन तुम ने मेरी एक न सुनी अब तो तुम्हारे तसव्वुर की महफ़िल सजाता हूँ तुम्हारी यादों को अपने हुजरे में बुलाता हूँ और अब तो तुम मेरे ख़्वाबों में हर रोज़ आने लगी हो हक़ीक़त में तो न सही लेकिन ख़्वाबों में सताने लगी हो लेकिन तुम सेे एक गिला है तुम तो चली गई मगर यादों को न ले गई तुम्हारी याद मुझे धीरे-धीरे खा रही है तुम्हारी बे-वफ़ाई से मेरी जान जा रही है आख़िर तुम किस की बातों में आ गई मेरी मोहब्बत को तुम ठुकरा गई ये तो मैं ने सोचा भी नहीं था कि ऐसा मोड़ आएगा चाहता हूँ जिस को वही दिल तोड़ जाएगा मैं ने तो अपने दिल को मशवरा दे दिया मगर मेरी जाँ तुम ने किस को दिल में दाख़िला दे दिया सुनो तुम सेे ये उम्मीद बिल्कुल नहीं की थी मैं ने लेकिन तुम ने वो भी कर दिखाया अब मोहब्बत मुझे अच्छी नहीं लग रही जाने क्यूँ जब कोई मोहब्बत की बात करता है तो मुझे तुम्हारे वो वादे याद आ जाते हैं तुम को इतना ध्यान रहे तुम ख़ुदा नहीं हो लोग पूछते हैं तो कह देता हूँ कि तुम बे-वफ़ा नहीं हो
Vaseem 'Haidar'
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