nazmKuch Alfaaz

"महबूब के नाम" बड़ी पुर-कशिश हैं तुम्हारी अदाएँ हैं हर अहल-ए-दिल के लबों पर सदाएँ तमन्ना है तुम को गले से लगा लें तुम्हारी परेशान ज़ुल्फ़ें सँवारें इजाज़त अगर हम सेे ख़ादिम जो पाएँ चराग़-ए-मुहब्बत है दीवार-ए-दिल पर बड़ा ख़ुश-नुमा दिल-नशीं है ये मंज़र ये आने लगीं चश्म-ए-दिल से सदाएँ हमारे लबों से तबस्सुम चुरा कर बहुत मुस्कुराते हो हम को रूलाकर नहीं भूल पाएँगे हम ये जफ़ाएँ बसर इस तरह ज़िंदगी कर रहा हूँ मैं घुट घुट के ख़ुद में शजर मर रहा हूँ ख़ुदा सुन रहा है तुम्हारी दुआएँ

Related Nazm

मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

161 likes

मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

78 likes

तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

81 likes

"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

111 likes

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

73 likes

More from Shajar Abbas

"हैरत" हुस्न महव-ए-हैरत है आज माजरा क्या है इश्क़ के मुसल्ले पर आज हज़रत-ए-दिल ने अपने पाँव रक्खे हैं आज हज़रत-ए-दिल को क्या हुआ है रब जाने जो हमेशा दामन को हुस्न से बचाते थे आज बा-वुज़ू होकर इश्क़ के मुसल्ले पर कैसे आ गए हैं वो हुस्न महव-ए-हैरत है

Shajar Abbas

3 likes

"दस्तान-ए-इश्क़" है ज़िन्दगी का अहम ये क़िस्सा जो यारों तुम को बता रहे हैं गए थे कालेज जो हम पे गुज़री वो दास्ताँ हम सुना रहे हैं कभी वो नज़रें मिला रहे हैं कभी वो नज़रें झुका रहे हैं है हम सेे उन को बहुत मोहब्बत मगर वो दिल में छुपा रहे हैं कभी गले से वो लग रहे हैं कभी गले से लगा रहे हैं अजीब शय है मियाँ मोहब्बत झगड़ रहे हैं मना रहे हैं गए जो कालेज को पहले दिन हम दिखी वहाँ हम को एक लड़की पड़ी निगाहें हमारी उस पर उसे ही बस देखे जा रहे हैं जब हम ने कालेज में उस को देखा लगा के जैसे कोई परी हो ये ही सबब है हम उस परी को भुला जो इक पल न पा रहे हैं हम उन सेे कहते हैं इश्क़ कर लो वो ज़ाया' कहती हैं और फिर हम ये है इबादत ये है इबादत मुसलसल उन को बता रहे हैं सुकून आता नहीं हैं दिल को बग़ैर दीदार उस का कर के सो उस की तस्वीर हम बना कर सहन में दिल लगा रहे हैं वो लड़की धड़कन हैं मेरे दिल की हँसी है मुर्शिद मेरे लबों की बसा के सीने में उस को अपने लबों के ऊपर सजा रहे हैं हाँ सब सेे ज़्यादा हसीं है नाज़ुक है अपनी सारी सहेलियों में वो लड़की जिस की ये बातें तुम को ग़ज़ल के ज़रिए बता रहे हैं वो देखो उस की अदाएँ सारी जुदा हैं अपनी सहेलियों से हम अपने यारों को उस की जानिब इशारा कर के दिखा रहे हैं सभी के लब पर है नाम उस का सभी के दिल में है उस का चेहरा सब अपनी आँखों में देखो यारों उसी के सपने सजा रहे हैं मेरे इलाही ऐ मेरे मालिक जवान लड़कों की ख़ैर रखना फ़ज़ा में अपनी वो आज ज़ुल्फ़ों को खोलकर के हिला रहे हैं किताब ख़ाने से और किताबों से सब सेे ज़्यादा है उस को उल्फ़त क्यूँँ नौजवाँ ये बिना वजह में गुलाब गुलशन से ला रहे हैं अजीब मंज़र है जिस जगह पे भी अपने क़दमों को रख रही है वो चूमने को जगह फ़रिश्ते फ़लक से तशरीफ़ ला रहे हैं है चेहरा जैसे गुलाब कोई हैं लब के जैसे दो तितलियाँ हो वो दे के जुंबिश लबों को अपने चमन की ज़ीनत बढ़ा रहे हैं हैं ज़ुल्फ़े काली घटा के जैसी हैं आँखें उस में चमकते जुगनू अँधेरे ज़ुल्फ़ों से छाएँ गर तो अंधेरे जुगनू मिटा रहे है वो ज़ुल्फें नागिन सी अपनी ला कर हमारी गोदी में रख रही है फिर अपने दस्त-ए-अदब से मुर्शिद हम उस की ज़ुल्फ़ें बना रहे हैं ऐ शाहज़ादी हमारी मानो रिदास चेहरे को अपने ढांपो हसीं लगेगा तुम्हारा चेहरा सबक़ ये उस को पढ़ा रहे हैं चिड़ा रही हैं तमाम सखियाँ उसे उधर मेरी जान कह कर और इस तरफ़ यार-ए-जानी मुझ को सब उस का कह कर चिड़ा रहे हैं ये हुस्न वाले जो ख़ुद पे नाज़ाँ हैं कोई जा कर इन्हें बताओ ये हुस्न सारा बरा-ए-सदक़ा उसी हसीना से पा रहे हैं सुख़न-वरों के मुसव्विरों के ज़ेहन को जाने ये क्या हुआ है सब उस के बारे में लिख रहे हैं सब उस का चेहरा बना रहे हैं मलाल बिल्कुल नहीं हैं मुझ को वो चाहती है किसी को बशर को मलाल ये है मेरे सिवाए सब उस को कालेज में भा रहे हैं अगर मौहब्बत नहीं हैं उन को तो फिर हमें ये बताओ यारों वो इतनी शिद्दत के साथ हम को पलट के क्यूँँ देखे जा रहे हैं उदास रहने लगी है तब से ये बात उस ने सुनी है जब से कि छोड़कर इस बरस ये कालेज पलट के हम घर को जा रहे हैं वो रो रही है बिलख बिलखकर ये कह रही है ना जाओ वापस पलट के आएँगे तुम से मिलने ये कह के उस को चुपा रहे हैं मुसल्ला घर में बिछा के अपने दुआएँ कुछ कर रही है रब से लबों पे उस के है नाम मेरा और अश्क आँखों में आ रहे हैं ये मिलना मिल कर के फिर बिछड़ना है ये ही दस्तूर आशिक़ी का बता बता के ये बात उस को हम उस के दिल को बढ़ा रहे हैं क़रार आ जाए उस के दिल को ज़रा सा शायद ये क़िस्सा सुन कर फ़रहाद-ओ-शीरीं के हिज्र का हम उसे यूँँ क़िस्सा सुना रहे हैं जो हम सेे कहते थे मुस्कुरा कर तुम्हें भुला देगें हम क़सम से वो रोज़ रातों को चुपके चुपके मलाल आँसू बहा रहे हैं ग़ुरूर थी वो मेरा मैं उस का था यूँँ हमारा अनोख़ा रिश्ता हाँ लैला मजनू के जैसे हम भी ज़माना था के पिया रहे हैं वो एक हिस्सा है मेरे दिल का ख़ुदा तू उस का ख़याल रखना दुआ ये करने हम उस के हक़ में ख़ुदा के घर रोज़ जा रहे हैं जहाँ पे आती थी शाम को तू बिताने झूले पे वक़्त अपना तेरे तसव्वुर में आज भी हम वो ख़ाली झूला झुला रहे हैं मैं मुंतज़िर हूँ कब आएगी वो कब उस का वादा-ए-दीद होगा बिछा के राहों में उस की नज़रें समय को अपने बिता रहे हैं वो शाहज़ादी है महलक़ा है शजर की माँगी हुई दुआ है ख़ुदा उसे उस के हक़ में लिख दे दुआ ये लब पर सजा रहे हैं वो उस का कॉलेज को रोज़ आना वो उस का ज़ुल्फों को लहलहाना शजर वो कॉलेज के सारे मंज़र हमारी आँखों में आ रहे हैं ग़ज़ल लिखी है जो मैं ने तुम पर मता-ए-जाँ मेरी उस ग़ज़ल को परिंद दरिया शजर समुंदर सब अपने लहजे में गा रहे हैं

Shajar Abbas

1 likes

“कहाँ हो माँ” तुम्हारे बा'द माँ चारों तरफ़ घर में उदासी है ये आँगन उजड़ा उजड़ा है ये आँगन सूना सूना है मुझे अब अपना ये घर मिस्ल-ए-क़ब्रिस्तान लगता है मकाँ में अब मकीं वीरानियाँ होने लगी हैं माँ ये मंज़र देख कर घर का मिरा दम घुटने लगता है मिरे सीने में दिल है दिल के अंदर बे-क़रारी है मिरी आँखों के दर से ख़ून का दरिया निकलता है ज़मीन-ए-लब पे जो पहले ख़ुशी के फूल खिलते थे वो सब मुरझा चुके हैं माँ समझ में ये नहीं आता बयाँ कैसे करूँँ इस को तुम्हारे दूर जाने से जो सदमा दिल पे गुज़रा है जो रंज-ओ-ग़म उठाए हैं जो मैं ने दर्द झेला है बयाँ कैसे करूँँ उस को मिरे लब कपकपाते हैं बदन भी थरथराता है मैं जब बाहरस आ कर घर के अंदर पाँव रखता हूँ तो मेरी नज़रें फ़ौरन घर में उस जानिब को जाती हैं जहाँ तुम बैठा करती थीं जहाँ तुम बैठ कर हर रोज़ मेरी राह तकती थीं मुझे जब वो जगह ख़ाली नज़र आती है मेरी माँ तो मेरे फूल से दिल पर ग़मों की बिजली गिरती है अचानक से बदन पर तेज़ लर्ज़ा तारी होता है ये मेरे पाँ ज़मीं के सद्र पर यूँँ लड़खड़ाते हैं मैं गिर पड़ता हूँ मेरी माँ मैं ग़श खाकर ज़मीं के सद्र पर ही हाल से बे-हाल होकर जान खोता हूँ मुझे जब होश आता है मैं अपने हाल की परवाह नहीं करता हूँ प्यारी माँ तुम्हारे दूर जाने का अलम दिल पर उठा कर मैं मुसलसल ख़ून रोता हूँ गिरेबाँ चाक करता हूँ तमाचे मार कर रुख़ पर मैं रुख़ को लाल करता हूँ मैं तुम को घर के हर हिस्से के अंदर ढूँढ़ता हूँ माँ तुम्हें घर में न पाकर लब से ये फ़िक़रा निकालता है कहाँ हो माँ अगर नाराज़ हो मुझ सेे तो मेरी इल्तिजा है माँ ख़ुदा के वास्ते नाराज़गी को दूर कर दो तुम ख़ुदारा रू-ब-रू आओ मुझे पहले के जैसे अपनी जाँ कह कर सदाएँ दो कहाँ हो माँ मुझे आग़ोश में ले लो मिरी माँ तुम मिरी पहले के जैसे फिर बलाएँ लो मिरी माँ प्यारी माँ फिर मेरी पेशानी पे अपने फूल से होंठों के पाँ फिर नक़्श कर दो तुम मुझे आराम आ जाए बड़ा बैचैन रहता हूँ मिरी माँ मुख़्तसर ये है तुम्हारे दूर जाने से तुम्हारे लाल का इस दुख भरी दुनिया के अंदर एक पल को दिल नहीं लगता तुम्हारी याद में बस बैठ कर मैं रोता रहता हूँ अरे हाँ याद आया माँ तुम्हारे बारे बाबा जान से जब पूछता हूँ मैं मिरे बाबा कहाँ है माँ तो बाबा जान की पलकों पे कुछ मोती नुमा सी शय नज़र आती है प्यारी माँ मैं फिर से पूछता हूँ प्यारे बाबा जाँ कहाँ है माँ तो बाबा पास आते हैं मुझे सीने लगाते हैं वो फिर गोदी में लेते हैं मिरे सर पर वो अपना हाथ रख कर मुझ सेे कहते हैं मिरे लख़्त-ए-जिगर नूर-ए-नज़र दिलबर मिरे हमदम सुनो सर को उठाओ आसमाँ की सिम्त देखो तुम वो जो महताब की करवट में एक रौशन सितारा है तुम्हारी प्यारी माँ है वो

Shajar Abbas

0 likes

"मुहब्बत" आप से मुहब्बत थी आप से मुहब्बत है आप से मुहब्बत ये उम्र भर रहे शायद ये यहाँ जो शायद है इस का एक मतलब है गर कभी जो क़िस्मत से राह में मिले हम तुम तो तुम्हें फ़राग़त से ये जो लफ़्ज़ शायद है इस का जो भी मतलब है बैठ कर बताएँगे फ़िक्र-मंद मत होना ज़ेहन तंग मत करना मुख़्तसर से लफ़्ज़ों में आप ये समझ लो बस आप से मुहब्बत थी आप से मुहब्बत है

Shajar Abbas

2 likes

“वसीयत“ हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मैं अब से पहले ख़ुतूत लिखता रहा हूँ तुझ को तुझे पता है मैं अब से पहले सभी ख़तों में ख़ुशी के अफ़्साने लिख रहा था हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मगर ज़माना बदल गया अब ये ख़त जो मैं ने तुझे लिखा है पुराने वाले ख़तों के जैसा ये ख़त नहीं है तमाम ख़त से ये ख़त जुदा है हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत ये ख़त नहीं है ये ख़त की सूरत में मैं ने क़ासिद के हाथ तुझ को वसीयतें हैं जो मेरी मैं ने वो सब की सब लिख के भेज दी हैं हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मिरी गुज़ारिश है अब ये तुझ सेे वसीयतें जो लिखी हैं मैं ने हर इक वसीयत को मेरी पढ़ना हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मिरे जनाज़े पे जब भी आना कफ़न को रुख़ से मिरे हटाना ग़मों की मारी हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत ख़याल रखना मिरी वसीयत का मान रखना लिपट के मय्यत से जाँ न खोना जुदाई में मत निढाल होना हसीन आँखों से ख़ूँ न रोना लहू से दामन को मत भिगोना तड़प तड़प के न जान खोना ग़मों की मारी हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत ख़याल रखना मिरी वसीयत का मान रखना

Shajar Abbas

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Shajar Abbas.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Shajar Abbas's nazm.