nazmKuch Alfaaz

कान पक जाते हैं दुनिया की शिकायत सुन कर किस ने जाना है तुम्हें किस का यक़ीं कर लूँ मैं वो जो कहते हैं के तुम आम सी लड़की हो जिसे फ़िक्र अपनी है किसी और से मतलब ही नहीं अपनी रोज़ाना की रूटीन में में जकड़ी जकड़ी वो ही मेट्रो की सवारी वो ही आपा-धापी तिल न धरने की जगह फिर भी पहुँचना है जिसे अपनी हर चीज़ सँभाले हुए रहना है जिसे कौन आया है पस-ओ-पेश समझने के लिए कौन आएगा ये तस्वीर बदलने के लिए कितना आसान है इल्ज़ामों से छलनी करना कितना आसान है दो बातों से ज़ख़्मी करना ऐसे हालात से लड़ कर जिसे कुछ बनना है पूरे करने हैं कई ख़्वाब तमन्ना है कुछ उस के पैरों की ये ज़ंजीर हटानी होगी नस्ल-ए-हव्वा की ये तस्वीर मिटानी होगी तुम से रौशन है हर इक घर मगर ऐसा क्यूँँ है तुम तड़पती हो तो ये जग मिरा हँसता क्यूँँ है बैरी दुनिया ने तुम्हें ठीक से परखा ही नहीं मेरी आँखों से किसी ने तुम्हें देखा ही नहीं

Related Nazm

तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

81 likes

तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

117 likes

उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

475 likes

"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

70 likes

''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

295 likes

More from Ozair Rahman

शिकस्ता हूँ मगर दौलत भी है हासिल हुई हम को गुज़ारे साथ जो पल क़द्र उस की हो नहीं किस को बने सरमाया हैं वो ज़िंदगी का प्यार से रखना ख़ुदारा यादें मत लेना यही यादें हैं ले जाएँगी हम को आख़िरी दम तक न कोई हम-सफ़र होगा न जाएगा कोई घर तक ये घर एहसास का होगा मेरा एहसास मत लेना ख़ुदारा यादें मत लेना है खेली प्यार की बाज़ी न जीता मैं न तुम हारी लगाएगी ये दुनिया ज़र्ब अपने दम से ही कारी ये तय है ज़ख़्म माँगेगा कोई मरहम लगा देना ख़ुदारा यादें मत लेना मिले हम इत्तिफ़ाक़न थे मगर राहें लगीं यकसाँ कभी दुश्वारियाँ अपनी कभी मंज़िल रही पिन्हाँ ये होता रहता है अक्सर जो रूठे दिल मना लेना ख़ुदारा यादें मत लेना ये हाथों की लकीरें बाज़ आएँगी कहाँ दिलबर इन्हें तो बैर है हम से करम-फ़रमा रक़ीबों पर रहेगा खेल क़िस्मत का उसे है खेल में लेना ख़ुदारा यादें मत लेना मुझे है ये यक़ीं पाओगे तुम अपनी नई मंज़िल मैं तड़पूँ या करूँँ गिर्या नहीं होगा कोई हासिल हटा कर मुझ को रस्ते से क़दम आगे बढ़ा लेना ख़ुदारा यादें मत लेना

Ozair Rahman

0 likes

उड़ती देश में गर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है देश है अपना मानते हो ना दुख जितने हैं जानते हो ना पेड़ है एक पर डालें बहुत हैं डालों पर टहनियाँ बहुत हैं पत्ते हैं रोज़ाना उगते पीले लेकिन गिरते रहते तुम हो माली नज़र कहाँ है चमन की सोचो ध्यान कहाँ है क्या तुम से हर फ़र्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है चुना तुम्हें है कहेंगे क़िस्से देश दिखे जब हिस्से हिस्से लोग परेशाँ आग ज़नी है और विचारों में भी ठनी है नज़रें चुरा कर यूँँ ना बैठो आगे आ कर चक्र तो फेंको तुम चुप हो सब बोल रहे हैं पँख वो अपने तोल रहे हैं कहे न कोई मर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है बड़े भाई हो सबक़ तो सीखो चारों ओर हैं छोटे देखो लड़ लड़ कर बर्बाद हैं सारे काटना मारना धर्म बना रे वहाँ मस्जिदों में बम फटते धर्म है एक वो फिर भी लड़ते चले थे फ़ख़्र से सर ऊँचा था गढ़े थे हाएल कब देखा था आज हुए क्या देख रहे हो चक्कर गिध के देख रहे हो अरे क्यूँँ चेहरा ज़र्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है होश में आओ वक़्त अभी है रहबर हो और समय यही है जीत चुनाव फ़िक्र सही है पर हो क्या गर देश नहीं है दूर देखना जुर्म कहाँ है सीखने में कोई शर्म कहाँ है बड़े हो गर तो बन के दिखाओ कहाँ है शफ़क़त ले कर आओ धर्म कभी बे-दर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है आज नहीं तो कल समझोगे लुट जाओगे तब समझोगे प्यार से बढ़ कर अस्त्र नहीं कुछ घटिया झूट से वस्त्र नहीं कुछ बोया जो है वही काटोगे फिर उन के तलवे चाटोगे हाथों में कश्कोल रहेंगे गले में अपने ढोल रहेंगे फिर सर ऊँचा करते रहना बन जाना फिर देश का गहना जागो हवा अभी सर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है

Ozair Rahman

0 likes

कभी इन चिड़ियों से भी पूछना है तुम्हारा घर कहाँ है ये घर है क्या ये घर है कब हुआ करता है किस का ये रिटाइर हो चुका हूँ मैं जो कहते हैं वो कॉलेज था ग़लत हैं वो है कब पहचान रिश्तों की है कब पहचान जगहों की वो मेरा घर था मेरी जान वही हर रोज़ का जाना क़तारें कमरों की होतीं बड़े कुछ और कुछ छोटे मगर वो सारे अपने थे मैं संग बच्चों के रहता था बहुत कुछ सीखता उन से कभी उन को सिखाता भी वो मेरा घर था मेरा हक़ था उस पर ज़ियादा गर नहीं तो कम भी कब था अभी भी सारे कमरे हैं अभी भी सारे बच्चे हैं मगर वो हक़ नहीं है वो बस अब घर नहीं है कहाँ जाऊँ मैं उन में अब क़तारों में हैं कमरे जैसे थे वो क्लासों में हैं बच्चे जैसे थे वो हूँ मैं बस घर से बाहर सुनाई देगी गर जाऊँगा ख़ुद आवाज़ अपनी वहाँ बच्चे नहीं होंगे हाँ बस आवाज़ें लौटेंगी मैं डर जाऊँगा वापस आऊँगा वो घर नहीं है वहाँ अब मेरा कोई हक़ नहीं है बरस बीते हैं तब ये जान पाया दर्द क्या है हमारी बेटियाँ क्यूँँ यूँँ तड़पती हैं जब उन की डोली उठती है उन्हें महसूस हो ये अब नहीं घर नहीं है हक़ कोई इन का अब उस पर ये हक़ है अस्ल जो है घर का मालिक अगर हक़ है तो फिर घर है नहीं है तो पटख़ लो पाँव कितने नहीं वो घर तुम्हारा अब वो कॉलेज हो या माईका! कहावत है मकीं से ही मकाँ है ग़लत मैं क्यूँँ कहूँ होगा मगर मेरे लिए ऐसा नहीं है हमेशा से मकाँ से ही मकीं जाना हों ये हालात अपने ख़ुद या फिर हों बेटियों के वो यही कड़वा वो सच है जो निगलना है मुझे भी बेटियों को भी मुझे अपनी ही कड़वाहट से है दो चार होना अब सदी बीती है आधी जब छिना है एक घर मेरा मिलेगा दूसरा अब कब इकट्ठा ही मिले शायद दोबारा फिर रिटाइर हूँ दोबारा घर का हो अफ़्सोस या फिर घर न होने का

Ozair Rahman

0 likes

ये सच है अब आज़ाद हैं हम मिट्टी से सुगंध ये आती है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है आज़ादी पहली मंज़िल थी था हौसला सब ने साथ दिया काँटों से भरे इन रस्तों को ज़ख़्मी पैरों से पार किया आगे देखा महबूब-ए-नज़र बैठा वो हमारा साक़ी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है ये देश बना क़ुर्बानी से जानें क़ुर्बान हुईं कितनी आँखों में मुल्क का नक़्शा था परवाह उन्हें कब थी अपनी तख़्तों पे खड़े हो कर जब भी फूली देखा हर छाती है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है जब ढोल नगाड़े बजते थे हम जूझते थे बंद कमरों में मंसूबों पर मंसूबे थे गाँव के वो हों या शहरों के हम थके नहीं बढ़ते ही चले कि आगे हमारा साथी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है ये देश बना इक गुल-दस्ता बदनाम न होने देंगे इसे मज़हब के नाम पे बाँटने का जो काम करे बस रोको उसे गर शुरूअ' हुई ख़ाना-जंगी फिर काहे की आज़ादी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है है मुल्क बड़ा तो मसले हैं हल होने हैं हल होंगे भी दिल हारना शोभा देता नहीं आए चाहे सौ मुश्किल भी बस खोट नहीं हो निय्यत में ये हुआ तो फिर बर्बादी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनों अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है बस एक गुज़ारिश है तुम से जब क़दम उठें हर क़ौम हो साथ भूलें मज़हब और जाती को हो दिल में देश हाथों में हाथ तब पता चले इस दुनिया को यहाँ अब भी नेहरू गाँधी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनों अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है

Ozair Rahman

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Ozair Rahman.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Ozair Rahman's nazm.