ये सच है अब आज़ाद हैं हम मिट्टी से सुगंध ये आती है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है आज़ादी पहली मंज़िल थी था हौसला सब ने साथ दिया काँटों से भरे इन रस्तों को ज़ख़्मी पैरों से पार किया आगे देखा महबूब-ए-नज़र बैठा वो हमारा साक़ी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है ये देश बना क़ुर्बानी से जानें क़ुर्बान हुईं कितनी आँखों में मुल्क का नक़्शा था परवाह उन्हें कब थी अपनी तख़्तों पे खड़े हो कर जब भी फूली देखा हर छाती है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है जब ढोल नगाड़े बजते थे हम जूझते थे बंद कमरों में मंसूबों पर मंसूबे थे गाँव के वो हों या शहरों के हम थके नहीं बढ़ते ही चले कि आगे हमारा साथी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है ये देश बना इक गुल-दस्ता बदनाम न होने देंगे इसे मज़हब के नाम पे बाँटने का जो काम करे बस रोको उसे गर शुरूअ' हुई ख़ाना-जंगी फिर काहे की आज़ादी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है है मुल्क बड़ा तो मसले हैं हल होने हैं हल होंगे भी दिल हारना शोभा देता नहीं आए चाहे सौ मुश्किल भी बस खोट नहीं हो निय्यत में ये हुआ तो फिर बर्बादी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनों अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है बस एक गुज़ारिश है तुम से जब क़दम उठें हर क़ौम हो साथ भूलें मज़हब और जाती को हो दिल में देश हाथों में हाथ तब पता चले इस दुनिया को यहाँ अब भी नेहरू गाँधी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनों अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"तर्क-ए-इश्क़" सुनो प्रेमिका ओए अनामिका मैं तुम्हारे लिए नहीं लिखता लिखते होंगे जो लिखते होंगे मैं नहीं लिखता मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ लिखने के लिए मैं बिकता हूँ क्योंकि मैं बना हूँ बिकने के लिए मैं लिखता हूँ क्योंकि मेरा मन करता है तुम मेरी गीत में कैसे हो तुम जानो मेरी ग़ज़ल में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी कविता में कैसे हो तुम जानो तुम मेरी नज़्म में कैसे हो तुम जानो मैं क्यूँ जानूँ जब मैं तुम्हें नहीं लिखता और मैं क्यूँ लिखूँ तुम्हारे लिए क्या किया है तुम ने हमारे लिए वही समझदारी भरी बातें जो तुम हमेशा से करती आई हो जब भी मिलती समझदारी भरी बातें करती और मैं पागलों की तरह तुम्हारी हाँ में हाँ मिलता मैं अक्सर ही चुप रहता था क्योंकि कभी तो जवाब नहीं होते थे और कभी मैं संकोच जाता मगर तुम करती थी क्यूँ नहीं करोगी तेज़ थी ना करोगी ही वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि मुझे छोड़ जाने का फ़ैसला भी तुम्हारा था पता नहीं किस ने कह दिया कि मुहब्बत पागलों को पसंद करती है मुझे तो कभी नहीं किया ख़ैर इतना बड़ा फ़ैसला तुम ने किया इतना सही फ़ैसला तुम ने किया तो ये तय रहा कि तुम समझदार थी और मैं पागल तो पागल लिखा नहीं करते तुम समझदार हो तेज़ हो तुम लिखना मेरे लिए मैं पढ़ूँगा क्योंकि मैं पागल हूँ गर बे-ज़बाँ नहीं लिखूँगा नहीं मगर पढ़ूँगा और ज़रूर पढ़ूँगा
Rakesh Mahadiuree
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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वे डरते हैं किस चीज़ से डरते हैं वे तमाम धन-दौलत गोला-बारूद पुलिस-फ़ौज के बावजूद ? वे डरते हैं कि एक दिन निहत्थे और ग़रीब लोग उन सेे डरना बंद कर देंगे
Gorakh Pandey
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शिकस्ता हूँ मगर दौलत भी है हासिल हुई हम को गुज़ारे साथ जो पल क़द्र उस की हो नहीं किस को बने सरमाया हैं वो ज़िंदगी का प्यार से रखना ख़ुदारा यादें मत लेना यही यादें हैं ले जाएँगी हम को आख़िरी दम तक न कोई हम-सफ़र होगा न जाएगा कोई घर तक ये घर एहसास का होगा मेरा एहसास मत लेना ख़ुदारा यादें मत लेना है खेली प्यार की बाज़ी न जीता मैं न तुम हारी लगाएगी ये दुनिया ज़र्ब अपने दम से ही कारी ये तय है ज़ख़्म माँगेगा कोई मरहम लगा देना ख़ुदारा यादें मत लेना मिले हम इत्तिफ़ाक़न थे मगर राहें लगीं यकसाँ कभी दुश्वारियाँ अपनी कभी मंज़िल रही पिन्हाँ ये होता रहता है अक्सर जो रूठे दिल मना लेना ख़ुदारा यादें मत लेना ये हाथों की लकीरें बाज़ आएँगी कहाँ दिलबर इन्हें तो बैर है हम से करम-फ़रमा रक़ीबों पर रहेगा खेल क़िस्मत का उसे है खेल में लेना ख़ुदारा यादें मत लेना मुझे है ये यक़ीं पाओगे तुम अपनी नई मंज़िल मैं तड़पूँ या करूँँ गिर्या नहीं होगा कोई हासिल हटा कर मुझ को रस्ते से क़दम आगे बढ़ा लेना ख़ुदारा यादें मत लेना
Ozair Rahman
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उड़ती देश में गर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है देश है अपना मानते हो ना दुख जितने हैं जानते हो ना पेड़ है एक पर डालें बहुत हैं डालों पर टहनियाँ बहुत हैं पत्ते हैं रोज़ाना उगते पीले लेकिन गिरते रहते तुम हो माली नज़र कहाँ है चमन की सोचो ध्यान कहाँ है क्या तुम से हर फ़र्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है चुना तुम्हें है कहेंगे क़िस्से देश दिखे जब हिस्से हिस्से लोग परेशाँ आग ज़नी है और विचारों में भी ठनी है नज़रें चुरा कर यूँँ ना बैठो आगे आ कर चक्र तो फेंको तुम चुप हो सब बोल रहे हैं पँख वो अपने तोल रहे हैं कहे न कोई मर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है बड़े भाई हो सबक़ तो सीखो चारों ओर हैं छोटे देखो लड़ लड़ कर बर्बाद हैं सारे काटना मारना धर्म बना रे वहाँ मस्जिदों में बम फटते धर्म है एक वो फिर भी लड़ते चले थे फ़ख़्र से सर ऊँचा था गढ़े थे हाएल कब देखा था आज हुए क्या देख रहे हो चक्कर गिध के देख रहे हो अरे क्यूँँ चेहरा ज़र्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है होश में आओ वक़्त अभी है रहबर हो और समय यही है जीत चुनाव फ़िक्र सही है पर हो क्या गर देश नहीं है दूर देखना जुर्म कहाँ है सीखने में कोई शर्म कहाँ है बड़े हो गर तो बन के दिखाओ कहाँ है शफ़क़त ले कर आओ धर्म कभी बे-दर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है आज नहीं तो कल समझोगे लुट जाओगे तब समझोगे प्यार से बढ़ कर अस्त्र नहीं कुछ घटिया झूट से वस्त्र नहीं कुछ बोया जो है वही काटोगे फिर उन के तलवे चाटोगे हाथों में कश्कोल रहेंगे गले में अपने ढोल रहेंगे फिर सर ऊँचा करते रहना बन जाना फिर देश का गहना जागो हवा अभी सर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है
Ozair Rahman
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कान पक जाते हैं दुनिया की शिकायत सुन कर किस ने जाना है तुम्हें किस का यक़ीं कर लूँ मैं वो जो कहते हैं के तुम आम सी लड़की हो जिसे फ़िक्र अपनी है किसी और से मतलब ही नहीं अपनी रोज़ाना की रूटीन में में जकड़ी जकड़ी वो ही मेट्रो की सवारी वो ही आपा-धापी तिल न धरने की जगह फिर भी पहुँचना है जिसे अपनी हर चीज़ सँभाले हुए रहना है जिसे कौन आया है पस-ओ-पेश समझने के लिए कौन आएगा ये तस्वीर बदलने के लिए कितना आसान है इल्ज़ामों से छलनी करना कितना आसान है दो बातों से ज़ख़्मी करना ऐसे हालात से लड़ कर जिसे कुछ बनना है पूरे करने हैं कई ख़्वाब तमन्ना है कुछ उस के पैरों की ये ज़ंजीर हटानी होगी नस्ल-ए-हव्वा की ये तस्वीर मिटानी होगी तुम से रौशन है हर इक घर मगर ऐसा क्यूँँ है तुम तड़पती हो तो ये जग मिरा हँसता क्यूँँ है बैरी दुनिया ने तुम्हें ठीक से परखा ही नहीं मेरी आँखों से किसी ने तुम्हें देखा ही नहीं
Ozair Rahman
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कभी इन चिड़ियों से भी पूछना है तुम्हारा घर कहाँ है ये घर है क्या ये घर है कब हुआ करता है किस का ये रिटाइर हो चुका हूँ मैं जो कहते हैं वो कॉलेज था ग़लत हैं वो है कब पहचान रिश्तों की है कब पहचान जगहों की वो मेरा घर था मेरी जान वही हर रोज़ का जाना क़तारें कमरों की होतीं बड़े कुछ और कुछ छोटे मगर वो सारे अपने थे मैं संग बच्चों के रहता था बहुत कुछ सीखता उन से कभी उन को सिखाता भी वो मेरा घर था मेरा हक़ था उस पर ज़ियादा गर नहीं तो कम भी कब था अभी भी सारे कमरे हैं अभी भी सारे बच्चे हैं मगर वो हक़ नहीं है वो बस अब घर नहीं है कहाँ जाऊँ मैं उन में अब क़तारों में हैं कमरे जैसे थे वो क्लासों में हैं बच्चे जैसे थे वो हूँ मैं बस घर से बाहर सुनाई देगी गर जाऊँगा ख़ुद आवाज़ अपनी वहाँ बच्चे नहीं होंगे हाँ बस आवाज़ें लौटेंगी मैं डर जाऊँगा वापस आऊँगा वो घर नहीं है वहाँ अब मेरा कोई हक़ नहीं है बरस बीते हैं तब ये जान पाया दर्द क्या है हमारी बेटियाँ क्यूँँ यूँँ तड़पती हैं जब उन की डोली उठती है उन्हें महसूस हो ये अब नहीं घर नहीं है हक़ कोई इन का अब उस पर ये हक़ है अस्ल जो है घर का मालिक अगर हक़ है तो फिर घर है नहीं है तो पटख़ लो पाँव कितने नहीं वो घर तुम्हारा अब वो कॉलेज हो या माईका! कहावत है मकीं से ही मकाँ है ग़लत मैं क्यूँँ कहूँ होगा मगर मेरे लिए ऐसा नहीं है हमेशा से मकाँ से ही मकीं जाना हों ये हालात अपने ख़ुद या फिर हों बेटियों के वो यही कड़वा वो सच है जो निगलना है मुझे भी बेटियों को भी मुझे अपनी ही कड़वाहट से है दो चार होना अब सदी बीती है आधी जब छिना है एक घर मेरा मिलेगा दूसरा अब कब इकट्ठा ही मिले शायद दोबारा फिर रिटाइर हूँ दोबारा घर का हो अफ़्सोस या फिर घर न होने का
Ozair Rahman
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