nazmKuch Alfaaz

शिकस्ता हूँ मगर दौलत भी है हासिल हुई हम को गुज़ारे साथ जो पल क़द्र उस की हो नहीं किस को बने सरमाया हैं वो ज़िंदगी का प्यार से रखना ख़ुदारा यादें मत लेना यही यादें हैं ले जाएँगी हम को आख़िरी दम तक न कोई हम-सफ़र होगा न जाएगा कोई घर तक ये घर एहसास का होगा मेरा एहसास मत लेना ख़ुदारा यादें मत लेना है खेली प्यार की बाज़ी न जीता मैं न तुम हारी लगाएगी ये दुनिया ज़र्ब अपने दम से ही कारी ये तय है ज़ख़्म माँगेगा कोई मरहम लगा देना ख़ुदारा यादें मत लेना मिले हम इत्तिफ़ाक़न थे मगर राहें लगीं यकसाँ कभी दुश्वारियाँ अपनी कभी मंज़िल रही पिन्हाँ ये होता रहता है अक्सर जो रूठे दिल मना लेना ख़ुदारा यादें मत लेना ये हाथों की लकीरें बाज़ आएँगी कहाँ दिलबर इन्हें तो बैर है हम से करम-फ़रमा रक़ीबों पर रहेगा खेल क़िस्मत का उसे है खेल में लेना ख़ुदारा यादें मत लेना मुझे है ये यक़ीं पाओगे तुम अपनी नई मंज़िल मैं तड़पूँ या करूँँ गिर्या नहीं होगा कोई हासिल हटा कर मुझ को रस्ते से क़दम आगे बढ़ा लेना ख़ुदारा यादें मत लेना

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?

Tehzeeb Hafi

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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कभी इन चिड़ियों से भी पूछना है तुम्हारा घर कहाँ है ये घर है क्या ये घर है कब हुआ करता है किस का ये रिटाइर हो चुका हूँ मैं जो कहते हैं वो कॉलेज था ग़लत हैं वो है कब पहचान रिश्तों की है कब पहचान जगहों की वो मेरा घर था मेरी जान वही हर रोज़ का जाना क़तारें कमरों की होतीं बड़े कुछ और कुछ छोटे मगर वो सारे अपने थे मैं संग बच्चों के रहता था बहुत कुछ सीखता उन से कभी उन को सिखाता भी वो मेरा घर था मेरा हक़ था उस पर ज़ियादा गर नहीं तो कम भी कब था अभी भी सारे कमरे हैं अभी भी सारे बच्चे हैं मगर वो हक़ नहीं है वो बस अब घर नहीं है कहाँ जाऊँ मैं उन में अब क़तारों में हैं कमरे जैसे थे वो क्लासों में हैं बच्चे जैसे थे वो हूँ मैं बस घर से बाहर सुनाई देगी गर जाऊँगा ख़ुद आवाज़ अपनी वहाँ बच्चे नहीं होंगे हाँ बस आवाज़ें लौटेंगी मैं डर जाऊँगा वापस आऊँगा वो घर नहीं है वहाँ अब मेरा कोई हक़ नहीं है बरस बीते हैं तब ये जान पाया दर्द क्या है हमारी बेटियाँ क्यूँँ यूँँ तड़पती हैं जब उन की डोली उठती है उन्हें महसूस हो ये अब नहीं घर नहीं है हक़ कोई इन का अब उस पर ये हक़ है अस्ल जो है घर का मालिक अगर हक़ है तो फिर घर है नहीं है तो पटख़ लो पाँव कितने नहीं वो घर तुम्हारा अब वो कॉलेज हो या माईका! कहावत है मकीं से ही मकाँ है ग़लत मैं क्यूँँ कहूँ होगा मगर मेरे लिए ऐसा नहीं है हमेशा से मकाँ से ही मकीं जाना हों ये हालात अपने ख़ुद या फिर हों बेटियों के वो यही कड़वा वो सच है जो निगलना है मुझे भी बेटियों को भी मुझे अपनी ही कड़वाहट से है दो चार होना अब सदी बीती है आधी जब छिना है एक घर मेरा मिलेगा दूसरा अब कब इकट्ठा ही मिले शायद दोबारा फिर रिटाइर हूँ दोबारा घर का हो अफ़्सोस या फिर घर न होने का

Ozair Rahman

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ये सच है अब आज़ाद हैं हम मिट्टी से सुगंध ये आती है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है आज़ादी पहली मंज़िल थी था हौसला सब ने साथ दिया काँटों से भरे इन रस्तों को ज़ख़्मी पैरों से पार किया आगे देखा महबूब-ए-नज़र बैठा वो हमारा साक़ी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है ये देश बना क़ुर्बानी से जानें क़ुर्बान हुईं कितनी आँखों में मुल्क का नक़्शा था परवाह उन्हें कब थी अपनी तख़्तों पे खड़े हो कर जब भी फूली देखा हर छाती है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है जब ढोल नगाड़े बजते थे हम जूझते थे बंद कमरों में मंसूबों पर मंसूबे थे गाँव के वो हों या शहरों के हम थके नहीं बढ़ते ही चले कि आगे हमारा साथी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है ये देश बना इक गुल-दस्ता बदनाम न होने देंगे इसे मज़हब के नाम पे बाँटने का जो काम करे बस रोको उसे गर शुरूअ' हुई ख़ाना-जंगी फिर काहे की आज़ादी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनो अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है है मुल्क बड़ा तो मसले हैं हल होने हैं हल होंगे भी दिल हारना शोभा देता नहीं आए चाहे सौ मुश्किल भी बस खोट नहीं हो निय्यत में ये हुआ तो फिर बर्बादी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनों अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है बस एक गुज़ारिश है तुम से जब क़दम उठें हर क़ौम हो साथ भूलें मज़हब और जाती को हो दिल में देश हाथों में हाथ तब पता चले इस दुनिया को यहाँ अब भी नेहरू गाँधी है ऐ जान से प्यारे हम-वतनों अभी काम बहुत कुछ बाक़ी है

Ozair Rahman

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उड़ती देश में गर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है देश है अपना मानते हो ना दुख जितने हैं जानते हो ना पेड़ है एक पर डालें बहुत हैं डालों पर टहनियाँ बहुत हैं पत्ते हैं रोज़ाना उगते पीले लेकिन गिरते रहते तुम हो माली नज़र कहाँ है चमन की सोचो ध्यान कहाँ है क्या तुम से हर फ़र्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है चुना तुम्हें है कहेंगे क़िस्से देश दिखे जब हिस्से हिस्से लोग परेशाँ आग ज़नी है और विचारों में भी ठनी है नज़रें चुरा कर यूँँ ना बैठो आगे आ कर चक्र तो फेंको तुम चुप हो सब बोल रहे हैं पँख वो अपने तोल रहे हैं कहे न कोई मर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है बड़े भाई हो सबक़ तो सीखो चारों ओर हैं छोटे देखो लड़ लड़ कर बर्बाद हैं सारे काटना मारना धर्म बना रे वहाँ मस्जिदों में बम फटते धर्म है एक वो फिर भी लड़ते चले थे फ़ख़्र से सर ऊँचा था गढ़े थे हाएल कब देखा था आज हुए क्या देख रहे हो चक्कर गिध के देख रहे हो अरे क्यूँँ चेहरा ज़र्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है होश में आओ वक़्त अभी है रहबर हो और समय यही है जीत चुनाव फ़िक्र सही है पर हो क्या गर देश नहीं है दूर देखना जुर्म कहाँ है सीखने में कोई शर्म कहाँ है बड़े हो गर तो बन के दिखाओ कहाँ है शफ़क़त ले कर आओ धर्म कभी बे-दर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है आज नहीं तो कल समझोगे लुट जाओगे तब समझोगे प्यार से बढ़ कर अस्त्र नहीं कुछ घटिया झूट से वस्त्र नहीं कुछ बोया जो है वही काटोगे फिर उन के तलवे चाटोगे हाथों में कश्कोल रहेंगे गले में अपने ढोल रहेंगे फिर सर ऊँचा करते रहना बन जाना फिर देश का गहना जागो हवा अभी सर्द नहीं है तुम्हें ज़रा भी दर्द नहीं है

Ozair Rahman

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कान पक जाते हैं दुनिया की शिकायत सुन कर किस ने जाना है तुम्हें किस का यक़ीं कर लूँ मैं वो जो कहते हैं के तुम आम सी लड़की हो जिसे फ़िक्र अपनी है किसी और से मतलब ही नहीं अपनी रोज़ाना की रूटीन में में जकड़ी जकड़ी वो ही मेट्रो की सवारी वो ही आपा-धापी तिल न धरने की जगह फिर भी पहुँचना है जिसे अपनी हर चीज़ सँभाले हुए रहना है जिसे कौन आया है पस-ओ-पेश समझने के लिए कौन आएगा ये तस्वीर बदलने के लिए कितना आसान है इल्ज़ामों से छलनी करना कितना आसान है दो बातों से ज़ख़्मी करना ऐसे हालात से लड़ कर जिसे कुछ बनना है पूरे करने हैं कई ख़्वाब तमन्ना है कुछ उस के पैरों की ये ज़ंजीर हटानी होगी नस्ल-ए-हव्वा की ये तस्वीर मिटानी होगी तुम से रौशन है हर इक घर मगर ऐसा क्यूँँ है तुम तड़पती हो तो ये जग मिरा हँसता क्यूँँ है बैरी दुनिया ने तुम्हें ठीक से परखा ही नहीं मेरी आँखों से किसी ने तुम्हें देखा ही नहीं

Ozair Rahman

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