“मोहब्बत” न कोई फ़साना है न कोई कहानी है मेरी मैं कोई राजा तो नहीं,पर एक रानी है मेरी ज़्यादा लंबी नहीं एक मुख़्तसर सी कहानी है मेरी एक वो हसीना जिस में था रूह कब्ज़ करने का हुनर उस के क़ब्ज़े में हम आ गए बस यहीं परेशानी है मेरी फिर उस सेे आख़िर में हम को इश्क़ हो गया शायद यही हम से एक जु़र्म हो गया ये सब करने के बा'द बस एक तजुर्बा हाथ आया जो कहते हैं मोहब्बत में कुछ नहीं उन को देने के लिए एक जवाब हाथ आया भाव बढ़ जाते हैं इज़हार-ए-मोहब्बत से इन के ये तजुर्बा भी हम को ये काम करने के बा'द आया किसी दीवार पे लिखा था मोहब्बत जु़र्म है मैं ने उस को उतारा और फाड़ आया आख़िर मुझे इस सेे तजुर्बा जो हाथ आया
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो
Rakesh Mahadiuree
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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एक सहेली की नसीहत तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मानकर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम सेे पहले भी ऐसा ही इक ख़्वाब, झूटी तसल्ली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो, तुम सेे पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है शाइ'र हवा की हथेली पे लिक्खी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सहरा में रमन करने वाला हिरन है शोबदा साज़ सुब्ह की पहली किरन है अदबगाह-ए-उल्फ़त का मेमार है वो तो शाइ'र है शाइ'र को बस फ़िक्र-ए-लौह-ए-कलम है उसे कोई दुख है किसी का ना ग़म है वो तो शाइ'र है शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से शाइ'र तो ख़ुद शहसवार-ए-अजल है उसे किस तरह टाल सकता है कोई, के वो तो अटल है मैं उसे जानती हूँ, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारे से वापस पलटते हुए मेरी खुरदुरी एड़ियों पर लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुई शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़्में कशीदी जिन्हें पढ़ के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसअला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली तुम मेरी बात मानो तुम उसे जानती ही नहीं वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई उसी की ही एक नज़्म हो
Tehzeeb Hafi
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"सफ़र" ऐ मेरी जान मैं खोने को चला हूँ ख़ुद को फिर मिलूँगा कभी इस दिल ने इजाज़त दी तो फिर मिलूँगा कभी ये दर्द भुला पाया तो फिर मिलूँगा मैं ख़ुद को ढूँढ़ कर ले आया तो पर ये हालात बताते हैं सफ़र लम्बा है लौटते वक़्त है मुमकिन कि कफ़न में आऊँ तुझ सेे मिलने मैं किसी और बदन में आऊँ
Shivang Tiwari
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"सिगरेट की राख" धुएँ का बादल जो हर पल उठता है जैसे जीवन की हर साँस जलती है सुलगती सिगरेट जैसे एक उम्मीद जो धीरे-धीरे राख बनकर बिख़रती है हर कश में कुछ खो जाता है जैसे सपने किसी कोने में दब जाते हैं हाथों में थमी ये पतली सी चीज़ जैसे ज़िन्दगी की एक छोटी सी ख़्वाहिश जलते हैं होंठ जलते हैं ख़्वाब हर धुएँ में दिखता है दिल का अज़ाब मगर क्या मिला इस आग में सिर्फ़ राख और कुछ सूनी यादें सिगरेट बुझती है पर जलना जारी है जैसे दिल के कोने में कोई दर्द भारी है मगर कौन समझे इस धुएँ की सच्चाई जो दिखता है वो सिर्फ़ पल भर की रिहाई ये सिगरेट बस एक आदत नहीं जैसे ज़िन्दगी की कोई छुपी हुई बेबसी है हर सुलगता कश एक चीख सुनाता है जो शायद किसी ने कभी समझा ही नहीं
Shivang Tiwari
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"आख़िरी मोहब्बत" तू आख़िरी मोहब्बत है मेरी तेरे बा'द कोई ख़्वाहिश नहीं वक़्त थम जाए बस इस लम्हे में और कोई दरकार नहीं तेरे बिना सब सूना है तेरे साथ सब पूरा ख़्वाबों में तेरी परछाईं हक़ीक़त में तू मंज़िल मेरे दिल की हर इक धड़कन तेरे नाम की हाज़िरी है पहली मोहब्बत में थे ख़्वाब बहुत आख़िरी में सच्चाई है पहली में थी मासूमियत शायद आख़िरी में गहराई है तू वो किताब है जिस के हर पन्ने पे मैं बिखरा हूँ जिस में ख़ुद को बार-बार ढूँढा तू वो पन्ना है जो मुड़ा नहीं कभी तू आख़िरी मोहब्बत है अब और कुछ माँगा नहीं मैं ने तेरी हँसी में है एक सुकून तेरे आँसुओं में मेरी दुआ तेरे नाम में खोया हुआ तेरे प्यार में पाया ख़ुदा तू आख़िरी मोहब्बत है मेरी तेरे बा'द कोई ख़्वाहिश नहीं जिस दिन भी ख़त्म हो जाएँ साँसें तू मेरे साथ हो यही आरज़ू है मेरी
Shivang Tiwari
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“है एक ऐसी भी लड़की” वो इश्क़ है वो वफ़ा है वो आयत है, इबादत है वो दुआ है, वो आमीन है वो सच है, वो यक़ीन है वो मेरी धूप है, छाँव है आसमाँ है, ज़मीन है है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है वो थोड़ी सी पागल है थोड़ी थोड़ी ज़हीन है, उस की हरकतों में अल्हड़पन, जिस का नक़्श आ'ला जिस का चर्बा हसीन है, हर भौंरा दिवाना उस का जो बर्ग-ए-गुल पे नशीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो इस क़दर माहेरीन है वही मेरी दामन भी है वही मेरी आस्तीन है, वो इमली सी खट्टी है शहद सी मीठी है, कभी वो चटपटी सी कभी वो नमकीन है, वो एक उम्दा परवाज़ है एक आ'ला शाहीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है। वो मेरी दुनिया है, जहान है मेरी पगड़ी है, ज़बीन है, मेरा क़लमा है, ईमान है वो एक तशरीह-ए-दीन है, वो बर्ग-ए-गुल है, काँटा है वो मतीन है, वो महीन है, वो नील-कँवल है, गुलाब है, एक गुलदस्ता रंगीन है, मैं अब क्या क्या लिखूँ सर से पाँव तक वो हसीन है, है एक ऐसी भी लड़की जो सच में औला-तरीन है।
Shivang Tiwari
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“मंज़िल” सिर्फ़ अपने लिए ही सब अच्छा तलाशना कहते हैं इस को ही सब सेे घटिया तलाशना उम्र थक चुकी है अब, इस बेकार काम से मंज़िल तलाशना तो कभी रस्ता तलाशना रूबरू तुझ को देख कर ख़ुद को ढूँढ़ता हूँ मैं फिर तन्हाई में बैठ कर तेरा चेहरा तलाशना पहले तो जान ले कर, बेजान कर दिया फिर उस में काट-छाँट कर बढ़िया तलाशना हो जो रंगो से भी रंगीन, ऐसी दुनिया कहाँ नामुमकिन है कोई दूजा हिंदोस्ताँ तलाशना हो काश ये ख़ुशी भी तुम को मुयस्सर "शिवम्" "प्रगति" के वास्ते एक प्यारा सा दुल्हा तलाशना
Shivang Tiwari
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