तुम्हें पता है मोहब्बत क्या है नहीं मैं बताता हूँ तुम्हें पिछले दिसम्बर तक ये जज़्बा मुझ में इस क़दर था कि मेरी क़ल्ब-दानी में मोहब्बत का हमल ठहर गया वो मेरे दिल की कोख में पलती रही वो ज़िंदा थी मैं ने एक लम्स को महसूस किया था बस ज़रा सी जल्दी ने वक़्त से पहले उसे जन्म दिया और वो मरहूम हो गई
Related Nazm
उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
475 likes
"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
236 likes
''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए
Amir Ameer
295 likes
"रम्ज़" तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझे मेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं मेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हें मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर इन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहन मुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकता ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
Jaun Elia
216 likes
"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ
Khalil Ur Rehman Qamar
191 likes
More from Tabassum Zia
मैं तन्हा था कल भी और आज भी मैं जानता था कि मैं नीला हूँ लेकिन तुम्हारी आवाज़ पर मैं बाहर निकल आया गोरे काले और ख़ाकिस्तरयों के दरमियान और अब मैं ज़ख़्मी हूँ काश तुम मुझ से नफ़रत करतीं तो मैं वापस तन्हाई के तने में छुप जाता जहाँ मेरे आँसू शाख़ों पर उगते और मैं फ़न के मीठे फल देता तुम ने जब जब आवाज़ दी मेरी तन्हाई मुझ से रूठ गई और मैं हर बार कराहता हुआ लौटा रहम एक अफ़्साना है मुझ पर लिख डालो कभी तो एहसास को उँगलियों पे गिन डालो मैं अपने ग़मों और ख़ुशियों ईदों और शब-रातों की साथी अपनी दुल्हन तन्हाई को भैरवीं के कोमल सुरों की तरह सदा सुहागन रखूँगा
Tabassum Zia
0 likes
दरवाज़े क्या होते हैं क्या दरवाज़े बाहर जाने के लिए हैं या सिर्फ़ अंदर आने के लिए दरवाज़ों का दुरुस्त मसरफ़ समझने से फ़लसफ़ी क़ासिर रहे हम तमाम उम्र इन की हक़ीक़त से ना-आश्ना रहे हमें मा'लूम न हो सका और दरवाज़े हमारे अंदर से ख़ारिज हो गए या शायद अपने ही अंदर दाख़िल हो गए दाख़िल और ख़ारिज होने की बहस जारी थी कि दरवाज़ों को दवाम बख़्शा जा सके लेकिन दरवाज़ों की ख़ुद-कुशी से मुदावमत की मौत वाक़े' हो गई
Tabassum Zia
0 likes
मेरे दिल में उगती प्यार की फ़स्ल को जब लोगों की नफ़रत के फ़ुज़्ले की खाद मिली तो सिटे चमक कर सोना हो गए फिर वही फ़स्ल काटने का वक़्त आया तो मेरे ख़ुलूस की दरांती कुंद हो गई और दिल शिकम के आँसुओं से भर आया दरांती ख़ूब चलाई गई लेकिन फ़स्ल न कटी मेरे हाथों पर कीचड़ लगा हुआ था सिटे नीले हो चुके थे मोहब्बत ने ख़ुलूस के साथ निय्यत को उठा कर नफ़रत के फ़ुज़्ले पे पटख़ डाला और दर्द ने मोहब्बत के उपले नाफ़ पर थापना शुरूअ' कर दिए
Tabassum Zia
0 likes
1 कल्लन की ख़ुद-कलामी मैं ब्याह रचाऊँगी कुछ रूपए हो जाएँ मैं कचरा अच्छी तरह साफ़ कर सकती हूँ बर्तन मांज लेती हूँ झाड़न भी चला लेती हूँ मुझे खाना बहुत अच्छा पकाना आता है मैं कोठियों में काम करूँँगी कुछ रूपए हो जाएँ तो अपना ब्याह रचाऊँगी 2 कल्लन पोछा लगाती है तो पिंडलियाँ नंगी हो जाती हैं कभी चाक सँभालती है तो दुपट्टा गिर जाता है सीढ़ियाँ उतरने में ख़ूब एहतियात करती है मगर छातियाँ तो छलकती हैं पोछा लगाने में ख़ूब ज़ोर लगता है लेकिन कूल्हे हैं कि भारी होते जाते हैं 3 (कल्लन का अपने बिखरे हुए बालों से कलाम ये कॉकरोच गंदगी को क्यूँँ पसंद करते हैं मैं ने उसे रोकने के बहुत जतन किए मगर वो नाली में उतर गया और कुछ देर बा'द मुझ से दूर बैठ कर अपने हास्से चाटने लगा 4 अब कल्लन दाज ख़ूब बना सकती है लेकिन उसे सुहाग रात का इंतिज़ार नहीं
Tabassum Zia
0 likes
कोई कहता है ख़ुदा ज़मीं से गया नहीं मगर क्या वज्ह है कि शैतान बूढे नहीं होते उन का तूती बोलता है हाँ ज़ईफ़ काम करने से क़ासिर होता है और नज़्म बुज़ुर्गों से मुक़ाबला नहीं करती मैं मर जाऊँगा यक़ीनन मुझे मरना है लेकिन उस नज़्म को जिसे मैं ने कुछ देर पहले जना उसे क़त्ल करना मुमकिन नहीं मेरे नफ़्स होने की ये आख़िरी दलील ज़िंदा रहेगी
Tabassum Zia
0 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Tabassum Zia.
Similar Moods
More moods that pair well with Tabassum Zia's nazm.







