nazmKuch Alfaaz

1 कल्लन की ख़ुद-कलामी मैं ब्याह रचाऊँगी कुछ रूपए हो जाएँ मैं कचरा अच्छी तरह साफ़ कर सकती हूँ बर्तन मांज लेती हूँ झाड़न भी चला लेती हूँ मुझे खाना बहुत अच्छा पकाना आता है मैं कोठियों में काम करूँँगी कुछ रूपए हो जाएँ तो अपना ब्याह रचाऊँगी 2 कल्लन पोछा लगाती है तो पिंडलियाँ नंगी हो जाती हैं कभी चाक सँभालती है तो दुपट्टा गिर जाता है सीढ़ियाँ उतरने में ख़ूब एहतियात करती है मगर छातियाँ तो छलकती हैं पोछा लगाने में ख़ूब ज़ोर लगता है लेकिन कूल्हे हैं कि भारी होते जाते हैं 3 (कल्लन का अपने बिखरे हुए बालों से कलाम ये कॉकरोच गंदगी को क्यूँँ पसंद करते हैं मैं ने उसे रोकने के बहुत जतन किए मगर वो नाली में उतर गया और कुछ देर बा'द मुझ से दूर बैठ कर अपने हास्से चाटने लगा 4 अब कल्लन दाज ख़ूब बना सकती है लेकिन उसे सुहाग रात का इंतिज़ार नहीं

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है

Ali Zaryoun

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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम

Tahir Faraz

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मेरे दिल में उगती प्यार की फ़स्ल को जब लोगों की नफ़रत के फ़ुज़्ले की खाद मिली तो सिटे चमक कर सोना हो गए फिर वही फ़स्ल काटने का वक़्त आया तो मेरे ख़ुलूस की दरांती कुंद हो गई और दिल शिकम के आँसुओं से भर आया दरांती ख़ूब चलाई गई लेकिन फ़स्ल न कटी मेरे हाथों पर कीचड़ लगा हुआ था सिटे नीले हो चुके थे मोहब्बत ने ख़ुलूस के साथ निय्यत को उठा कर नफ़रत के फ़ुज़्ले पे पटख़ डाला और दर्द ने मोहब्बत के उपले नाफ़ पर थापना शुरूअ' कर दिए

Tabassum Zia

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मैं तन्हा था कल भी और आज भी मैं जानता था कि मैं नीला हूँ लेकिन तुम्हारी आवाज़ पर मैं बाहर निकल आया गोरे काले और ख़ाकिस्तरयों के दरमियान और अब मैं ज़ख़्मी हूँ काश तुम मुझ से नफ़रत करतीं तो मैं वापस तन्हाई के तने में छुप जाता जहाँ मेरे आँसू शाख़ों पर उगते और मैं फ़न के मीठे फल देता तुम ने जब जब आवाज़ दी मेरी तन्हाई मुझ से रूठ गई और मैं हर बार कराहता हुआ लौटा रहम एक अफ़्साना है मुझ पर लिख डालो कभी तो एहसास को उँगलियों पे गिन डालो मैं अपने ग़मों और ख़ुशियों ईदों और शब-रातों की साथी अपनी दुल्हन तन्हाई को भैरवीं के कोमल सुरों की तरह सदा सुहागन रखूँगा

Tabassum Zia

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दरवाज़े क्या होते हैं क्या दरवाज़े बाहर जाने के लिए हैं या सिर्फ़ अंदर आने के लिए दरवाज़ों का दुरुस्त मसरफ़ समझने से फ़लसफ़ी क़ासिर रहे हम तमाम उम्र इन की हक़ीक़त से ना-आश्ना रहे हमें मा'लूम न हो सका और दरवाज़े हमारे अंदर से ख़ारिज हो गए या शायद अपने ही अंदर दाख़िल हो गए दाख़िल और ख़ारिज होने की बहस जारी थी कि दरवाज़ों को दवाम बख़्शा जा सके लेकिन दरवाज़ों की ख़ुद-कुशी से मुदावमत की मौत वाक़े' हो गई

Tabassum Zia

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कोई कहता है ख़ुदा ज़मीं से गया नहीं मगर क्या वज्ह है कि शैतान बूढे नहीं होते उन का तूती बोलता है हाँ ज़ईफ़ काम करने से क़ासिर होता है और नज़्म बुज़ुर्गों से मुक़ाबला नहीं करती मैं मर जाऊँगा यक़ीनन मुझे मरना है लेकिन उस नज़्म को जिसे मैं ने कुछ देर पहले जना उसे क़त्ल करना मुमकिन नहीं मेरे नफ़्स होने की ये आख़िरी दलील ज़िंदा रहेगी

Tabassum Zia

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तुम्हें पता है मोहब्बत क्या है नहीं मैं बताता हूँ तुम्हें पिछले दिसम्बर तक ये जज़्बा मुझ में इस क़दर था कि मेरी क़ल्ब-दानी में मोहब्बत का हमल ठहर गया वो मेरे दिल की कोख में पलती रही वो ज़िंदा थी मैं ने एक लम्स को महसूस किया था बस ज़रा सी जल्दी ने वक़्त से पहले उसे जन्म दिया और वो मरहूम हो गई

Tabassum Zia

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